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सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

राधे-राधे

 राधे-राधे


       राधे, राधे, राधे, तू ओ३म् भूर् गा ले,

      ओ३म् भूर् गाले तू, भूव स्वः गा ले,

      राधे, राधे, राधे, तू ओ३म् भूर् गा ले,

      ओ३म् भूर् गाले तू, कष्ट मिटा ले, 

कष्ट मिटा ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...

सुख दिला तत्, सवितुर गा ले,

सूरज की भांति, जीवन उज्जवल बना ले,

वर योग्य ईश्वर, तू वरेण्यं गा ले,

भर्गाे से कर्मों को, शुद्ध बना ले,

शुद्ध बना ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...

भर्गाे है वह, तू उद्धार करा ले,

       देवस्य वह प्रभु, तू दिव्यता अपना ले,

धीमहि संग उससे, चिंतन लगा ले,

धियो के साथ तू, बुद्धि उत्तम पा ले,

बात ये मान ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...

‘यो’ है जो, ये मेरी बात मान ले,

       नः है हमारी, तू प्रचोदयात् सुना ले,

ईश स्तुति से तू, बुद्धि बल पा ले,

राधे राधे तू, ये सबको सुना ले,

सबको सुना दे तू, ‘केके’ को सुना दे, राधे, राधे, राधे...



डॉ. के. कृष्ण आर्य 


बुधवार, 17 सितंबर 2025

मित्रता की डोर

 मित्रता की डोर

 

दिल से दिल को बांधे रखती,

और परेशानी को करती आसान,

जो एक दूसरे पर जमाए जोर,

वह है केवल मित्रता की डोर।

बिना खून के संबंध बने,

भावना संग दूसरे से जुड़े,

जाति बंधन दे जो तोड़,

वह केवल मित्रता की डोर।

रहे साथ खड़ा मुश्किल में,

न फूला समाए खुशी में,

जो भावों का है मजबूत जोड़,

वह है केवल मित्रता की डोर।

वह वसंत ऋतु की खुशबु,

बहे रंग हरा, सरसों की सुगंध,

जब वह पहुँचाए उनकी डगर,

है जो केवल मित्रता की डोर।

एक जमाना श्रीराम का भाई,

निषाद संग मित्रता निभाई,

नहीं बड़ा छोटा था किसी ओर,

ऐसी होती है मित्रता की डोर।

श्याम के महल सुदामा आए,

खुशी के आंसु से वह नहलाए,

ऐसी दोस्ती न देखी कोई और,

दे सम्मान बढ़ाए मित्रता की डोर।

आज जमाना बस ‘केके’ ऐसा,

अपनी खुशी में जग खुश जैसा, 

स्वार्थ सिद्धि पर भागे कहीं ओर,

फिर कौन उड़ाए मित्रता की डोर।


                                                                                       डॉ. के कृष्ण आर्य ‘केके’


बुधवार, 30 जुलाई 2025

मैं अमीर हूँ!

 

 मैं अमीर हूँ!

        मैं सुबह को खाऊँ, रात को खाउऊँ

        मैं खाँऊ ऊल-जुलूल,

        वह क्यूँ टोके, क्यूँ मुझे रोके,

        तुम रहे क्यों मुझको बोल,

        सुनने की मुझे आदत नहीं,

        मैं ऐसे ही खुश रहता हूँ।

क्योंकि मैं अमीर हूँ!

रात को मैं क्लब में जाऊँ,

चार बजे घर को आऊँ,

खाना खाँऊ ना सोने जाऊँ

बारह बजे तक बाहर न आऊँ,

किया क्या रातभर मैंने,

ये क्यूँ मैं तुमको बतलाऊँ।

क्योंकि मैं अमीर हूँ!

बाद दोपहर मैं पढऩे जाऊँ,

पैंट ऊंची सर्ट सिलाऊँ,

तंग वस्त्र से अंग दिखाऊँ,

ऊंचे सैंडल की चाल चलाऊँ,

कहेे कोई तो उत्पात मचाऊँ,

सूनो तुम! हम ऐसे ही रहते हैं।

क्योंकि हम अमीर हैं!

होटल पर मैं नाश्ता खाऊँ,

नाश्ते में आमलेट मँगवाऊँ,

रात चढ़ें बोतले ले आऊँ,

बैठ संगी संग पैग बनाऊँ,

कोई कहे तो उसे समझाऊँ,

जाओ! नही तो अन्दर कराऊँ।

क्योंकि मैं अमीर हूँ!

मां-बाप से जुबाँ लडाऊँ,

व्यवहार शुन्यता उनसे दिखलाऊँ,

        आचारहीन सा आचरण अपनाऊँ,

‘केके’ उससे मैं डरता जाऊँ,

किसी और को क्या बतलाऊँ,

जब विचार उसके मलीन है।

क्योंकि वह अमीर है!

                                                                     डॉ. के कृष्ण आर्य ‘केके’


गुरुवार, 17 जुलाई 2025

चिड़ियां

 चिड़ियां


      एक चिड़िया, अनेक चिड़ियां,

      दाना चुगने जाएं चिड़ियां

      भोर भए उठाएं चिड़ियां,

गीत सुरीले सुनाए चिड़िया, अनेक चिड़ियां। 

सूरज संग लाए चिड़िया,

फैला पंख हर्षाए चिड़िया,

राग रसीला गाए चिड़िया,  

मन मधुर बनाए चिड़िया, अनेक चिड़ियां। 

तिनका चुनकर लाए चिड़िया,

        घोंसला सुन्दर बनाए चिड़िया,

        कीट पतंग खाए चिड़िया,   

जीवन मनोहर बनाए चिड़िया, अनेक चिड़ियां। 

       ची-ची करती आएं चिड़ियां,

       संग ओरों को लाएं चिड़ियां,

       प्यास कैसे वो बुझाएं चिड़ियां,

मुस्कान लबों पर लाएं चिड़िया, अनेक चिड़ियां 

      चोंच से गंध मिटाए चिड़िया,

      झूंड में उडऩा सिखाए चिड़ियां,

      एकता का पाठ पढ़ाएं चिड़ियां,

एक रस रहना बताएं चिड़ियां, अनेक चिड़ियां। 

दुःख में संग रहे चिड़ियां,

सुख में घूमने जाएं चिड़ियां,

सुन्दर आसमां बनाएं चिड़ियां,

‘केके’ को जीना सिखाए चिड़िया, अनेक चिड़ियां। 


                                                                                     डॉ. के कृृष्ण आर्य ‘केके’

गुरुवार, 26 जून 2025

मेरा देश

 

मेरा देश

आओ भारत भूमि की, तुम्हें कथा सुनाता हूँ। 

वो मेरा देश है, जो मैं तुम्हें बताता हूँ ।।

    जम्मू कश्मीर से कन्या कुमारी, 

    है कौन वह नही जिसने जाना, 

    विविधताओं की क्यारी में, 

    है मानुष बन सब जग माना, 

उसी भेद को आज, मैं तुम्हें बतलाता हूँ । 

    पठार की धरती और तुमने, 

    चाय बागान को नहीं देखा, 

    कुदरत की मनमोहकता और,

    झरनों के कलरव को नहीं देखा, 

उसी मोहकता का गान, आज मैं तुम्हें सुनाता हूँ,

    छत्तीस प्रदेशों का देश यह,

    जिन पर केंद्र करता है राज,

    सरकार यह करें सुनिश्चित, 

    कैसा हो हमारा समाज, 

उसी समाज की परिकल्पना, आज मैं तुम्हें बताता हूँ।

    तय समय पर तय हो वर्षा,

    फसल लहलाए खलियानों में,

    अन्न, धन से होवे पूर्ण,

    रस रहे भरा जुबानों में,

उसी रस की महत्ता, आज मैं तुम्हें सुनाता हूँ।

    जहाँ रही मानव की महानता, 

    आपस में रही बेहद समानता, 

    जिस कारण हम रहे विश्वगुरु,

    उन को क्यूँ जाते हैं भूल, 

उन्हीं गुणों की महानता, आज मैं तुम्हें सुनाता हूँ।

    शौच, सन्तोष, तय, स्वाध्याय,

    जहाँ अपनाते नित प्रणिधान,

    सत्य, अहिंसा, अस्ते, ब्रह्मचर्य, 

    जहाँ अपरिग्रह का नित हो पालन,

जीवन उच्च आदर्शों को, आज ‘केके’ तुम्हें सुनाता हूँ। 

    आओ भारत भूमि की, तुम्हें कथा सुनाता हूँ। 

    वो तेरा भी देश है, जो मैं तुम्हें बताता हूँ ।।


                                                                            डॉ. के कृष्ण आर्य ‘केके’ 


गुरुवार, 12 जून 2025

मैं आदमी हूँ!


मैं आदमी हूँ!

भावनाओं के समर में, मैं खड़ा अकेला हूँ,

सोच विचार थकता रहूँ, मैं ही सब झेला हूँ।

रात गुजर जाए यूँ ही, ना कुछ मैं कहूँ,  

सुबह दिखूं वैसा ही, क्योंकि मैं आदमी हूँ॥

गरीबी हो या अमीरी, घर से रोज निकलता हूँ,

दिहाड़ी करूँ या नौकरी, पेट बच्चों का भरता हूँ।

दिन ढ़ले घर मैं आऊँ, सब गम सह लेता हूँ,

फिर स्नेह की आस करूँ, क्योंकि मैं आदमी हूँ॥

परिवार का बोझ उठाऊँ मैं, पत्नी गले लगाता हूँ,

माँ-बाप संग बैठ अकेला, दिल की टीस सुनाता हूँ।

इष्ट-मित्रों के आने पर मैं, जिम्मेदारी निभाता हूँ,

फिर तिरस्कार पी जाता हूँ, क्योंकि मैं आदमी हूँ।

देख बच्चों का फूहड़पन, मनमानी उनकी सहता हूँ,

सह अनादर अपने घर में, फिर हँसने लग जाता हूँ।

पत्नी मित्र जब आए घर, घूंट जहर की भरता हूँ,

भय से न कुछ कह सकूँ, क्योंकि मैं आदमी हूँ॥

मार्गदर्शक बन पत्नी का, उसे समझाने लगता हूँ,

गैर पुरुष घर आने के, नुकसान बताने लगता हूँ।

आबरू तेरी मेरी एक समान, यह सिखाने लगता हूँ,

मन ही मन में डरता हूँ, क्योंकि मैं आदमी हूँ॥

आज आहार कैसा तुम्हारा, घोर तामसिक बनाता है,

अपने सुख की खातिर वो, हत्यारिन बन जाती है।

कभी सांप से डंसवा कर, कभी ड्रम में चिनवाती है,

‘केके’ बड़ाई करें तुम्हारी, क्योंकि तूं आदमी है॥


                                                                    डॉ. के कृष्ण आर्य ‘केके’

 

बुधवार, 21 मई 2025

भारत माता की जय

 

                         भारत माता की जय

        देश की शान ये देश का गान है,
        बिन परिचय के ही देश की पहचान है, 
        दुश्मन में समाये हुए भय की धमक है,
        भारती के भाल की यह अनुठी चमक है,
        पापी को छलनी करता यह एक उद्घोष है, 
शत्रु की छाती पर जब बोले, भारत माता की जय। 
हमारे वीर सेनानी जब, मैदान में डट जाते हैं,
भारत की मर्यादा पर, शीश काट कर लाते हैं,
सिंहासन भी हिलने लगता, जहां पांव जमाते हैं, 
खून की गर्मी से उनके, धरती सिमट जाती है,
रण में भरी हुंकार से, सर-ताज सिहर जाते हैं,
दुश्मन का कलेजा यह सुन कांपे, भारत माता की जय।
निहत्थों पर गोली चला, नापाक वीरता दिखलाते हैं,
पहलगांव घाटी में कायर, बहनों का सिंदूर मिटाते हैं,
चोरी और सीना जोरी, फिर वे कर इतराते हैं,
ड्रोन, मिसाइल, वारहेड से, करके वार दिखाते हैं,
मिट्टी में मिल गए तब, सेना हिन्द से टकराते हैं,
आकाश भी बोले अब ये आवाज, भारत माता की जय।
न्यूक्लियर की हवा निकाली, हमारे वीर जाबांजों ने,
नौ ठिकाने असुरों के, ग्याहर ऐयरबेस उजाड़े हैं,
आसमां में उड़ते जहाज, ला धरती पर पछाड़े हैं,
गोली बदले गोला खाते, फिरते मुहं छिपाते हैं,
दहाड़ मारकर रोने लागे, अपनी मौत बुलाते हैं,
खून की गर्मी शांत हुई यह सुन, भारत माता की जय।
सिंदूर का बदला लेने को, सिंदूर ऑपरेशन चलाते हैं,
आधी रात के तारों में, जलता सूरज दिखलाते हैं,
सीना छलनी किया वैरी का, नही भाग वो पाते हैं,
देश करे नमन उन्हें, जो पाक को पाताल दिखाते हैं,
‘केके’ सेना माँ भारती, अद्भुत शौर्य है दर्शाती,
ब्रह्मोस की गर्जना से सुन वे कांपे, भारत माता की जय।


                                                                                    डॉ. के कृष्ण आर्य ‘केके’


शुक्रवार, 2 मई 2025

तुलना


                                       तुलना

         एक दिन मैं बैठ अकेला, 

        चाहता था पुस्तक पढना,

        चलता-चलता मन चला, 

तो लगा करने किन्ही, दो में तुलना।

पहले तुलना की मैने, 

        तराजू के दो पलडों की,

        इनकी भी क्या मजबूरी है,

एक ही रस्सी से बंधना,

फिर भी मैं कर रहा क्यूं, दोनों की तुलना।

पलडों का हुआ निर्माण समान, 

        एक बड़ा न दूसरा दयावान,

        दोनों करते एक दूसरे का मान,

        मजबूरी है उनकी अलग रहना,  

यूं ही मैं करने लगा उन, दोनों की तुलना।

एक मूल संग रहते दोनों,

स्वभाव है उनका दूरी पर रहना, 

एक की चाहत रहती है लेना,

दूसरा चाहता है हमेशा कुछ देना,

इसलिए मैं कर रहा हूं इन, दोनों की तुलना।

सरल निगाहें देख रही,

        तुला तो है एक ही,

        किसे बताऊ अच्छा, 

        यह समझ मैं पाया ना,

हां फिर क्यूं मैंने चाहा करना, दोनों की तुलना।

दो हाथ दिये हम सबको,

इनका प्रयोग तुम ऐसे करना,

एक को लेने की ना पड़े जरूरत,

दूसरे की चाह रहे कुछ देना,

तभी तो ‘केके’ कर रहा है इन, दोनों में तुलना।

          

                                                                     डॉ0 के कृष्ण आर्य ‘केके’

 

सोमवार, 21 अप्रैल 2025

पंछी की दुनिया

पंछी की दुनिया


        उल्लास भरे और भोर भए,

        चहचहाहट सी आवाजें करते हैं।

        पंखों की फडफ़ड़ाहट से,

        आसमां में खूब मचलते हैं

ऐसा है कौन बताओ, ये पंछी की दुनिया है।।

        नीलांबर में उडक़र जाते, 

        पेड़ों पर भूख मिटाते हैं।

        प्रकृति के आंगन में वे,

        खुशियां खूब लुटाते हैं।

फिर बतलाओ कैसी, ये पंछी की दुनियां हैं।।

        कुदरत की मोहकता में,

        वास वृक्ष पर बनाते है।

        अपने चूजों की सेहत खातिर, 

        स्नेह का ग्रास खिलाते हैं।

ऐसा हैं कौन बताओ, ये पंछी की दुनियां है।।

        पंख फैला और दिन ढ़ला,

        घोंसले में अपने आते हैं।

        शांति का पढ़ा पाठ वे,

        भोर भए उड़ जाते हैं।

क्या जान न पाए, ये पंछी की दुनियां है।।

        वे गाते गीत सुरीले अपने,

        और अपनी धुनें बजाते हैं।

        अपनी दुनिया में रहकर वे,

        दुनिया को जीना सिखाते है।

क्या तुम न जानो, ये पंछी की दुनियां है।।

        सुख-दुख का अहसास उन्हें भी,

        सबका आभार जताते हैं।

        दाना कोई डाले उनको,

        नतमस्तक हो जाते हैं।

अब तुम भी जानो, ये पंछी की दुनियां है।।

        आजादी से वह रहना चाहें,

        पिंजरा कब ठिकाना है।

        आसमां मापने वाले को,

        बंधन कब सुहाना है,

दासतां में रोने लागे, ये पंछी की दुनिया है।।

        दिनभर दाना चुनकर लाते,

        चूजों संग रात बिताते हैं।

        तोड़ घोंसला मार दे कोई,

        तो बहुत रुदन मचाते हैं।

केके अब समझो उनको, ये पंछी की दुनिया है।।

     

                                                                                                डॉ0 के कृष्ण आर्य


 

गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

इन्सान हूँ ?


इन्सान हूँ ? 

इन्सान बनना चाहता हूँ !

लाखो कि भीड़ में इंसानियत को तलाश रहा हूँ ...

पर कोई है जो डरा हुआ है , सहमा हुआ है

और अपने वजूद को बचाने के लिए दर-दर भटक रहा है ...,

आखिर मिल गया वो , पर निराश है , नाराज है , दुखी है ,

आसमान कि ओर निहार रहा है 

परन्तु आसमान से किसी बदलाव की उम्मीद ने आँखे मैली कर दी है .

सच्चाई के थपेड़ो ने चेहरे की लालिमा हर दी है .

अब तो वह दुखी है सच बोल कर, 

तंग आ चुका है झूठ को नकार कर,

लाचार है, बेबस है, 

किसे सुनाये सच, 

रहा नहीं कोई सुनने वाला, 

सब बिकाऊ है, न कोई टिकाऊ है, 

इन्सान और उसका ईमान बिक रहा है, 

फिर भी इसी उम्मीद के सहारे चला जा रहा हूँ, चला जा रहा हूँ... 

कि शायद इस भीड़ में कोई मिल जाये, 

जो हो इन्सान, 

जानता हो उस इन्सान को, 

जो ये कह दे कि... 

मै इन्सान हूँ !

                                                                      डॉ0 के कृष्ण आर्य ‘केके’ 



 

सोमवार, 24 मार्च 2025

कष्ट

 कष्ट

कष्ट नही जिनके जीवन में,

वे भी कितने अभागे हैं।

ऐसे दुःखों से क्या डरना,

जो राह दिखाने वाले हैं।।

द्वंद्व भाव में फंसे जो,

मार्ग देख न पाएगा,

जन्मांतर के चक्कर में,

वह फंसता ही जाएगा

जीवन का कुछ अर्थ नही,

जब तक तम न आएगा,

मिटकर जब मिटाओ अंधेरा,

तो नया सवेरा आएगा।।

क्षणभर का विश्राम नही जब,

जीवन पथ के राही को।

तभी तो वह मानुष कहलाए,

जब आफत का विग्राही को।।

न जाने कष्ट क्यूं अब,

तुमसे लगाव हो गया।

जिस दिन न भागूं पीछे तेरे,

लगता वो दिन बेकार हो गया।।

        हे कष्ट! तेरे बिन अब,

        जीना अच्छा नही लगता।

        तुम अच्छे तो नही हो पर,

        बिन तेरे परिचय नही मिलता।।

फिर क्यूं तुमसे भागें दोस्त,

तु ही तो दर्शक है मेरा।

जो कराता है दर्शन केके को,

अपना कौन और बेगाना है तेरा।।

                                                                        डॉ0 के कृष्ण आर्य ‘केके’


मंगलवार, 4 मार्च 2025

ठंडी हवा


 ठंडी हवा

आज वो ठंडी हवा, 

उतनी ठंडी नही लगती।

गंध तो बहुत है, 

पर अच्छी नही लगती।।

बंसत के बाद फिर,

गर्मी यूं कहर ढ़ाने लगती।

ए.सी. तो चलते हैं बहुत,

पर ठंडी नही लगती॥

        गंध तो बहुत है, 

पर अच्छी नही लगती।।

भूख-प्यास बिन तुम,

जब खाए जात चटपटा। 

पेट बिगडऩे पर तुम्हें,

खट्टा नींबू भी खट्टा नही लगता॥

        गंध तो बहुत है, 

पर अच्छी नही लगता।।

        मात-पिता की कुटिया में,

थी ठंडक़ बड़ी लगती।

दारुण के आने पर वह,

ठंडक़ उतनी ठंड़ी नही लगती॥

        गंध तो बहुत है, 

पर अच्छी नही लगती।।

कुल्फी तो प्रेम की जो,

खूब है जमने लगती।

जब ढ़ीली हो स्नेह लड़ी,

कोठी अपनी भी बेगानी लगती।।

        गंध तो बहुत है, 

पर अच्छी नही लगती।।

सुन री तू ठंडी हवा,

आज क्यूं तू अनजानी लगती।

        केके जब करता संवेदन तेरा,

        तेरे ठंडक वही पुरानी लगती।

        गंध तो बहुत है, 

पर अच्छी नही लगती।।

 

आर्य कृष्ण कुमार ‘केके’


सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

आग

आग 

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एक आग से सब जन उपजे,

एक आग सब मर जाए।

कैसी-कैसी अग्नि है ये,

सुने तो सब डर जाए॥

एक आग है भूख-प्यास की,

पेट की आंत सिकुड़ जाए।

कुत्तों से भी बदतर हो वे,

          छीन कर रोटी ले जाए।।

एक आग लगी जो दिल में,

विचारों को जलाती जाए।

मन-बुद्धि को मलिन करे,

सच वो जान ना पाए॥

एक आग लगी जब तन में,

वासना यूं ही बढती जाए।

कौवे जैसी हालत हो उसकी,

और चरित्रहीन वह कहलाए॥

एक आग लगी जब मन में,

व्यक्ति कुंठित होता जाए।

धन, बुद्धि, शांति उसके,

द्वेष से सब जलते जाए॥

एक आग प्रभु-प्रेम की,

निश्चल भाव जो होए।

हो यह आग सही यदि,

केके दर्शन ईश के पाए॥

  

                                                                              आर्य कृष्ण कुमार ‘केके’


सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

इंसान एक खिलौना है !


इंसान एक खिलौना है !

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इंसान एक खिलौना है,

      जिसे हंसना और रोना है।

जिस राह पे वो जाए,

उस राह सा होना है।।

जीवन की नदिया में,

एक बूंद सा पानी है।

सुख में वो उड़ता जाए,

दुःख में बहता झरना है।।

बचपन में बढ़कर वो,

        जवानी में खिलता है।

अधेड़ में ऊधड़ जाए,

प्राणों का रेला है।

काम की गठरी लिए,

क्रौध में रहना है।

लोभ से गिरकर वह,

अहंकार में मिटना है।।

अपनों की बगिया में,

        ना अपना ठिकाना है।

उस राह पे सब जाएं,

जिसका नही निशाना है।।

माता तो अपनी वो,

पिता जो सहारा है।

भ्रात, पूत और सब नाते,

उन्हें भूल ही जाना है।।

जीव की फूलवारी में,

        कुदरत सुहाना हो।

हे ईश ! अनुभूत तेरा,

        केके को होना है।।

इंसान एक खिलौना है,

        जिसे हंसना और रोना है।

जिस राह पे वो जाए,

उस राह सा होना है।।


आर्य कृष्ण कुमार ‘केके’

गीत-‘जीवन एक बगिया है’ के सुर में गाया जा सकता है।

 

गुरुवार, 30 जनवरी 2025

अब किससे डरना है


उठो बहना चीर सम्भालों,

अब खुद ही तो लड़ना है।

मर जाओ या मार गिराओ,

अब किस से ड़रना है।।

झूठ-मूठ के रिश्ते फरेबी,

अब नही है कोई करीबी।

जन्म-जात से हर कोई शत्रु,

अब उनको ही मसलना है।

मर जाओ या मार गिराओ,

अब किस से ड़रना है।।।

स्वयं को कर मजबूत स्वयं तुम,

कब तक आस लगाओ गी।

दोहन करता हर जो जन,

उसका सिर कुचलना है।।

मर जाओ या मार गिराओ,

अब किस से ड़रना है।।।

हाथ आबरु पर जिसने डाला,

नहीं बचा, किया मुहं काला।

फाड पेट, कर सर कलम उसका,

फिर किससे यूं हिचकना है।।

मर जाओ या मार गिराओ,

अब किस से ड़रना है।।।

 शर्त यहीं बस मेरी बहना,

तुम खुद, खुदी को रखना संभाल।

सामने आए अगर कोई खिलजी,

सीना चीर उसी का देना।।

मर जाओ या मार गिराओ,

अब किस से है ड़रना।।।


आर्य कृष्ण कुमार (केके)

जब किसी महिला को प्रताडित किया जा रहा है। वह दूसरों से सहायता मांगती है परन्तु उसका साथ देने के लिए कोई सामने नहीं आता है। ऐसी स्थिति में एक कविता के माध्यम से क्या कहता है, आओ जानें।


गुरुवार, 2 जनवरी 2025

न्यू ईयर

 

मीटिंग न्यू ईयर



एक मीटिंग में आज हुआ यूं ऐसे,

सोचते रहे कि ये हुआ कैसे।

हम ताकते रहे एक दूसरे की ओर,

वो चले गए यूं घूरते सब ओर।।

उसने पूछा ये क्या हुआ,

साथी ने कहा गुस्से में है बोस।

तीसरे ने बोला क्या कहें जनाब,

हमने कहा ‘हैप्पी न्यू ईयर’ बोलो साहब।।

एक ने कहा तीन शब्दों का ये नारा,

लागत है सबको प्यारा।

बोलकर देखो ! खुश हो जाएं बोस,

‘हैप्पी न्यू ईयर’ बोलने में फिर कैसा संकोच।।

इसने बोला, उसने बोला, सबने बोला,

अब खेल हो गया न्यारा।

हर्ष का हुआ तब माहौल उधर,

जब बोला सबने ‘हैप्पी न्यू ईयर’।।


                                                                                    कृष्ण कुमार ‘आर्य’


मंगलवार, 17 दिसंबर 2024

‘श्याम आएंगे’


    ‘श्याम आएंगे’

     


        मेरी खोपड़ी के द्वार आज खुल जाएंगे,

        श्याम आएंगे, 

        श्याम आएंगे, आएंगे, श्याम आएंगे। 

        मेरी खोपड़ी के द्वार आज खुल जाएंगे,

        श्याम आएंगे। 

श्याम आएंगे, आएंगे, श्याम आएंगे। 

श्याम आएंगे तो सुबह उठ जाऊंगी,

तारों की छावों में घूम आऊंगी,

फिर मैं करूं योगाञ्जयास,

लेकर सबको मैं साथ,

श्याम आएंगे।

श्याम आएंगे, आएंगे, श्याम आएंगे। 

श्याम आएंगे तो हवन रचाऊंगी,

खाने को हलवा बनाऊंगी,

उनसे लेकर आर्शीवाद,

फिर बांटू मैं प्रसाद,

श्याम आएंगे।

श्याम आएंगे, आएंगे, श्याम आएंगे। 

श्याम आएंगे तो छत पर जाऊंगी,

सूरज को नमन कर आऊंगी,

करके धारण मैं प्रकाश,

होने स्वस्थ की ले आस,

श्याम आएंगे।

श्याम आएंगे, आएंगे, श्याम आएंगे। 

        श्याम आएंगे तो समझ मैं पाऊंगी,

कैसे जीवन की धार बनाऊंगी,

उनका कैसा था सदाचार, 

        पाएं हम भी कर सुधार, 

        श्याम आएंगे, 

श्याम आएंगे, आएंगे, श्याम आएंगे। 

श्याम आएंगे तो मुरली सुनाएंगे,

ऋचाओं का गायन कराएंगे,

उससे मिट जाए भ्रमजाल,

कृष्ण हो जाए निहाल,

श्याम आएंगे।

श्याम आएंगे, आएंगे, श्याम आएंगे।   

कृष्ण कुमार ‘आर्य’ 

 

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