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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

महर्षि दयानन्द



 डॉ. कृष्ण के आर्य                                                 

दयानंद बोध रात्रि- विशेष


महाशिवरात्रि को मूषक ने दयानन्द को कराया था बोध
सत्य-विद्या के उद्घोषक रहे-महर्षि दयानन्द

        भारत भूमि पर ऐसे असंख्य उदाहरण मिलते हैं, जब कोई महापुरुष किसी देश, काल और परिस्थिति जन्य ज्ञान को प्राप्त करता है। इनमें अनेक जन्म-जन्मांतरों के ऋषि मनुष्य मात्र के उपकार हेतु धरा पर आते हैं, तो कुछ किसी बोधि वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न होकर संसार की वास्तविकता का भान करते हैं और किसी के प्रज्ञाचक्षु मृत्यु या वृद्धावस्था को देखकर खुल जाते हैं। परन्तु महर्षि दयानन्द को किसी और ने नहीं बल्कि एक मूसक ने सत्य के दर्शन करवाए थे। तदोपरान्त उसी बालक मूल-शंकर नेेे अपना पूरा जीवन वास्तविक ‘शंकर के मूल’ को तलाशने में लगा दिया।
       सृष्टि के मूल तत्व को खोजने की जिद ने ही गुजरात के टंकारा में 12 फरवरी, 1824 को जन्मे बालक मूल शंकर को महर्षि बना दिया। एक साधारण बालक की भांति उन्हें अपनी माता यशोदा बाई से भगवान विष्णु तथा पिता श्रीकर्षण जी से महादेव शिव की कथाएं सुनने को मिलती रही, परन्तु उनकी ज्ञान-पिपासा की उत्कंठा शांत नहीं हो रही थी। इस तरह असली शिव के दर्शन करने की जिज्ञासा शारीरिक और बौद्धिक रूप से बढ़ते मूलशंकर की निरंतर बढ़ती गई। इसी दौरान उनके चाचा और बहन की मौत ने उनके निर्मल मन में वैराग्यभाव को और गहन कर दिए। इस घटना से व्यथित होकर मूलशंकर अपने माता-पिता से जीवन-मृत्यु पर प्रश्न करने लगा। अतः बेटे की मनोदशा देखकर माता-पिता चिंतित रहने लगे।

महाबोधि शिवरात्रि- मूषक ने दी शिक्षा
       एक कहावत है कि ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’। अर्थात् महापुरुषों की दिव्यता के दर्शन उनके बचपन में ही होने लगते हैं। ऐसे ही लक्षण किशोर मूलशंकर के जीवन में भी दृष्टिपात हो रहे थे। परन्तु महाशिवरात्रि के पर्व पर ही उन्हें जीवन के प्रवाह का ज्ञान प्राप्त हुआ। देश के अन्य भागों की तरह ही टंकारा में भी फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि पर व्रत-पूजा का आयोजन किया जा रहा था। उनके पिता श्रीकर्षण जी ने भी अपने पुत्र मूलशंकर को महाशिवरात्रि पर उपवास रखने की सलाह दी तथा गांव के शिवालय में पूजा करने व रात्रि जागरण करने को कहा। अतः मूलशंकर अपने परिवार के साथ शिवालय में भूखा-प्यासा रात्रि जागरण करता रहा। शीघ्र ही परिवार के सदस्य नींद के आगोश में चले गए लेकिन सच्चे शिव के दर्शन करने के लिए मूलशंकर जागता रहा।
       इसी दौरान शिवालय में घटित हुई एक घटना ने मूलशंकर को स्वयं के प्रति विद्रोही बना दिया। रात्रि के अंतिम प्रहर में जब सब श्रद्धालु निद्रा की गोद में थे तो मूलशंकर ने कुछ मूसक (चुंहों) को शिवलिंग पर चढ़ाए गए प्रसाद को खाते और वहीं मल-मूत्र करते हुए देखा। यह घटना देखकर मूलशंकर बड़ा व्यथित हुआ और कहने लगा यह सच्चा शिव नही हो सकता। यह शिवलिंग जो स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता है तो दूसरों की रक्षा कैसे करेगा। बालक ने अपने पिता जी को जगाते हुए पूरी घटना बताई और पूछा यह सच्चा शिव कैसे हो सकता है, वह कहां रहता है मुझे बताओ। इस पर पिता ने कहा कि सच्चा शिव तो कैलाश पर है यह तो केवल उनकी मूर्ति है। यह सुनकर बालक ने सच्चे शिव की खोज करने के लिए घर त्यागने का मन बना लिया। इस प्रकार यह महाशिवरात्रि बालक मूलशंकर के जीवन की महाबोध रात्रि बन गई।

सत्य की खोज-
       बालक के मनोभावों को जानकर माता-पिता बेटे का विवाह करने की तैयारी करने लगे। परन्तु मूलशंकर को तो सच्चे शंकर की खोज करनी थी, इसलिए मौका मिलते ही वह घर से निकलकर भाग गया। वह अनेक साधु, संतों से मिले और सच्चे शिव के विषय में जानना चाहा। अनेक गुरुजनों से शिक्षा प्राप्त करने पश्चात भी जब उन्हें शांति प्राप्त नहीं हुई तो वह मथुरा पहुंच गए। वहां उन्हें अंध गुरू विरजानन्द दंडी स्वामी के विषय में जानकारी मिली। एक सुबह उन्होंने स्वामी जी कुटिया का द्वार खटखटाया तो अन्दर से आवाज आई ‘कौन है’। इस पर उन्होंने कहा कि ‘यही तो जानने आया हूं कि मैं कौन हूं’। यह उत्तर सुनकर दंडी स्वामी के नेत्र भर आए और वे समझ गए कि एक योग्य शिष्य मिल गया है। अतः अब उनके जीवन की तपस्या पूर्ण होने वाली है।
        स्वामी विरजानन्द वेदों के प्रकाण्ड विद्वान थे, उन्होंने अपने शिष्य को वेद-वेदांग, दर्शन, शास्त्रों तथा व्याकरण का पूर्ण ज्ञान दिया। उन्होंने वेदानुसार सच्चे शिव अर्थात् कल्याणकारी ईश्वर की आभा के दर्शन करवाए, जिसके कारण उन्हें लम्बी अवधि की समाधि का अभ्यास हो गया। इसके उपरांत वह किशोर विश्व में स्वामी दयानन्द के नाम से विख्यात हुआ।

ज्ञान का प्रसार-
       दंडी स्वामी विरजानन्द की आज्ञा से दयानंद ने समाज में फैले अज्ञानता के अंधकार को दूर करने की प्रतिज्ञा ली। इसके पश्चात स्वामी दयानन्द ने स्वयं को तपाने के लिए छः वर्षों से अधिक समय तक हिमालय में वास किया। इससे उनकी वाणी में ओज तथा चेहरे के अनूठे तेज ने लोगों को उनका दीवाना बना दिया और वे महर्षि दयानन्द सरस्वती कहलाए। उन्होंने कुंभ मेले के दौरान हरिद्वार में ‘पाखण्ड खंडिनी पताका’ फहराई और अनेक तथाकथित धर्माचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित किया।
महर्षि ने कहा कि ज्ञान का मूल स्त्रोत केवल वेद है। वेद के अतिरिक्त कोई अन्य धर्मग्रंथ प्रामाणिक नहीं है। वेद के ज्ञान बिना ईश्वर के दर्शन सम्भव नहीं है।

प्राणीमात्र के कल्याणार्थ-
        महर्षि दयानन्द सरस्वती ने प्राणीमात्र के कल्याणार्थ विक्रमी संवत 1932, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को गिरगांव मुंबई में पहली ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। इसका उद्देश्य व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और दुनिया को आर्य अर्थात् श्रेष्ठ, कुलीन और सदाचारी बनाना था। उन्होंने वेद के मूल मंत्र ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का उद्घोष दिया। उनका मानना था कि मानव मात्र के आर्य (श्रेष्ठ) बनने से संसार की अनेक समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी और इससे शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा। उन्हीं के मार्ग पर चलते हुए अनेक आर्ष गुरुकुल, कन्या विद्यालय तथा डीएवी जैसी संस्थाएं आज विश्व में ख्याति प्राप्त कर रही हैं।

लेखन कार्य-
        गुजरात में पैदा होने के बावजूद और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान होते हुए भी स्वामी दयानन्द ने हिन्दी को प्राथमिकता दी। उन्होंने हिन्दी को ‘आर्य भाषा’ का नाम दिया और अपने लगभग डेढ़ दर्जन ग्रन्थों का लेखन हिन्दी में ही किया। सत्यार्थ प्रकाश उनका प्रमुख ग्रंथ माना जाता है परन्तु संस्कार विधि, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आर्योद्देश्यरत्नमाला, व्यवहारभानू इत्यादि पुस्तकें भी जनमानस को उचित राह दिखा रही है। उन्होंने हमारी प्राचीन खोई हुई सनातन धरोहर वेदों को पुनः सामने लाकर मानवमात्र पर बड़ा उपकार किया है। ऋग्वेद और यजुर्वेद का भाष्य इस दिशा में मील का पत्थर हैं।

कुरीतियों पर प्रहार-
        महर्षि दयानन्द को अलग-अलग बुद्धि के लोग अलग-अलग ढ़ंग से परिभाषित करते हैं। कुछ लोग उन्हें ब्रह्मचारी कहते हैं और कोई धर्म के पूरोद्धा, सत्य के रक्षक, वेदवेत्ता तो कुछ वेद उद्वारक कहते हैं। परन्तु महर्षि दयानन्द आधुनिक समाज के पथ प्रदर्शक तथा सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उनके उद्घोषक रहे हैं। उन्होंने 19वीं सदी में एक महान समाज सुधारक, दार्शनिक और वेद प्रसारक के तौर पर कार्य किया है। दयानन्द ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास, कुरीतियों और जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाई और सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को पुनर्स्थापित किया।

अन्तिम शब्द-
       देश की आजादी के प्रेरक रहे महर्षि दयानन्द का सानिध्य स्वामी श्रद्धानंद, पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी, श्याम जी कृष्ण वर्मा, लाला लाजपतराय, लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, मदन लाल ढींगरा, महात्मा हंसराज जैसे महानुभावों को प्राप्त हुआ। इससे खिन्न होकर देशद्रोहियों ने उन्हें विविध रूपों में 17 बार विष दिया। परन्तु यौगिक क्रियाओं के माध्यम से स्वामी जी स्वयं को फिर स्वस्थ कर लेते थे। अंत में विधर्मियों द्वारा पिसा हुआ कांच दूध में पिलाने से स्वामी जी की प्राण लीला समाप्त हो गई। इस तरह वर्ष 1883 में दीपावली के दिन उन्होंने ‘हे ईश्वर, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो’ कहते हुए अपनी नश्वर देह का त्याग कर दिया। महर्षि दयानन्द का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को नतमस्तक करता रहेगा
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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

नववर्ष

     डॉ. कृष्ण के. ‘आर्य’                                                        

        नववर्ष पर विशेष


वर्षभर में दुनिया पचास से अधिक बार मनाती है नया साल


        दुनिया में नववर्ष मनाने की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। ‘पीछे छोड़-आगे दौड़’ की कल्पना मानव के स्वस्थ रहने की अनूठी कला है। अतीत की घटनाओं को पकड़कर रखने से व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। विश्व के मनीषियों ने बीते समय को भूल जाना ही श्रेष्ठकर माना है। यही कारण लगता है कि व्यक्ति एक दूसरे को देखा-देखी हर बार नववर्ष मनाने की होड़ में लगा रहता है ताकि भूत की घटनाओं को भूलकर भविष्य पर ध्यान दे सकें।
        एक जनवरी को नए साल का जश्न मनाने वाले शायद ही यह नहीं जानते होंगे कि संसार में पूरे वर्ष की अवधि के दौरान 50 से अधिक बार नववर्ष मनाए जाते हैं। इस वैज्ञानिक युग में इंसान के कदम चांद तारों की तरफ बढ़ रहे हैं लेकिन आज भी पूरी दुनिया कैलेंडर प्रणाली पर एक मत नहीं है। दुनिया में कैलेंडर प्रणाली कहीं सूर्य या चन्द्रमा तो कहीं सूर्य, चन्द्रमा और तारों की चाल पर आधारित मानी जाती है। इसके अतिरिक्त धार्मिक मान्यताओं पर भी विभिन्न कैलेंडर प्रणालियां लागू हैं। इस कारण केवल भारत में ही वर्षभर के दौरान दर्जनभर नववर्ष मनाए जाते हैं।
स्ंसार की आबादी लगभग 8.30 अरब है। इसमें विभिन्न मत-सम्प्रदायों को मानने वालों की बड़ी संख्या है। दुनिया में लगभग 29 प्रतिशत आबादी ईसाई मत को मानती है, जबकि इस्लाम को मानने वाले लगभग 26 प्रतिशत हैं। सत्य सनातन वैदिक धर्म (हिन्दू) को लगभग 15 प्रतिशत, बौद्ध लगभग 5 प्रतिशत, अन्य मतावलम्बी लगभग 2.5 प्रतिशत हैं तथा शेष किसी भी धर्म या मत-सम्प्रदाय से असंबद्ध रखते है। विश्व में यही लोग अपने-अपने मतानुसार नया साल मनाते हैं।
        दुनिया में सबसे अधिक आबादी ईसाई समुदाय की है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर पर आधारित नववर्ष मनाती है। संसार में इसी कैलेंडर के आधार पर अधिकतम जनसंख्या द्वारा नया साल प्रतिवर्ष एक जनवरी को मनाया जाता है। इसे अन्य मत, सम्प्रदायों तथा धर्म के लोग भी जाने-अनजाने में एक जनवरी को ही नववर्ष मनाते है। इसके अतिरिक्त अन्य मतों के लोग अपनी आस्था और सामाजिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर निम्न प्रकार से नया साल मनाते है।

ग्रेगोरियन कैलेंडर- एक जनवरी को मनाया जाना वाला ईसाई नववर्ष इसी कैलेंडर पर आधारित है। इसे रोमन कैलेंडर भी कहा जाता है। यह नववर्ष ईसाई समुदाय के अलावा अन्य मत-सम्प्रदाय के लोगों द्वारा भी मनाया जाता है। इस कैलेंडर में ही महीनों के नाम जनवरी से दिसम्बर होते हुए साल की संरचना बनती है। रोम के पहले राजा रोमुलस ने इसकी शुरुआत 10 महीनों के एक चंद्र कैलेंडर के तौर पर की थी, जो मार्च से शुरू होता था और सर्दियों को छोड़ देता था। रोम के दूसरे राजा नूमा पोम्पिलियस ने इसमें जनवरी और फरवरी जोड़कर इसे 12 महीनों का बना दिया। जूलियस सीज़र ने 45 ईसा पूर्व इस कैलेंडर को सौर वर्ष (365.25 दिन) के हिसाब से सुधार किया और 1 जनवरी को नए साल की शुरुआत कर दी। सन् 1582 में पोप ग्रेगरी ने लीप ईयर की गणना करते हुए इसमें 10 दिन जोड़कर आज का ग्रेगोरियन कैलेंडर बनाया, जिसे अब दुनिया भर में अपनाया जाता है।
पारसी कैलेंडर- नवरोज दुनिया में मार्च महीने में मनाया जाता है, परन्तु भारत में पारसी समुदाय शहंशाही कैलेंडर का पालन करते हुए इसे जुलाई-अगस्त महीने में मनाते है। इसे लगभग 3000 वर्ष पूर्व शाह जमशेद ने मनाया था, जिसमें लीप वर्ष की गणना नहीं की जाती है।
जैन नववर्ष- जैन समुदाय के लोग इसे दीवाली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाते है। माना जाता है कि दीवाली के दिन भगवान महावीर जी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसलिए इसके अगले दिन से नया साल मनाते हैं।
बौद्ध नववर्ष- बौद्ध नववर्ष वैशाख की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह चंद्र और सौर चक्र पर आधारित माना जाता है।
यहूदी नववर्ष- यहूदी नववर्ष को रोश हशनाह के नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ होता है वर्ष का आरम्भ। इसे सितम्बर-अक्तूबर में मनाया जाता है।
इस्लामी नववर्ष- इसे हिजरी नया साल भी कहा जाता है। यह चंद्र कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की पहली तारीख को मनाया जाता है। यह ग्रेगोरियन कैलेंडर से 10-12 दिन छोटा माना जाता है। इसे इस्लामिक समुदाय की स्थापना के संबंधित माना जाता है।
नानकशाही कैलेंडर- सिखों में नववर्ष बैसाखी के अवसर पर मनाया जाता है, जो 13-14 अप्रैल को होती है। इसी दिन सन् 1699 में खालसा पंथ की स्थापना हुई थी।

सनातन कैलेंडर- सनातन (हिन्दू) कैलेंडर में नववर्ष अनेक रूपों में मनाया जाता है। सत्य सनातन वैदिक धर्म के अनुसार यह सबसे प्राचीन कैलेंडर है, जिसमें सृष्टि संवत्, कलियुग संवत्, विक्रमी संवत् तथा शक संवत् प्रमुख है। हालांकि इनका नाम तथा काल भिन्न है, परन्तु ये सभी होते एक ही दिन है। वैदिक साहित्य में कालचक्र का निर्धारण सृष्टि के पहले दिन से ही किया है। इनकी गणना वैज्ञानिक पद्धति से की गई है।
1. सृष्टि संवत्- यह सृष्टि प्रारम्भ का दिवस माना जाता है। इस दिन सृष्टि क्रम का आरम्भ हुआ था। इस संवत् का पहला दिन चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा होता है। इसे नववर्ष अर्थात् नवरात्र के नाम से जाना जाता है। इसकी गणना के 1,96,08,53,126 वर्ष हो चुके हैं। इसलिए इसे सृष्टि संवत् कहा गया है।
2. कलियुग संवत्- वर्तमान कलियुग काल 3102 ईस्वी पूर्व रहा है। इसकी शुरुआत ग्रेगोरियन कैलेंडर से 2025 वर्ष पूर्व हुई थी अर्थात 5127 वर्ष पूर्व कलियुग का आरम्भ हुआ था। इसका पहला दिन अर्थात नववर्ष भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही होता है। इसे कलियुगाब्द भी कहा जाता है।
3. विक्रमी संवत्- इसकी शुरुआत सनातन वैदिक सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल में हुई थी, जो उनकी विरोधियों पर विजय से संबंधित है। इस संवत् का आरम्भ ईसाई नववर्ष से लगभग 57 वर्ष पूर्व हुआ था। इसका पहला दिन अर्थात नववर्ष भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही होता है। यह भारत का आधिकारिक संवत् है।
4. शक संवत्- इसका पहला दिन अर्थात नववर्ष भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही होता है। यह ग्रेगोरियन कैलेंडर की सन् ईस्वी 78 में आरम्भ हुआ था। यह भारत सरकार का राष्ट्रीय कैलेंडर है।

        धर्म के आधार पर सृष्टि संवत् ही दुनिया का सबसे प्राचीन काल गणना है। इसके अतिरिक्त विभिन्न देशों में विभिन्न नामों तथा तिथियों को नववर्ष को मनाने की परंपरा है। भारत में भी हिन्दु नववर्ष को उगादी, गुड़ी पड़वा इत्यादि नामों से जाना जाता है। नेपाल में विक्रमी संवत् ही अधिकारिक सरकारी कैलेंडर है। जापान में पहली जनवरी का दिन नववर्ष ननाई या ओशोगत्यु के नाम से जाना जाता है। अमेरिका, इंग्लैंड, ब्राजील, मिस्र, मेक्सिको, नाइजीरिया, फिलीपींस इत्यादी देशों में एक जनवरी को ही नववर्ष मनाया जाता है। प्राचीन स्कॉटिश नववर्ष 11 जनवरी, वेल्स में इवान वैली का नववर्ष 12 जनवरी, मेल्टिक नववर्ष 21 जनवरी तथा चीन लेबनान, कोरिया और वियतनाम में 22 जनवरी को नववर्ष मनाया जाता।
       इसके अतिरिक्त पुराने फ्रांस में एक अप्रैल को अप्रैल फूल के रूप में नववर्ष मनाया जाता है जबकि थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, कम्बोडिया तथा साओ के बेरादिन 5 अप्रैल 2004 को चीर नववर्ष मनाया जाता है। इसी तरह 13 से 16 अप्रैल के दौरान बैसाखी को दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों भारत बांग्लादेश, श्रीलंका, थाईलैंड म्यांमार तथा कम्बोडिया में नववर्ष मनाया जाता है।पारसी नववर्ष 22 अप्रैल, बेबीलोनियन 24 अप्रैल, बौद्ध मई, प्राचीन ग्रीक 21 जून, 29 जून को रयूनिक, अरमीनिया 9 जुलाई, 16 अगस्त को मलयालम, जोरोस्ट्रियन 23 अगस्त, 30 अगस्त को एलेक्जैन्ड्रियन नववर्ष तथा रूस के रूढ़िवादी ईसाई एक सितम्बर को नया साल मनाते हैं।
       अतः दुनिया के विभिन्न मतों, सम्प्रदायांे, धर्मों तथा विभिन्न देशों की अलग-अलग मान्यताओं के आधार ही नववर्ष मनाया जाता है। इस आधार पर वर्षभर में पूरी दुनिया में लगभग पचास से अधिक बार नववर्ष मनाया जाता है।

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सोमवार, 22 दिसंबर 2025

राष्ट्रीय गणित दिवस

 डॉ. कृष्ण के. आर्य                      

राष्ट्रीय गणित दिवस पर विशेष

गणित भारतीय ऋषियों की अमूल्य धरोहर

    गणित एक अद्भूत विषय है, जिसे पढ़े तो कठिन लगता है और समझे तो आसान लगने लगता है। गणित की कठिनता का कोई पैमाना नहीं होता है। यह उस आकाश गंगा की भांति है, जिसमें जितनी गहराई तक चलते जाएंगे उतनी ही नई विशेषताओं को जानने लगते हैं। गणित जहां एक सागर की तरह गहरा है, वहीं महासागर की भांति अथाह है। इसे समझने के लिए यदि गहराई में उतरा जाएगा तो गणित की थाह पाना भी आसान हो जाता है।

    गणित, जीवन का एक ऐसा पहलु है, जिसकी हमंे हर मोड़ पर आवश्यकता अनुभव होती है। यह केवल संख्याओं और आकृतियों का खेल नहीं है, बल्कि एक ऐसी भाषा है जो हमें प्रकृति और विज्ञान को समझने में मदद करती है। गणित समस्याओं के समाधान, तार्किक और विश्लेषणात्मक चिंतन विकसित करने में हमारी मदद करता है। यह हमें कठिन समस्याओं का समाधान ढूंढने की क्षमता प्रदान करता है। गणित केवल एकल विषय नहीं है, बल्कि ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी’, भौतिकी, रसायन विज्ञान, इंजीनियरिंग और कंप्यूटर विज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी गणित की भूमिका महत्वपूर्ण है। दैनिक जीवन की समस्याओं का हल, समय प्रबंधन, बाजारवाद और दूरी की गणना इत्यादि सभी गणित के अनुप्रयोग हैं।

गणित के अनेक भाग है, जिन्हें समझकर विभिन्न क्षेत्रों में महारत प्राप्त की जा सकती है। यह केवल जमा-घटा तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन को सहज बनाने का मुख्य क्षेत्र है। इसके मुख्यः तौर पर निम्न श्रेणियों में समझा जा सकता है।

1. अंकगणित- इससे व्यक्ति जोड़, घटाव, गुणा, भाग जैसी मूलभूत क्रियाएं जान सकता है।

2. बीजगणित- यह एक रोचक विधा है। इससे गणित की कठिन पहेलियों, समीकरण, बहुपद और चर-अचर इत्यादि का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता  है। 

3. ज्यामिति- इसकी सहायता से विद्यार्थी आकृतियों, कोणों का परिमाप और क्षेत्रफल का अध्ययन कर सकता है।

4. त्रिकोणमिति- इसमें त्रिभुजों एवं अन्य आकृतियों के कोणों का माप इत्यादि के मध्य संबंधों का अध्ययन करना आसान होता है। 

5. कैलकुलस- इसमें परिस्थितियों के परिवर्तन और उनकी गति का आंकलन करना आसान रहता है।

    गणित न केवल एक विषय है, बल्कि एक कौशल है जो हमें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकता है। गणित का करियर के तौर पर उपयोग सदैव लाभप्रद रहता है। वर्तमान दौर में डेटा साइंस, डेटा विश्लेषण, मशीन लर्निंग और एआई जैसी आधुनिक विधाओं में गणित की महत्वपूण भूमिका है अर्थात् गणित के बिना इनकी कल्पना भी नही की जा सकती है। गणित ‘इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर’, सिविल, मकेनिकल तथा इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में एक अहम् टूल के रूप में प्रयोग होता है। इतना ही नही, फिनटेक और एक्ट्यूरी बैंकिंग, निवेश और बीमा क्षेत्र की कल्पना गणित के बिना अधूरी है। इनमें गणितीय कौशल की हमेशा मांग है।

    भारत भूमि पर गणितीयः समझ सृष्टि के आदि से रही है। सातवें मन्वतर के ऋषि मनु से लेकर भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण से लेकर आधुनिक गणितज्ञ इस विद्या को भली प्रकार से जानते थे। लगभग नौ लाख वर्ष पहले श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास काल की अवधि और उसकी सटीक गणना, पांडवों 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष अज्ञातकाल का आंकलन तथा वर्ष के सूर्य और चंद्रमास की जानकारी इस बात की द्यौतक है।

    परन्तु महाभारत काल के पश्चात भी भारत भूमि पर अनेक गणितज्ञों ने समाज निर्माण में अपना योगदान दिया है। मगध की धरती पर लगभग 250 वर्ष ईसा पूर्व आचार्य चाणक्य ने एक महान ग्रन्थ ‘कोटिलीय अर्थशास्त्र’ की रचना कर हमारे महान गणितज्ञ होने का प्रमाण दिया है। आचार्य आर्यभट्ट, वराहमीहिर, ब्रह्मगुप्त, भास्करार्चाय तथा लीलावती जैसे गणितज्ञों ने गणित को विशेष पहचान दिलाई है। इतना ही नही, आधुनिक भारत के श्रीनिवास रामानुजन का नाम गणित के क्षेत्र में दुनिया को आश्चर्यचकित करने वाले महान गणितज्ञ के रूप में लिया जाता है। भारत में उन्हीं के जन्म दिन 22 दिसम्बर को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है।

    महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को मैथ्स का जादूगर कहा जाता है। आज उनकी 138वीं जयंती है। उनका जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु में हुआ था। हर साल उनकी जयंती पर नेशनल मैथमेटिक्स डे होता है। 33 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था। अपनी छोटी से उम्र में उन्होंने दुनिया को 3900 से ज्यादा गणितीय सूत्र, प्रमेय और अनंत श्रृंखलाएं दीं, जिनमें π (पाई) के जरिए गणना सटीक और तेज हुई। वैज्ञानिक आज भी उनके अनेक प्रमेयों का हल निकालने में लगे हुए हैं। मान्यता है कि 12 साल की उम्र में गणित के प्रति उनकी दीवानगी इतनी थी कि वे त्रिकोणमिती में महारत हासिल कर चुके थे। 

    वर्तमान में जीवन हर क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। श्रीनिवास रामानुजन का आज के एआई साइंस में महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है। न्यूरल नेटवर्क्स और मशीन लर्निंग की नींव रामानुजन के उन गणितय सूत्रों पर टिकी है, जिसकी वजह से सुपरकंप्यूटर, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी और एल्गोरिदम डिजाइन संभव हुआ।

    अतः आज राष्ट्रीय गणित दिवस पर हमें बच्चों में गणित के प्रति लगाव और उसे समझने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

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शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

गणतंत्र


         त्याग एवं बलिदान ही जनतंत्र का प्रहरी

   भारत का इतिहास अति प्राचीन है। यह देवों की धरती है। इस पर महर्षि, मनस्वियों से लेकर भगवान श्रीराम, सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र एवं भगवान श्रीकृष्ण जैसे आप्त पुरुषों ने जन्म लिया है और संसार का मार्ग दर्शन किया है। इस दिव्य धरा पर सदैव सत्य सनातन वैदिक आचरण को ही व्यवहार में लाया जाता रहा है। महाभारत युद्ध के उपरान्त देश को भारी सामाजिक और आध्यात्मिक हानि उठानी पड़ी, जिसकी भरपाई आज 5 हजार से अधिक वर्ष बीत जाने पर भी नही हो पा रही है। 

आज से लगभग 2350 वर्ष पूर्व तक सब ठीक से चलता रहा, परन्तु महान सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य काल में सिकन्दर ने भारत के कुछ भाग पर हमला किया। मात्र 30 वर्ष की आयु में दुनिया जीतने वाले सिकन्दर को आचार्य चाणक्य के मार्गदर्शन में चन्द्रगुप्त मौर्य ने भारत-भूमि से भगा दिया। इसके सैकड़ों वर्षों बाद तक देश को सम्राट अशोक, सम्राट विक्रमादित्य, राजभोज जैसे अनेक आर्य प्रतापी राजाओं ने देश की शालीनता और संस्कृति को बचाकर रखा। परन्तु उनके पश्चात अनेक विदेशी हमलावरों का आना आरम्भ हो गया।

पुर्तगाली, फ्रांसिसी, यवन, मुगल तथा अंग्रेजों ने जमकर भारत का दोहन किया। इनसे मुक्ति पाने के लिए समय-समय पर असंख्य वीर बलिदानियों ने भारत माता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इन विदेशी हमलावरों को नाकों चने चबाने के लिए दक्षिण के महाराज कृष्णदेव राय, रानी दुर्गावती, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई, टांत्या टोपे, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के नामों को भूलाया नही जा सकता है। इनके अतिरिक्त अनेक वीरों के बलिदानों से भारत माता ने 15 अगस्त 1947 को आजादी की खुली हवा में सांस लिया। इसको सुचारू रूप से चलाने के लिए बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर द्वारा बनाए गए संविधान को 26 नवम्बर 1950 को अंगिकार कर लिया गया तथा आज ही के दिन 26 जनवरी 1950 से देश में संविधान लागू कर दिया गया।

इसी संविधान में दिए गए अधिकारों की बदौलत आज हमने अपना राष्ट्रीय ध्वज फहराया है। यह तिरंगा हमारी आन, बान और शान का प्रतीक है, जो सदैव आसमान में यूं ही सबसे ऊंचा लहराता रहे। इसका दंड स्तम्ब सदैव मजबूत रहे, जिससे हमारा देश हमेशा बुलंदियों को छूता रहे। यह कामना हम सब करते हैं। इस पर किसी ने कहा कि..   

‘झंडा ऊंचा रहे हमारा, डंडा है झंडे का सहारा और डंडे ने दुष्टों को सुधारा’

हमारा झंडा ऊंचा कैसे रहेगा, हमारे देश का गणराज्य कैसे चिरस्थाई बना रहे। इसके लिए त्याग, बलिदान और दंड की आवश्यकता है। यह हमारी जन्मभूमि है, जो स्वर्ग से भी महान है। 

‘जननी जन्मभूमिस्य स्वर्गादपि गरीयसी’

अतः अपनी जन्मभूमि को कैसे महान बनाया जा सकता है। वेद में इस विषय पर संगठन सुक्त में कहा है।

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनासि जानताम,

देवा भागं यथा पूर्वे सं जानाना उपासते।

कि हम एक साथ चले, एक जैसा बोले, हमारे मन एक समान हों ताकि हम अपने देवतुल्य पूर्वर्जों की भांति अपने कर्त्तव्यों का पालन करते रहें।

    परन्तु इसके लिए हमें तप करना होगा, स्वयं को साधना होगा तथा हमें उन दोषों से दूर रहना पडे़गा, जो महाभारत के शांतिपर्व में कहे गए हैं।

क्रोधो भेदो भयं दण्डः, कर्षणं निग्रहो वधः।

नयत्य रि वशं सद्यो गणान् भरत सत्तम।।

गणराज्य के लोगों में क्रोध, आपसी फूट, भय, एक-दूसरें को निर्बल बनाना, परेशानी में डालना या मार डालना की प्रवृति होने से हम, हमारे घर, परिवार तथा समाज शत्रुओं के आगोश में चला जाता है।

हमारा यह भारत युगों से ‘एक-भारत’ है तभी तो ‘श्रेष्ठ-भारत’ है। महाराज भरत के नाम से बने भारत में यह भावना कूट-कूटकर भरी थी। महाराज भरत ने अपने नौ पुत्रों में से युवराज पद के लिए किसी को भी योग्य नहीं समझा। मेरी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ में इस संदर्भ में दिया है कि उनकी अयोग्यता के कारण महाराज भरत ने अपने राज्य के कुशल एवं योग्य युवक ऋषि भरद्वाज पुत्र भूमन्यु को देश की भागडोर सौंपी, जो एक उत्कृष्ट लोकतंत्र एवं गणतंत्र का उदाहरण है।

सैकड़ों वर्षों की गुलामी से हम आजाद हो गए हैं, जिससे हमें राजनैतिक, सामाजिक आजादी प्राप्त हुई है परन्तु क्या हम मानसिक रूप से आजाद हो सकें हैं। यह एक यक्ष प्रश्न है ! इसके बिना बौधिक आजादी तथा आध्यात्मिक आजादी भी नही हो सकती है। आज हमें अध्यात्म के नाम पर कोई भी हांक कर ले जाता है। यह कितना सही है, परन्तु विचारणीय है! इसलिए यह कहा जा सकता है कि...

राज आजाद, समाज आजाद, आजाद कृष्ण सब ओर,

बिन मन आजाद, अध्यात्म आजाद, नही कहीं पर ठोर।।


                           कृष्ण कुमार ‘आर्य’


शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

हिन्दी दिवस

10 जनवरी विश्व हिन्दी दिवस पर विशेष

 

    भाषा किसी भी प्राणी की एक विशेष अभिव्यक्ति है, जिससे वह आसपास और समाज को अपने क्रियाकलापों की जानकारी देते हैं। भाषा न केवल मानवमात्र के लिए उपयोगी होती है परन्तु जीव-जन्तु भी इससे अछूते नही हैं। पक्षी अपनी चहचाहट, पशुओं का राम्बना (आवाज) तथा जानवर अपनी गर्जना से ही सभी सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। इसी प्रकार मानव भी अपने रहन-सहन की आदतों, क्षेत्र की परिस्थितियों तथा समाज के व्यवहार से बोलना सीखते हैं और भावनाओं को अपने भाव द्वारा प्रदर्शित करते हैं। इतना ही नही, भाषा उनकी जीवनशैली को ही प्रदर्शित करती हैं।

          विश्व में विभिन्न भाषाओं के बोलने वालों की कमी नहीं है। दुनिया में लगभग 7139 भाषाओं को बोला जाता है। विभिन्न देशों में अधिकतर बोले जाने वाले वाक्य वहां की बोली का रूप धारण कर लेते हैं, जिससे भाषा का प्रादुर्भाव होता है। दुनिया में मुख्य रूप छः भाषाएं से बोली जाती है। इसमें सबसे अधिक लगभग 145 करोड़ लोग अंग्रेजी भाषा बोलते है, चाईनिज 113 करोड़, हिन्दी लगभग 61 करोड लोगों द्वारा विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जानी वाली भाषा है, वहीं स्पैनिस भाषा को लगभग 56 करोड़, फैंच को लगभग 31 करोड़ तथा अरबी भाषा के जानकार लगभग 27 करोड़ लोग हैं। 

    इतना ही नही, किसी देश के अधिकतर भागों में बोली जाने वाली भाषा भी विभिन्न क्षेत्रों में बोली का रूप ले लेती है। भारत भी इससे अछूता नही है। भारत में मूल भाषा हिन्दी सहित कुल 22 भाषाएं अनुसूचित हैं, जो देश के विभिन्न प्रदेशों में बोली जाती है। स्थानीय स्तर पर इन्हीं भाषाओं में कार्यों के निष्पादन को प्राथमिकता दी जाती है। भारत के विषय में कहावत है कि...

कोस-कोस पर बदले पानी, तो चार कोस पर वाणी

          भारत एक बहुभाषी देश है, जहां लगभग 780 बोलियां बोलचाल का माध्यम है। यदि किसी एक प्रदेश जैसे हरियाणा के विषय में समझने का प्रयास किया जाए तो, उसके एक ही शब्द को जीन्द में जो बोला जाता है तो उसी शब्द का भिवानी या सिरसा में रूपांतरण हो जाता है। परन्तु हमारी मूल भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी को पूरे उत्तर भारत में बोला एवं समझा जाता है। हिन्दी भारत की मूल और आत्मिक भाषा है, जिसको बच्चा भी समझ और बोल सकता है। भारत के बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल, झारखंड, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान तथा उत्तराखंड सहित कुछ अन्य प्रदेशों में हिन्दी बोली जाती है। भारत में सबसे अधिक लगभग 57 करोड़ लोग हिन्दी को अपनी मूल भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं, जो देश की कुल आबादी का लगभग 44 प्रतिशत से अधिक है और लगातार बढ़ भी रहा है। भारत के अतिरिक्त श्रीलंका, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, दक्षिणी अफ्रीका, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में भी हिन्दी बोलचाल की भाषा के रूप में प्रयोग की जाती है।

          विश्व की प्रमुख भाषाओं में हिन्दी का विशेष स्थान है। प्राचीन भारत की एक नदी सिन्ध से हिन्द और सिन्धु से हिन्दु तथा सिन्धी से हिन्दी की उत्पत्ति मानी जाती है। भारत की राजभाषा भी हिन्दी ही है, जिसका मूल स्त्रोत संस्कृत भाषा को माना जाता है। हिन्दी एवं संस्कृत दोनों भाषाओं की लिपी देवनागरी है, इसमें 11 स्वर और 33 व्यंजन हैं। इस भाषा को बाईं से दाईं ओर लिखा जाता है, जबकि कुछ भाषाएं दाईं से बाईं ओर लिखी जाती है। भारत में हिन्दी को राजभाषा के रूप में 10 जनवरी 1949 को अपनाया गया था। इसके बाद भारत सरकार ने वर्ष 2006 में इस दिन को विश्व हिन्द दिवस के रूप में मनाने की शुरूआत की ताकि हिन्दी को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलवाई जा सके। 

    व्यक्ति अपनी भाषा में ही स्वयं को पोषित कर सकता है। अपनी मातृ भाषा हिन्दी में संवाद, व्यवहार, लेखन और पठन करने से हम न केवल अपनी संस्कृति को बढ़ावा दे सकते हैं बल्कि अपनी परम्पराओं तथा मूल्यों को भी सहजता से व्यक्त कर सकते हैं। आज अनेक लेखक विश्व स्तर पर हिन्दी को वैश्विक पहचान देने के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं। केन्द्र एवं हरियाणा सरकार भी हिन्दी भाषा लेखकों को साहित्य अकादमी के माध्यम से प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे अनेक साहित्यकार अपनी रचनाओं से हिन्दी को नई पहचान दिलवा रहे हैं।

    हमारे प्राचीन ग्रन्थ वेदों की रचना हिन्दी की जनक कही जाने वाली संस्कृत भाषा में ही हैं, वहीं रामायण, महाभारत तथा अनेक साहित्य हिन्दी एवं संस्कृत भाषा में लिखे गए है। हिन्दी भाषा भारत और भारत से बाहर रहने वाले लोगों को जहां एक कड़ी में पिरोने का कार्य कर रही है, वहीं इससे एक-दूसरे के मर्म समझना भी आसान बनाती है। अतः हिन्दी को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने की जिम्मेदारी प्रत्येक भारतीय को समझनी चाहिए।

अन्त में कहना चाहँुगा कि हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए हमें, स्वयं हिन्दी के प्रति समर्पित होना चाहिए। हिन्दी को भाषा नही बल्कि एक संस्कृति का द्योतक और जीवनशैली है। एक कवि ने कहा कि ...

हिंद देश हिन्दुस्तां हमारा, हिंदी हमारी पहचान।

भारत के माथे की बिन्दी हिन्दी, देश का गौरव गान॥

 

कृष्ण कुमार आर्य


शनिवार, 9 अप्रैल 2022

सूर्य की गति का द्योतक है उगादी


        देश में मनाए जाने वाले त्यौहार भारतवर्ष की प्राचीन सभ्यता के परिचायक हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने ऋतुओं के परिवर्तन, सूर्य की गति और सामाजिक परम्पराओं के आधार पर विभिन्न उत्सव मनाने की व्यवस्था दी है ताकि जीवन सदैव उल्लास से भरा रह सके। “उगादी” उसी भारतीय संस्कृति का संवाहक है, जो भारतीय नववर्ष के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। 

      यह वह दिन है जब ईश्वर ने सृष्टि की रचना की थी, जिससे युगों एवं वर्षों का आरम्भ हुआ था। यह दिन सृष्टिक्रम से जुड़ा हुआ है। इसलिए इसको सृष्टिवर्ष भी कहा जाता है। युगों की शुरूआत इसी दिन होने कारण इसे युगादि भी कहा जाता है। इतना ही नही वैदिक सनातन धर्म के अनुसार वर्ष की गणना इसी दिन से आरम्भ होती है, इसलिए भारतवंशी इसे नववर्ष के रूप में मनाते हैं। भारतीय संस्कृति के परिचालक दक्षिण भारत में इस पर्व को युगादि अर्थात ‘उगादि’ के नाम से जाना जाता हैं। यह पर्व चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को मनाया जाता है, अतः इसे वर्षी प्रतिपदा भी कहा जाता हैं। 

     ऐसी मान्यता है कि ईश्वर ने जिस दिन सृष्टि रचना का कार्य आरम्भ किया था, उसी दिन को चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा कहा जाने लगा। सृजन का यह कार्य नौ दिन-रातों तक यह निरंतर चलता रहा, इसलिए इन्हें नवरात्र कहा गया। इसी दिन से पूरे देश में नौ दिनों तक नवरात्र मनाए जाते हैं और मातृशक्ति दुर्गा के नौ रुपों की पूजा की जाती है। वर्ष 2024 में यह दिन 9 अप्रैल को था। यह वह समय होता है जब बसंत ऋतु अपने यौवन पर होती है। प्रत्येक दिशा में प्रकृति का शोधन होता दिखाई देता है। इन दिनों में सभी पेड़, पौधों एवं झाड़ियों पर रंगबिरंगे फूलों से मन प्रफुल्लित हो उठता है और वातावरण में एक मंद-मंद सुगंध का प्रवाह रहता है। पौधों पर नई-नई पत्तियों तथा फलों का आगमन होता है। प्रकृति का यह मनोहर दृश्य वर्ष में केवल इन्हीं दिनों में दिखाई देता है। 

      हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि ‘पिंडे सो ब्रह्मांडे’ अर्थात् जो हमारे पिंड यानि शरीर में है] वही ब्रह्मांड में है तथा जो ब्रह्मांड में है] वही हमारे शरीर में है। प्रकृति की भांति प्राणियों के शरीरों में भी नवरक्त और नवरसों का संचार होता है। इसलिए इस समय को नवरस काल कहा जाता है। हरियाणा में इसे न्यौसर कहते हैं। इस समय शरीर में बहने वाली नई ऊर्जा से मन उत्साह और उल्लास से भर जाता है। इस दौरान श्रद्धालु माता दुर्गा के अष्टरुपों की उपासना करते हैं और उपवास रखते हैं, जिससे हमारा शरीर निरोग एवं शुद्ध होता है। 

     युगादि सृष्टि सृजन का वह दिन है] जिसको देश में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश] तेलंगाना] कर्नाटक] महाराष्ट्र इत्यादि प्रदेशों में इसे युगादि अर्थात उगादी के नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत के पंजाब] हरियाणा] दिल्ली सहित कई राज्यों में इसे नवरात्र एवं बैशाखी भी कहते हैं। इसी समय नई फसल के आगमन पर घरों में खुशियों का माहौल होता हैं। विभिन्न प्रदेशों में जहां इस पर्व को अलग-अलग ढंग से मनाते हैं] वहीं उनके खाने का शौक भी भिन्न होता है। दक्षिण भारतीय राज्यों में श्रद्धालु पच्चडी का सेवन करते हैं। पच्चडी को कच्चा नीम] आम के फूल] गुड] इमली] नमक और मिर्च के मेल से बनाया जाता है। वहीं उत्तर क्षेत्र में नवरात्रों पर फलाहार] शामक] साबुधाना की खीर खाते है। बैशाखी पर हलवा एवं रंगीन मीठे चावलों का भोग लगाया जाता है। 

      भारतीय नववर्ष एवं नवसंवत्सर का ऐतिहासिक महत्व भी है हमारे तपस्वी पूर्वजों ने इस दिन की प्राकृतिक महत्ता को समझते हुए, इसे हमारे सांस्कृतिक पन्नों में जोड़ा है ताकि हमारी भावी पीढ़ियां इसे जीवन का अंग बना सके। सत्य सनातन वैदिक शास्त्रों के अनुसार सृष्टि की रचना 1960853125 वर्ष पूर्व भारत की इसी धरा पर हुई थी। इसके पश्चात से ही निरंतर सृष्टिक्रम चलता रहा है। विभिन्न कालखंडों में अनेक यशस्वी राजाओं और महापुरुषों ने इस धरा पर जन्म लिया है। उन्होंने लोगों के जीवन को सरल और सहज बनाने के लिए अपनी संस्कृति के प्रसार हेतु अनेक प्रयास किए। इस दिन के महत्व को समझते हुए भगवान श्रीराम ने लगभग 9 लाख वर्ष पूर्व लंका विजय के उपरांत चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को अयोध्या का राज सिंहासन ग्रहण किया था। महाभारत युद्ध के उपरांत युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। महाभारत काल के बाद देश में महान एवं तपस्वी राजा वीर विक्रमादित्य हुए हैं] उनका राज्याभिषेक भी चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को हुआ था। 

     देश के इस महान सपूत एवं प्रतापी राजा वीर विक्रमादित्य के नाम से आरम्भ हुए वर्ष को विक्रमी सम्वत कहा जाता है, जिसे 9 अप्रैल को आरम्भ हुए 2081 वर्ष हो गए हैं। कलियुग का आगमन भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही 5125 वर्ष पूर्व ही हुआ था। महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना भी इसी दिन की थी। इस तरह उगादी हमारे देश का महान और सृष्टि सृजन का त्यौहार है। परन्तु आज हम अपनी प्राचीन संस्कृति और मान्यताओं को भूल गए हैं, जिसके कारण हमारे आचार] विचार और व्यवहार में परिवर्तन हुआ है। भारतीय समाज और जनमानस के लिए यह विचारणीय है। 
     अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि--- 

मंद-मंद धरती मुस्काए, मंद-मंद बहे सुगंध। 
ऐसा ‘उगादी’ त्यौहार हमारा, सबके हो चित प्रसन्न।। 

 जयहिन्द

 कृष्ण आर्य

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014


आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्‍यात हुए। 
इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत ‍और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्‍ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्‍देश्य से अभिव्यक्त किया।
वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई ‍नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश - 
1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।
2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता - ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।
3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।
4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।

5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।

6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

7. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।
8. ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल दूसरों की सेवा करना है। ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे विद्या ग्रहण करें। राजा का कर्तव्य है कि वे सैनिकों द्वारा अपने बल को बढ़ाते रहें। वैश्यों का कर्तव्य है कि वे व्यापार द्वारा धन बढ़ाएँ, शूद्रों का कर्तव्य श्रेष्ठ लोगों की सेवा करना है।
9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।
10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।
11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को ‍अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।
12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।
13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वे‍दादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।
14. चाणक्य कहते है कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।
15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।
17. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।
18. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।
19. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।
                                                  साभ्‍ाारः चाण्‍ाक्‍य नीति                                                                                                                                                                                                           कृष्ण कुमार ‘आर्य’


सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

क्यू पैदा होता है हर वर्ष रावण !


क्यू पैदा होता है हर वर्ष रावण !


भारत की देव भूमि पर अनेक ऋषि-मुनि तथा महापुरूष समय-समय पर जन्म लेते रहे हैं। इस धरती को जहां राम, कृष्ण तथा हनुमान जैसे मनीषी वीरों ने अलंकृत किया है वहीं रावण तथा कंस जैसे दुराचारियों ने सामाजिक मर्यादाओं को तार-तार भी किया है। राम ने अपने मर्यादित जीवन तथा कृष्ण ने गीता उपदेश से जहां समाज को बंधनमुक्त करने का कार्य किया वहीं रावण और कंस जैसे दुष्टों ने अपनी दुष्टता से समाज को बंदी बनाने में भी कमी नही छोड़ी। इसलिए त्योहारों के अवसर पर हम भी उन महापुरूषों के गुणों को धारण करने और अवगुणों को छोड़ने की शिक्षा देते रहते हैं।
समाज के उपकार के लिए ही हम इस प्रकार के कार्य करते हैं ताकि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन मधुर हो सकें परन्तु हमें इस बात का जरा सा भी ईलम नही है कि क्या हम इतनी योग्यता रखते हैं? जिससे भोले-भाले लोगों का सही मार्गदर्शन कर सकें या क्या हम उस ज्ञान को रखते है? जिसे दूसरे लोगों के लाभ के लिए बांटना चाहते हैं या वह शिक्षा हमारी पथप्रदर्शक है? जिसकी सहायता से हम समाज को बदलने की कामना रखते हैं या हमारा आचरण उसी स्तर का है? जैसा हम दूसरों को बनने का उपदेश करते हैं अर्थात क्या हम वो कृष्ण है, जिसने अधर्मियों को सजा देकर एक महा-न-भारत की स्थापना की थी या फिर वह राम हैं, जिसने रावण जैसे आतताई से छुटकारा दिला कर जीवन में आदर्शों का पुनः उत्थान किया था।
इन सभी सवालों का जवाब यदि नही है! तो फिर क्यूं हम उन भोले भाले लोगों को दिग्भ्रमित कर स्वयं तथा समाज को दोखा दे रहे हैं; क्यों उस झूठी शिक्षा का प्रचार कर रहे हैं, जो हमारा भी उपकार करने में सक्षम नही है तथा क्यों उस रावण के वध करने का नाटक कर रहे हैं; जोकि हर वर्ष फिर पैदा हो जाता है और लोंगों को फिर से उसे जलाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। काश! हम अपने आचरण से समाज को बदलने का जज्बा रखते, जिससे समाज में व्यवहारिक बदलाव दिखाई दे सकता। परन्तु अपने आचारण के विपरित कर्म करके हम कहीं समाज में बुराईयों को बढावा तो नही दे रहे है या उस पाखंड की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जो हमें अन्दर ही अन्दर खोखला कर रहा है। क्या? हम रावण की उन राक्षसी वृतियों का प्रचार-प्रसार तो नही कर रहे, जो कि हर वर्ष रामलिला के मंच से दिखाई जाती है। इन सभी बातों का जवाब हमें ढूंढना होगा और यह पता लगाना होगा कि वह रावण! जिसको अपमानित करके हर वर्ष जलाते है, वह फिर दोबारा जन्म कैसे ले लेता है?
रावण को सिर्फ व्यक्ति ही नही बल्कि बुराइयों का प्रतिक भी माना जाता है। ये बुराइयां ऐसी हैं, जो समाज को घुन की तरह खाये जा रही है। ऐसी बुराईयां हैं, जिनके कारण समाज तथा राजतंत्र को लकवा मार रहा है, इन्हीं बुराईयों के कारण ही आज समाज में बहन और बेटियों को सम्मानित जीवन जीने के लिए मोहताज होना पड़ रहा है। हर वर्ष रावण को जलाने वाले राम की संख्यां लाखों होते हुए भी हर वर्ष लाखों सीता माता जैसी देवियों की इज्जत तार-तार की जाती है, हजारों कन्याएं अपने सतीत्व की रक्षा करने में असमर्थ होकर आत्महत्या कर लेती है परन्तु उन्हें अपने आंसू पौछने वाला कोई राम नही मिलता।
राम के चरित्र को दर्शाने के लिए देशभर में हजारों मन्दिर बनाये गए है परन्तु उन्हीं दक्षिण के मन्दिरों में तथाकथित लाखों देवदासियां बेबसी, लाचारी तथा असहाय होकर रावण वृतिक अनेक पुजारियों की वासना का शिकार बनती आ रही है। हालांकि विभिन्न मत तथा सम्प्रदाय इस प्रकार की बातों को स्वीकार नही करते परन्तु कुछ तो हो ही रहा है। मध्यकालिन युग से शुरू हुई इस प्रथा में सूले, भोगम या सानी जैसे नामों से जाना जाता था, जिसका अर्थ धार्मिक वेश्या ही होता है।  
भाईयों! यह रावण हम सबके बीच में रहता है, हम हर रोज इससे दुआ-स्लाम करते है परन्तु कभी पहचान नही पाते। इसी कारण आज समाज में इस प्रकार की अस्थिरता का माहौल पैदा हो रहा है। यह रावण कोई ओर नही बल्कि केवल हमारा आचरण है, हमारी वासना और वे सभी दुष्वृत्तियां है, जिसने समाज की रीढ़ को तोड़ दिया है। यह रावण हमारे विचार है तथा हमारी उच्च-नीच भेद की मानसिकता है जो समाज को संगठित होने से रोक रही है। इन बुराईयों को मिटाने के लिए रामलीला में पर्दे के पीछे वाले राम की नही बल्कि सदाचारी, सहनशील तथा दूसरों की बहन-बेटियों को अपनी बहन-बेटियां से समान समझने और स्वीकार करने वाले राम की आवश्यकता है।
आज बड़े-बड़े नेता, मंत्री तथा उद्योगपति रामलीलाओं का उद्घाटन करते है, रामलीलाओं के मंचों से रावण, मेघनाथ तथा कुम्भकरण के पुतलों को आग लगाते है। परन्तु क्या इनको पता है कि राम के बाण और हनुमान की गद्दा केवल दुष्टों को दंड देने के लिए ही उठती थी। उनका बल असहाय, गरीब तथा सदाचारी, ईमानदार और योग्य लोगों की रक्षा और सुरक्षा के लिए प्रयोग होता था; व्यभिचारी, ढोंगी, बहरूपियों तथा कदाचिरों के बचाव में षडयंत्र रचने के लिए नही। आज के मंचनकर्ताओं को इस बात का अहसास होना चाहिए कि राम एक आदर्श पुत्र, सदाचारी, देश प्रेमी, हर प्रकार के नशों से दूर तथा सम्पूर्ण प्रजापालक श्रेष्ठ राजा थे तथा देश की बहन-बेटियों की आबरू की रक्षा के लिए स्वयं का जीवन आहूत करने के लिए तैयार रहने वाले महापुरूष थे।
दशहरे के पावन पर्व पर समाज के सभी वर्गों को चाहिए कि राम के जीवन को अपनाते हुए रावण जैसी दुष्वृत्तियों का नाश करें। राम के आदर्शों को अपनाते हुए समस्त बुराईयों पर विजय पताका फहराएं। राम की शिक्षाओं, आचार-विचार, व्यवहार तथा ब्रह्मचर्य जैसे अमोघ राम बाणों को अपना कर देश में राम राज्य लाने के लिए प्रयत्न करें, जिसमें न कोई चोर हो, न भूखा, न बिमार तथा न ही व्यभिचारी पुरूष हों। जब व्यभिचारी पुरूष नही होगा तो व्यभिचारिणी स्त्री स्वतः ही नही होगी और समाज कुदंन बन जाएगा। इससे समाज को नई दिशा, चेतना और जागृति मिल सकेगी औरदेश में कोई भी अहंकारी, दम्भी, द्वेषी, कपटी तथा धोखेबाज न रह सके।
यदि हम ऐसा करने में सफल होते है तो हमारी धरती से रावण जैसा भूत हमेशा हमेशा के लिए मिट जाएगा। इससे हमें बार-बार रावण को जलाना नही पडेगा अन्यथा वही रावण फिर हर वर्ष जन्म लेगा, बढे़गा तथा संसार को अंधकार और व्यभिचार की गर्त में धकेलता रहेगा और उस नकली रावण को मारने के लिए नकली राम बनते रहेंगे तथा समस्या जस की तस बनी रहेगी। हर वर्ष हम उसे मारने के लिए कागज के पुतले जलाते रहेंगे। इससे केवल पैसे की बर्बादी और प्रदूषण बढ़ने के सिवाय कुछ भी हमारे हाथ नही लेगेगा और हमें हर बार यह सोचना नही पड़ेगा कि ‘क्यू पैदा होता है हर वर्ष रावण
                           
                                           कृष्ण कुमार ‘आर्य




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