गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

संघीकरण प्रतिज्ञा-

डॉ कृष्ण के आर्य  


संघीकरण प्रतिज्ञा-

कलियुग के आगमन का काल 3045 विक्रमी संवत वर्ष पूर्व रहा है। महाभारत काल में देश की सामरिक व्यवस्थाएं चरमरा रही थी। एक छत्र राज्य की न्यूनता होने के कारण देश छोटे-छोटे खंडों में बंट गया था। इससे सामाजिक ताना-बाना नष्ट हो रहा था। स्वक्षेत्र के राजा की इच्छा को ही राजाज्ञा मानते हुए प्रजा का उत्पीडऩ होने लगा था। ऐसी व्यवस्था युद्ध से पहले भी रही थी, जिसका परिणाम महाभारत का युद्ध रहा। परन्तु युद्ध के उपरान्त यह व्यवस्था ओर अधिक भयावह हो गई थी। इस कारण जम्बूद्वीप की जनता त्राहीमाम् कर रही थी। 

महाराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ के राजा बन गए थे तो श्रीकृष्ण की इच्छा से उन्होंने समस्त भारतवर्ष के राजाओं को एक ध्वज के नीचे लाने का प्रयास किया। इस विषय पर महाभारत में एक श्लोक में कहा गया है कि उस समय देश छोटे-छोटे राज्यों में विभिक्त हो गया था।

गृहे गृहे हि राजानः स्वस्य स्वस्य प्रियङ्कराः।

                            न च साम्राज्यमाप्तास्ते सम्राटछब्दो हि कृच्छ्रभाक्।।                          (अध्याय 4.02)

महाराज युधिष्ठिर अपने भाईयों को कहते हैं कि आजकल तो घर-घर में राजा हैं और वे सभी अपना-अपना प्रिय करने में रत हैं। परन्तु वे सम्राट पद को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सम्राट की पदवी बड़ी कठिनाई से प्राप्त होती है। 

महाराज युधिष्ठिर ने कहा कि मैं तो शम (मन) और इन्द्रियों के संयम को ही श्रेष्ठ मानता हूँ। राजसूय यज्ञ की सम्पन्नता से सम्राट पद पर आसीन होने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति नहीं होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं हे राजन्! युवनाश्व के पुत्र मान्धाता ने असमर्थ राजाओं को जीतकर सम्राट पद प्राप्त किया था। महाराज भगीरथ प्रजा पालन से, सहस्रबाहु अर्जुन ने तपोबल से तथा राजा भरत स्वाभाविक बल से सम्राट बने थे। वैसे ही राजा मरुत अपनी समृद्धि के प्रभाव से सम्राट पद पर आसीन हुए थे। इन सभी राजाओं ने अपने एक-एक गुण के कारण सम्राट पद प्राप्त किया था परन्तु आप तो सम्पूर्ण रूप से सम्राट बनने योग्य हैं। आप शत्रु विजयी, प्रजापालक, तपः शक्ति, धन-समृद्धि और साम्राज्य प्राप्ति की नीति सहित सर्वगुण सम्पन्न हो। यदि आप मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण करते हुए राजव्यवस्था का संचालन करंेगे तो ब्रह्मलोक की प्राप्ति कठिन नहीं है।

भगवान श्रीकृष्ण ने समाज के उत्थान और राष्ट का एकीकरण करते हुए धर्म की स्थापना हेतु पाँच कार्य मुख्य रूप से किए। इसके अन्तर्गत मगध नरेश जरासंध का वध करके 86 राजाओं को मुक्त करवाया, राजसूय यज्ञ को सम्पन्न करवाते हुए युधिष्ठिर को पहली बार सम्राट पद पर विभूषित किया। परन्तु शकुनि के मायाजाल से युधिष्ठिर को पुनः राजसत्ता से बाहर कर दिया और फलस्वरूप पांडव 13 वर्षों तक वनाज्ञातवास में रहे। दूसरी बार युधिष्ठिर को सम्राट पद पर आसीन करने के लिए श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध में कौरवों का वध करवाया, इसके पश्चात अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करवाकर युधिष्ठिर को पुन सम्राट बनाने का कार्य किया।

उस समय सम्राट एक महान पद माना जाता था। तब देश में अनेक छोटे-छोटे राज्य और राजा हो गए थे, जिससे पूरे जम्बूद्वीप में क्षेत्रवार भिन्न-भिन्न व्यवस्था बन गई। उन सभी राजाओं के सम्राट के अधीन होने से देश में एक ध्वज, एक राजा तथा एक व्यवस्था बनाई जानी थी ताकि देश में धर्मात्मा राजा के नेतृत्व में धर्मराज्य की स्थापना की जा सके। यही वह समय था जब युधिष्ठिर के राजत्व में श्रीकृष्ण ने खंड-खंड में बंटे हुए भारतवर्ष को एकता के सूत्र में पिरोया था। 

श्रीकृष्ण द्वारा राज्यों के संघीकरण का ऐसा महान कार्य गत पाँच हजार वर्ष पहले प्रथम बार किया गया। इसलिए श्रीकृष्ण को महान् एवं अखंड भारत के निर्माण के पुरोधा कहा जाता है। यह व्यवस्था महाभारत के लगभग 2500 वर्ष बाद तक ऐसे ही ठीक चलती रही परन्तु उसके उपरान्त खंडित हुए राज्यों का एकीकरण चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के नेतृत्व में आचार्य चाणक्य ने किया। सम्राट विक्रमादित्य तथा बाद में खंडित 565 रिसायतों को जोडऩे का कार्य सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भी किया।

000 


सोमवार, 28 सितंबर 2026

कृष्ण की व्यापकता-

 कृष्ण की व्यापकता-

व्यापक एक बृहद शब्द है। इसका अर्थ भिन्न प्रकरण में भिन्न होता है। यदि कहा जाए कि ईश्वर व्यापक है तो इसका अर्थ हुआ कि ईश्वर प्रत्येक स्थान पर है, वह ब्रह्मांड के कण-कण में विद्यमान है। उसकी सत्ता की कोई थाह नहीं है अर्थात् ईश्वर सर्वव्यापक है। यहाँ श्रीकृष्ण की व्यापकता पर चिंतन करने का प्रयास कर रहे हैं। उनके परिपेक्ष्य में व्यापक शब्द का अर्थ विस्तृत, बोधपूर्ण, सर्वग्राही, समावेशी तथा अस्पष्ट है। अतः श्रीकृष्ण का वैशिष्टय विशाल एवं विस्तृत था, उन्हें घटनाओं और उनसे पैदा हुई परिस्थितियों के निराकरण का सम्पूर्ण बोध रहा। वह सर्व गुणग्राही, चिंतक तथा अस्पष्ट थे। उनके विषय में यह अनुमान लगाना कठिन था कि वह अगले ही पल क्या करने वाले हैं।

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के 11वें समुल्लास में लिखा है कि महाभारत काल से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व बिगाड़ आरम्भ हो गया था। इसके फलस्वरूप श्रीकृष्ण के कालखंड में जम्बूद्वीप और भरतखंड के असंख्य राजाओं ने मनमानी करना आरम्भ कर दिया था। इस कारण देश में वेद की व्यवस्था एवं आचरण लुप्त प्रायः हो रहे थे। इससे धर्म, कर्म, शासन व्यवस्था एवं वर्ण व्यवस्था का लोप होने लगा और जनता अनेक कष्टों में जीवन यापन करने को विवश थी। ऐसे समय में विक्रमी संवत 3170 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने समस्त 14 विद्याओं के ज्ञान से पूर्ण होकर जम्बूद्वीप में राजाओं के मन में धर्मानुकूल आचरण बनाने का प्रसार करने का प्रयास किया। भगवान श्रीकृष्ण की अथाह क्षमताएं थी। उनके कार्य सदैव पूर्णता को प्राप्त होते थे। इसलिए वेदानुकूल व्यवस्था के स्थापन का कार्य उन्होंने स्वयं अपने हाथ में लिया। 

अतः श्रीमद्भगवद्गीता के अनेक प्रसंगों में इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक बार कहा है कि...

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

अर्थात् जब-जब भरतखंड में शासक और जनता धर्मानुकूल आचरण से विमुख हो जाते हैं, तब-तब वह अनकी आत्मा में धर्म का अभ्युदय, सृजन और उत्थान करने की प्रेरणा देता है। श्रीकृष्ण एक धर्मपरायण साम्राज्यवाद के पोषक थे। जैन साहित्य में श्रीकृष्ण को ‘श्लाका’ पुरुष कहा गया है। जो तेजस्वी, ओजस्वी, कांतिमान, वर्चस्वी, हितोपदेशी, मधुरवाची, अल्पवाची, अपराज्यीय, गंभीर, ज्ञानी-ध्यानी तथा अनेक दिव्य गुणों से सम्पन्न ही श्लाका पुरुष कहा जाता है। यहाँ उन्हें अर्ध-जम्बूद्वीप के शासक के रूप में दर्शाया गया है।

श्रीकृष्ण सदैव राष्ट्र को धर्म-परायण बनाने के विचार में व्याप्त रहते थे। इसलिए उन्होंने इस कार्य की सफलता के लिए तुलनात्मक उत्कृष्ट स्वभाव और आचरण वाले पांडवों का चयन किया ताकि पृथ्वी पर वेदानुकूल राज्य का संचालन किया जा सके। अतः उनके मन में युधिष्ठिर को ही सम्राट बनाने पर मंथन चलता रहता था। गीता में श्लोक दिया है कि

धर्मसंस्थापनार्थय सम्भवामि युगे-युगे।

अर्थात् साधु प्रवृति के लोगों की सुरक्षा, दुष्ट स्वभाव वालों का विनाश और संसार में धर्म की स्थापना हेतु युगों-युगों में जन्म लेता हूँ। इसे यदि अन्य भावों में समझा जाए तो गोलोक (अंतरिक्ष) में विचरण करने वाली भगवान श्रीकृष्ण की वह दिव्य एवं मुमुक्षु आत्मा सृष्टि के घटनाक्रमों का आंकलन करती रहती। इसलिए श्रीकृष्ण को सृष्टिद्रष्टा भी कहा गया है।

भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मांड की अधिकतम विधाओं में व्याप्त थे। उनका उज्ज्वल चरित्र, उत्कृष्ट आचरण, सद्व्यवहार, जितेन्द्रीय संस्कार, वेद में विशेषज्ञता, सत्य-असत्य का विवेचन, धर्मज्ञान की सर्वज्ञता, वरिष्ठ विद्वानों का सम्मान, शत्रुओं का संहार, योग में पराकाष्ठा इत्यादि उनकी व्यापकता को सिद्ध करते हैं। श्रीकृष्ण एक ऐसा अनपेक्षित चरित्र थे, जिनको नदी की धारा के मध्य बांधा नहीं जा सकता है। उन्हें जब भी, जहाँ भी कुछ ठीक नहीं लगा वहीं धर्म को वरियता देते तदनुसार निर्णय ले लेते थे।

डॉ. कृष्ण के आर्य 


सोमवार, 17 अगस्त 2026

श्रीकृष्ण

  

            डॉ. कृष्ण के आर्य 

                     

 

 त्यागभाव से जीते थे श्रीकृष्ण-

            


 

श्रीकृष्ण का जीवन बहु-आयामी था। वे जहाँ एक सभ्य एवं उत्सुक शिष्य थे, वहीं आज्ञा पालक पुत्र थे, एक श्रेष्ठ संचालक, उत्कृष्ट भ्राता, एक पत्नीव्रती ब्रह्मचारी, समर्पित मित्र तथा उत्कृष्ट संप्रेषक थे। उनकी मित्रता तो वैसे अनेक समेल तथा बेमेल लोगों के साथ रही होगी, परन्तु सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन तथा सहपाठी सुदामा की मित्रता को अधिक पहचान प्राप्त हुई है। सुदामा एवं श्रीकृष्ण गुरु सांदीपनी आश्रम के सहपाठी थे, वह श्रीकृष्ण की भांति ही वेदों का ज्ञाता, श्रेष्ठ आचरण युक्त और तपस्वी ब्राह्मण था।

गुरुकुल में पढ़ते समय श्रीकृष्ण को जब किसी विषय पर चर्चा करनी होती थी तो वह गुरु के अतिरिक्त सुदामा से ही वार्ता करते थे। वे दोनों वेद विषयों, विज्ञान, आत्मचिन्तन तथा अन्य यौगिक विषयों पर गहन चिन्तन करते थे। श्रीकृष्ण का सुदामा के साथ विचार-विनिमय होता रहता था। उनका आचरण पवित्र था और वह सदैव अध्ययनरत रहते थे।

गुरुकुल में श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता गहरी बनती गई। महर्षि सांदीपनी के आश्रम में प्रातः सांय नियमित अग्निहोत्र होता था। मान्यता है कि एक दिन गुरुमाता ने श्रीकृष्ण और सुदामा को यज्ञ के लिए समिधा एकत्र करने के लिए जंगल में भेज दिया तथा दोनों के खाने के लिए सुदामा की पोटली में चूड़ा (चने) बांध दिए। इस बीच जंगल में ही तेज वर्षा आरम्भ हो गई। तेज बारिश से बचने के लिए उन दोनों को पेड़ पर रात्रि गुजारनी पड़ी। परन्तु भूख लगने पर सुदामा ने वह सारे चने स्वयं ही खा लिए।

सुदामा ने इस घटना का वृत्तान्त गुरुदेव को सुनाया। गुरु सांदीपनी ने इसे भंयकर पापकर्म बताते हुए कहा कि सुदामा तुमने अपने भाग्य में दरिद्रता लिख ली है। कालांतर में श्रीकृष्ण द्वारकाधीश बन गए और सुदामा एक दरिद्र ब्राह्मण रह गया। पत्नी के कहने पर सुदामा अपने मित्र श्रीकृष्ण से भेंट करने द्वारका आ गए। सुदामा की पत्नी ने पड़ोस से मांगकर लाए दो मुठी चावल ले जाने हेतु उनकी पोटली में बांध दिए थे। 

श्रीकृष्ण और सुदामा की सामाजिक तौर पर कोई समानता नहीं थी। सुदामा आध्यात्मिक और बौद्धिक चिंतन में श्रीकृष्ण के लगभग तुल्य ही बताए गए हैं। द्वारका में सुदामा के आगमन पर श्रीकृष्ण ने उनका आदर, सम्मान और सेवा सुश्रुषा की। इतना ही नहीं, दो मुठी चावल जो सुदामा लेकर आए थे, उसे खाने लगे। परन्तु रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण से कुछ चावल छोडऩे की प्रार्थना की। 

यह घटना एक गहन संदेश भी देती है कि दूसरे के भाग का खाने से व्यक्ति दरिद्रता को आंमन्त्रित करता है। उसी प्रकार रुक्मिणी ने सुदामा द्वारा लाए गए चावलों में से कुछ चावल छोडऩे की प्रार्थना भी एक संदेश है कि कभी भी अकेले ही किसी वस्तु का भक्षण नहीं करना चाहिए अन्यथा वह भी पाप के समान ही होता है। इसके बदले श्रीकृष्ण ने सुदामा को धन-धान्य से परिपूर्ण कर दिया। 

श्रीकृष्ण का ऐसा त्यागपूर्ण जीवन सदैव अनुकरणीय रहेगा।


बुधवार, 1 जुलाई 2026

मुद्रिका


 डॉ. कृष्ण के आर्य

मुद्रिका ज्ञान-

श्रीकृष्ण ने आचार्य सांदीपनी से कहा कि वह मुद्रा अथवा मुद्रिका का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हैं। अतः मुझे बताएं कि मुद्रिका किसे कहते हैं? उन्होंने कहा कि मानव के हाथ में पांच अंगुष्ठान (अंगुलियां) होती हैं। इनका पृथ्वी, अग्नि, अन्तरिक्ष, जल (आपः) एवं वायु सहित पांच तत्वों से अलग-अलग संबंध होता है। इसमें पृथ्वी का प्रतिनिधित्व अंगूठा करता है तथा अंगूठे के साथ वाली अंगुली अग्नि का, उससे आगे की अंगुली से अन्तरिक्ष, फिर जल तथा अंतिम अंगुली का वायु से संबंध होता है। 

       यह विद्या क्रियात्मक है, अध्ययनात्मक नहीं है। इसके लिए साधक को एकान्त स्थल पर शान्त मुद्रा में (विशेष आसन) अपनी आत्मा को अन्धकार से प्रकाश में लाना होता है। जब योगी पृथ्वी तत्व को अग्नि तत्व, पृथ्वी को अन्तरिक्ष, जल और वायु तत्वों से क्रमशः मिलान करते हैं तो साधक को पंचमहाभूत विषयों का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त होता है। इसी अभ्यास को मुद्रिका ज्ञान कहा है। इससे साधक ब्रह्मांड एवं वेदमन्त्रों के गंभीर रहस्यों को समझने में सक्षम होता है। इससे वह ब्रह्मचर्य की आभा में रमण करता हुआ ब्रह्मवर्चसी बनता है। वह इन्द्रियों के प्रत्येक विषय का ज्ञान प्राप्त कर अन्तर्मुखी हो जाता है।

 

      इसके साथ ही पांच प्राणों तथा मन की अवस्था को एक स्थान पर संयमित करना भी मुद्रिका कहलाता है। शरीर के प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान का मिलान एक ही स्थान पर एकत्रित करने को भी मुद्रिका कहा है। मुद्रिका के विभिन्न अभ्यासों से साधक गहन विद्याओं का स्पष्ट दर्शन करने में समर्थ बन जाता है। श्रीकृष्ण रात्रि के अन्तिम काल (प्रहर) में जागृत होकर इन्हीं मुद्राओं का नित्य अभ्यास करते थे, जिससे उन्हें ब्रह्मांड का विशेष ज्ञान प्राप्त था। 

      श्रीकृष्ण ने महर्षि सांदीपनी से कहा कि भगवन! मैं चित्त मंडल पर अध्ययन करना चाहता हूँ। ऋषि के निर्देश पर उन्होंने अग्नि और पृथ्वी दोनों की मुद्रिका बनाई और अन्तर्मुखी हो गए। ‘उस समय श्रीकृष्ण की आयु 20 वर्ष की थी। ऐसी युवा अवस्था में किसी ब्रह्मचारी का अन्तर्मुखी हो जाना, शिशु विज्ञान को जानना इत्यादि पर अध्ययन होता रहता था।’ यह उनकी महानता को प्रदर्शित करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि इतनी छोटी अवस्था से ही श्रीकृष्ण बाह्य जगत् की गतिविधियों का असर स्वयं पर नहीं पडऩे दे रहे थे।

इस प्रकार श्रीकृष्ण ने पृथ्वी तत्व से अग्नि, अन्तरिक्ष, जल और वायु तत्व की मुद्राओं का समन्वय कर अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। योगाभ्यास द्वारा उन्होंने अग्नि और पृथ्वी के परमाणुओं का मिलान कर धरती के गर्भ का ज्ञान प्राप्त किया था। ऐसे ही वह कभी चन्द्रमा में मुद्रित होकर उसकी शीतल आभा तो कभी सूर्य विज्ञान को समझने के लिए विभिन्न मुद्राओं का अभ्यास करते रहे। यही श्रीकृष्ण की महानता है।

शुक्रवार, 26 जून 2026

विमोचन


डॉ. कृष्ण के आर्य

 विधानसभा अध्यक्ष ने किया ‘जीवन गीत’ का विमोचन

                    

हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष श्री हरविन्द्र सिंह कल्याण ने हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम में ‘जीवन गीत’ काव्य संग्रह पुस्तक का विमोचन किया। पुस्तक का लेखन हरियाणा सरकार में जिला/सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी के पद पर कार्यरत डॉ. कृष्ण के आर्य ने किया हैं।
      विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि साहित्यकार समाज के मार्गदर्शक हैं, जो अपनी लेखनी से उत्कृष्ट इतिहास का सृजन करते हैं। उन्होंने कहा कि वह साहित्यकार ही होते हैं, जो मानव मात्र को प्राचीन इतिहास के छिपे रहस्यों से अवगत करवाते हैं। इससे हमारे समाज का उत्थान और सरकार को दिशा प्राप्त होती है। इस अवसर पर उन्होंने साहित्यकारों को पुरस्कार वितरित किए।

                  
                   

    पुस्तक के लेखक ड़ॉ आर्य ने कहा कि यह उनकी दूसरी पुस्तक है, जिसमें इकावन कविताओं का संग्रह है। इसमें देश प्रेम, सामाजिक ताना-बाना, कृष्ण भक्ति, पक्षियों की जीवन शैली, मानव जीवनचर्या तथा त्यौहारों पर आधारित कविताएं हैं। इनमें इंसान हूॅं, पक्षियों की दूनिया, चुप रहता हूं, पैसे पेड़ पर लगते हैं, चौकीदार, भाग मत, शब्द नहीं मिलते तथा तेरी मां जैसी सामाजिक सरोकारों की कविताएं शामिल हैं।
     डॉ. आर्य ने कहा कि उनकी पहली पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ है। इस पुस्तक को चंडीगढ़ साहित्य अकादमी द्वारा बेस्ट बुक ऑफ द ईयर 2025 की सर्वश्रेष्ठ कृति का पुरस्कार प्राप्त है। इस पुस्तक में भगवान श्रीकृष्ण का अनुसंधानात्मक सम्पूर्ण जीवन चरित्र दिया गया है, जिसमें लगभग दो दर्जन पुस्तकों के संदर्भ सम्मिलित किए गए है। पुस्तक में ग्यारह अध्याय है, जिनमें भगवान श्रीकृष्ण से पूर्व की 60 पीढ़ियों, उनकी शिक्षा, दिनचर्या तथा वास्तविक और मूल द्वारका सहित अन्य खंडों का विस्तार से वर्णन है।

000 

    

For You

New Post

संघीकरण प्रतिज्ञा-

डॉ कृष्ण के आर्य    संघीकरण प्रतिज्ञा- कलियुग के आगमन का काल 3045 विक्रमी संवत वर्ष पूर्व रहा है। महाभारत काल में देश की सामरिक व्यवस्थाएं...