शुक्रवार, 7 मई 2010

चल गई

क्या ? 

चल गई, चल गई, चल गई,
दी खबर ये फैलाये,
जानत, सुणत, भागत सब,
पूछत भी कोई नाए.
एक को देख दूसरा भागत,
उसको देख भागत अनेक,
भागत, भागत सब भागत,
खबर फैलाता, यह हरेक.
चलती चलती खबर ये पहुंची,
मंदिर, हाट और शिवालाय,
नेता, नौकर और चाकर पहुंची,
खबर यह थाने जाये.
यह सुन भौचाकें हुए, नगर कोतवाल,
लाव-लश्कर संग वहां, पहुंचे थानेदार
थानेदार को देख वहां, सब आपस बतियावे
देख, सुण जानत ये, सब भीड़ देई हटावे.
कोन मरा, कितने घायल, मुझको दो बताये,
किसने चलाई, क्यू चलाई, सबकुछ दो समझाए,
हाल देख थानेदार का, सब आपस ताक'त' जाए,
क्या चली, किसने चलाई, किसी को पता नाए.
यह देख अफवाहक को, सामने लिया बुलाये ,
क्या चली, कब चली, ये हमको दो सुनाये,
डर के मारे अफवाहक, थर-थर कांपत बताये,
थी एक खोटी चव्वनी, वो थी मैंने चलाये.
 बात सुन अफवाहक की, सब के सब खिलखिलाए,
ये कैसी चव्वनी तुने चलाई, जो सब को दिया भगाए,
कृष्ण आर्य ये चव्वनी, हर कोई है चलावे,
कोई तो पकड़ा जावत है, पर कोई सफल हो जाये.



  
     

  

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