शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

पलाश

 डॉ. कृष्ण के आर्य

पलाश-एक दिव्य औषधी

          

प्रकृति एक अनमोल खजाना है। ऋतु के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के फल, फूल, पौधे तथा पेड़ों पर रंगत देखी जा सकती है। इसी प्रकार पलाश एक तरह का पेड़ है, जिस पर बैसाख महीने में फूल चमकने लगते हैं। पलास के पेड़ के फूल सुंदर नारंगी रंग के होते हैं। यह देखने में अति सुन्दर और आग की तरह चमते दिखाई देते है। यह अति प्राचीन पेड़ है, जिसका वर्णन महाभारत काल में होता रहा है। 

इसका सबसे अधिक विवरण पांड़वों के लाक्षागृह यात्रा के दौरान हुआ था। जब दुर्योधन और शकुनी द्वारा पांड़वों को लाक्षागृह में जलाकर मारने का षडयंत्र रचा था। उस समय विदुर जी ने इन्हीं पलाश के फूलों का उदाहरण देकर पांड़वों को आग से बचने के लिए सचेत किया था। इसी के परिणामस्वरूप पांड़व उस लाक्षागृह से सुरक्षित निकल पाए थे।

यह प्रकृति की अनूठी देन है। यह शुष्क मौसम में सूखे क्षेत्रों में ही पाया जाता है। इन फूलों का उपयोग युनानी, होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने में किया जाता है। चिकित्सकों की राय के अनुसार पलाश के पेड़ के लगभग सभी हिस्से औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। 

पलाश के लाभ

मानना है कि पलाश के पेड़ से कई तरह के रोगों का उपचार संभव है। इसकी जानकारी सामान्यतः कम लोगों को होती है। 

मोतियाबिंद में फायदेमंद- चिकित्सकों का मानना है कि इनका उपयोग आंखों के मोतियाबिंद के उपचार के लिए किया जाता है। इसके फूलों का रस मोतियाबिंद के लिए बहुत उपयोगी बताया है। 

त्वचा रोग- पलाश के पत्तों और इसके फूल को पीसकर चेहरे पर लगाने से त्वचा की रंगत निखरती है और त्वचा संबधी अनेक रोगों में आराम मिलता हैं।

दर्द में आराम- चोट, दर्द और सूजन को खत्म करने में भी पलास के फूल बहुत लाभदायक है। 

मधुमेह- पलाश के सूखे फूलों का पाउडर मधुमेह को नियंत्रित करने में मदद करता है।

खांसी-जुकाम- इन रोगों में पलाश एक गुणकारी पौधा माना जाता है। 

यह एक ऐसा पौधा है जिसके उपयोग से शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। इतना ही नहीं इसके फूलों का उपयोग होली के रंग बनाने में भी किए जाते हैं। परन्तु इसका उपयोग बीमारी से संबंधित चिकित्सकों के मत के अनुसार ही करना चाहिए। 


सोमवार, 13 अप्रैल 2026

बैसाखी विशेष

 डॉ. कृष्ण के आर्य                                                            बैसाखी विशेष 


फसल, शौर्य और बलिदान का पर्व बैसाखी


        बैसाखी हिन्दु और सिक्खों का एक विशेष त्यौहार है। यह देश की आन, बान और शान को बनाए रखने वाला महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन से पंजाब तथा हरियाणा प्रदेशों के किसान अपने खेतों से गेहूं की फसल की कटाई आरम्भ करते हैं। मूगलों के शासन के मुक्त होने के लिए गुरू गोविंद सिंह जी ने इसी दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी। इसी दिन पंच प्यारों ने आगे बढ़कर देश पर सर्वस्य न्यौछावर करने की शपथ ली थी। परिणामस्वरूप आज हम आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं।

1. धरती का उत्सव

इसे धरती का उत्सव कहा जाता है। हमारे सोना उगलते खेतों से आज ही के दिन गेहूं की बालियां कट कर घर लाई जाती हैं। इसलिए हरियाणा, पंजाब में इसे बैसाखी, असम में बोहाग बिहू, केरल में विशु, बंगाल में पोइला बैशाख, तमिलनाडु में पुथांडु के नाम से जाना जाता है। 

2. खालसा का जन्मदिन - 13 अप्रैल 1699

इस दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने श्री आनंदपुर साहिब में देश पर बलिदान होने के लिए संगत से सिर मांगा था। उनमें से पाँच महानुभावों दया राम, धरम दास, हिम्मत राय, मोहकम चंद, साहिब चंद ने उठकर गुरू जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

उसी दिन सिक्ख पंथ में पंच प्यारे बने और खालसा पंथ की स्थापना हुई। इस पर गुरु साहिब ने एलान किया कि

‘चिड़ियों से मैं बाज तुड़ाऊं,

गीदड़ों को मैं शेर बनाऊं,

सवा लाख से एक लड़ाऊं,

तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।’

3.        गुरू साहब के चार साहिबज़ादे बड़े शौर्य और निड़रता से मूगलों के साथ लड़े। इनमें से दो चमकौर साहिब में लड़े तथा छोटे दो को मूगलों ने सरहिंद में उस समय दीवार में जिंदा चिनवा दिया। उस समय उनकी आयु मात्र 9 और 6 साल थी। परन्तु उन्होंने अनेक प्रलोबनों के बावजूद भी अपना धर्म नही छोड़ा। इस तरह गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार देश पर कुर्बान हो गया। परन्तु गुरूदेव जाते-जाते गुरू गद्दी को गुरु ग्रंथ साहिब को सौंप गए। 

4.     बैसाखी का दूसरा चेहरा 13 अप्रैल 1919 का रहा। इस दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने निर्दोष लोगों को गोलियों से भून डाला। इसमें लगभग 1500 लोग शहीद हो गए। इसका बदला 21 साल बाद शहीद ऊधम सिंह ने लंदन में डायर की हत्या कर लिया। 

         ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात भगवान वेदव्यास जी ने बैसाख शुक्ल पक्ष की एकादशी को महाभारत ग्रन्थ की रचना करना आरम्भ किया था। एकांतवास में रहते हुए उन्होंने इस ग्रन्थ का नाम पहले ‘जय’ रखा था, जिसमें लगभग 4400 श्लोक शामिल किए गए। इसके उपरान्त उनके शिष्यों ने 6600 श्लोकों की रचना कर इस ग्रन्थ में मात्र 11000 श्लोकों को सम्मिलित किया। इस ग्रन्थ को बाद में महाभारत के नाम से जाना जाने लगा, जिसमें आजकल लगभग एक लाख श्लोक हैं।

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सोमवार, 16 मार्च 2026

नव संवत्

 डॉ. कृष्ण के ‘आर्य’              नव संवत् वर्ष-विशेष

 

नव संवत् पर देह त्याग गए थे भगवान श्रीकृष्ण

Dainik Tribune

दोपहर का समय था। उदासीनता के बादल सूर्य की तपिश को शांत कर रहे थे। विनाश की गड़गड़ाहट ने काल को अचल कर दिया था। सागर में उठती तेज लहरें तथा चूहों का बहुतायत महलों की नींव को ख़ोख़ला कर रही थी। इसी दौरान मदिरा के मद में उन्मत्त परिजन एक-दूसरे के मुंडों को हाथ में लेकर जश्न मना रहे थे। यही वह क्षण था, जब दिन, महीना, वर्ष और युग बदल रहे थे। परिवर्तित ऋतु, शांत वातावरण और झर-झर गिरते पात इतिहास का नया अध्याय लिखने को आतुर थे।

विक्रमी संवत् 3045 वर्ष पूर्व अर्थात् 5127 साल पहले चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा का वह दिन जब युग अपना स्वरूप और नाम बदल रहा था। काल के गाल में समाते हुए द्वापर से नए युग का आगाज हो रहा था। यह वही समय था जब सागर किनारे की एक सभ्यता समुद्र में हिचकोले खा रही थी। समुद्र में उठ रही ऊंची लहरंे एक सौंदर्य से पूर्ण नगरी को लील रही थी। अपने पन्ने पलटता हुआ इतिहास नए पृष्ठ पर हस्ताक्षर कर रहा था। क्या होगा ? इसे जानने के लिए सबकी सांसे अटकी हुई थी। 

कलियुग का आगमन-

सृष्टि रचना के 1,96,08,48000 वर्ष पूर्ण हो चुके थे। सातवें मन्वन्तर की 28वीं चतुर्युगी के द्वापर युग का अंत हो रहा था। उगते सूर्य की किरणें नए युग के आगमन का स्वागत कर रही थी। इसी को वर्तमान कलियुग के नाम से जानते हैं। कलियुग के वर्तमान काल तक 5127 वर्ष बीत चुके हैं। अनेक अव्यवस्थाओं के कारण हम अपनी जिस प्राचीन काल गणना को भूल चुके हैं, उसे पुनः स्मरण करने की आवश्यकता का अनुभव हो रहा है।

सृष्टि की आयु-

मनुस्मृति के अनुसार सृष्टि की कुल आयु 4 अरब 32 करोड़ वर्ष है। इसे एक ब्रह्म दिवस कहते हैं, जिसमें एक हजार चतुर्युगी होती है। अर्थात् सृष्टि के आरम्भ से अंत तक सभी चारों युग एक-एक हजार बार आते हैं। इनको 14 मन्वन्तर में विभक्त किया गया है। इतने ही समय तक प्रलयकाल रहता है। इन दोनों की अवधि के योग कोे अहोरात्र कहा जाता है। ऐसे तीस अहोरात्रों को अहोमास, बारह अहोमास का अहोवर्ष तथा 100 वर्षों की गणना प्रान्तकाल कहलाती हैं। इसे इस प्रकार से समझा जा सकता है।

तद्वै युगसहस्त्रान्तं ब्राह्मं पुण्यमहर्विदुः।

रात्रिं च तावतीमेव तेऽहोरात्रविदो जनाः।।

अर्थात् परमात्मा के एक हजार दिव्य युगों के पवित्र दिन और उतनी ही रात्रि को जानने वाले लोग विज्ञानवेत्ता होते हैं। अतः

सृष्टि की आयु- 4 अरब 32 करोड़ वर्ष = एक ब्रह्म दिवस

प्रलयकाल-           4 अरब 32 करोड़ वर्ष = एक ब्रह्म रात्र

अहोरात्र-        8 अरब 64 करोड़ वर्ष

एक ब्रह्म दिवस- एक हजार चतुर्युगी = 14 मन्वन्तर

एक मन्वन्तर-        71 चतुर्युगी = 30 करोड़ 86 लाख वर्ष  

एक चतुर्युगी-        चारों युगों की आयु = 43 लाख 20 हजार वर्ष 

सतयुुग-        17 लाख 28 हजार वर्ष

त्रेता- 12 लाख 96 हजार वर्ष

द्वापर- 8 लाख 64 हजार वर्ष

कलियुग-         4 लाख 32 हजार वर्ष

अभी तक सृष्टि के 6 मन्वन्तर बीत चुके हैं। सृष्टि ने अपनी आयु के 1,96,08,53,127 वर्ष तथा सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के 12,05,33,127 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं।         

aaj Samaj
         भगवान श्रीकृष्ण का महाप्रस्थान-

सृष्टि के 1,96,08,48000 वर्ष पूर्ण होने पर द्वापर और कलियुग का संध्याकाल था। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र, पौत्र सहित यादवों का संहार हो चुका था। उनके बड़े भाई बलराम चिर समाधि के लिए वन चल गए थे। वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण ने उन्हें योग मुद्रा में अन्तिम हिजकी द्वारा प्राणों को त्यागते हुए देखा। 

यह देखकर श्रीकृष्ण वन विहार करने लगे। अपने अन्तिम समय को निकट देखते हुए वह योगस्थ हो पीपल के पेड़ के नीचे लेट गए। इसी बीच एक बहेलिए ने किसी जानवर को निशाना बनाते हुए बाण छोड़ दिया। यह बाण श्रीकृष्ण के पांव के तलवे में जा लगा। इससे उनकी योगनिद्रा भंग हुई तो सामने बहेलिए को हाथ-जोड़े कांपते हुए देखा। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अभ्यदान देते हुए वहां से जाने को कहा और अपनी समस्त इंद्रियों तथा प्राणों को सिंकोड़कर ब्रह्मलोक को प्रस्थान कर गए। वह काल चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दोपहर 2 बजकर 27 मिनट 31 सेकिंड का था। जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण ने धरा का त्याग किया, वैसे ही द्वापर काल ने कलियुग में प्रवेश कर लिया। इसका वर्णन मैंने अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ में भी किया है। 

नवऋतु, नवयुग, नवरात्र

युग परिवर्तन के साथ ही संवत् और ऋतु बदल जाते है। इस कारण ऋषियों ने सभी त्यौहारों को मनाने की व्यवस्था को ऋतु आधारित बनाया है। सनातन वैदिक धर्म में चैत्र और आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में नवरात्र मनाए जाते है। इन दिनों मौसम समावस्था में होने के कारण गर्मी या सर्दी भी सम अवस्था में रहती हैं। प्रकृति अपना स्वरूप बदल रही होती है। इस कालखंड को नवरात्र कहा जाता है। नवरात्रों में विभिन्न यज्ञों के आयोजन करने की व्यवस्था दी है। नव दिनों तक 9 प्रकार के यज्ञ करते हुए दुर्गा अर्थात् प्रकृति माता के नवरूपों को स्पंदित किया जाता है। 

Arth Prakash

संवत्सर ही विक्रमी संवत्-

यह वही समय है जब ईश्वर ने सृष्टि रचना का कार्य आरम्भ किया और युगों एवं वर्षों की शुरुआत हुई थी। दक्षिण भारत में इसे “उगादी” अर्थात् युगादी के नाम से जाना जाता है। यह दिन भारतीय नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। अतः वैदिक सनातन धर्म के अनुसार युग एवं काल गणना इसी नए संवत्सर के आरम्भ से होती है।

भगवान श्रीकृष्ण के देहावसान के उपरान्त लगभग अढ़ाई हजार वर्ष तक देश में ठीक चलता रहा। उसके पश्चात अनेक विधर्मियों तथा विदेशी आक्रांताओं ने भारतीय संस्कृति को गदला कर दिया। परन्तु 2083 वर्ष पहले भारत भूमि को आर्य शिरोमणी सम्राट विक्रमादित्य ने संवारने और सत्य सनातन वैदिक संस्कृति के पुनुरूधार का प्रयास किया। शकों पर विजय प्राप्त कर उन्होंने इसी दिन चक्रवर्ती सम्राट का पद ग्रहण किया था। अतः यह संवत् विक्रमादित्य के नाम अर्थात विक्रमी संवत् से जाना जाने लगा।

सम्राट युधिष्ठिर ने भी इसी दिन हस्तिनापुर का साम्राज्य ग्रहण किया था। महर्षि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना इसी दिन की थी। इस वर्ष यह संवत् 19 मार्च 2026 को आरम्भ हो रहा है, जो ईसा से 57 वर्ष पहले होता है। इसी आधार पर भारतीय पंचाग भी तैयार किया जाता है। अतः हमें अपनी संस्कृति पर गर्व करना चाहिए।        

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सोमवार, 2 मार्च 2026

होली

 


डॉ. कृष्ण के ‘आर्य’                                                                         होली-विशेष


समभाव से होली मनाने का संदेश देते हैं भगवान कृष्ण

     होली का नाम सुनते ही लोगों के चेहरों पर ओज चमकने लगता है। यह खुशी, उमंग तथा उत्साहवर्धन करने वाला पर्व है। लम्बे समय तक ठंड से सिंकुड़ा हुआ शरीर होली की गर्माहट से स्फूर्ति का अनुभव करने लगता है। ऐसे में महिलाएं, पुरूष तथा बच्चे एक दूसरे के चेहरों के सुर्ख को रंगों से बेरंग कर देते हैं। प्रकृति के सौंदर्य से पुलकित खेतों में सरसों के पीले रंग की फसल को देखकर व्यक्ति झूम उठते हैं। दूसरी ओर गेहूं की बालियांे पर सुनहरी तथा चने के बुट्टों पर चढ़े हरे रंग से मन हर्षाने लगता है। वायुमंडल में फैली इनकी मंद-मंद गंध से नवयौवन लहलहा उठता है।
     होली का यह अनूठा त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात उत्तर प्रदेश, बिहार तथा आसपास के प्रांतों में इसे होली, होलिका, फाग, धुलंडी तथा फगुआ के नाम से पुकारते हैं। मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र में जहां इसे रंग पंचमी व फाल्गुन पूर्णिमा कहते हैं वहीं पश्चिम बंगाल, असम इत्यादि प्रदेशों में डोल पूर्णिमा, डोल जात्रा या डोल महोत्सव के रूप मनाते हैं। दक्षिण भारत के तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक में इसे ‘कामदहनम्’ या कामूदु पैरे के नाम से जानते हैं। परन्तु ब्रज की लठमार होली जग प्रसिद्ध है, जहां श्रीकृष्ण रूप के साथ बरसाने की गोपियां होली खेलती हैं।
Dainik Tribune

भगवान श्रीकृष्ण की होली-
      यह त्यौहार मानव सभ्यता के आरम्भ से मनाया जाता रहा है। पौराणिक साहित्य के अनुसार श्रीकृष्ण गोपियों संग होली खेलते, उन्हें रंग लगाते तथा अठखेलियां करते थे। परन्तु श्रीकृष्ण उच्छृंखल नहीं बल्कि सभ्य थे।
सनातन वैदिक धर्म के अनुसार प्राचीन चार त्यौहार सभी चारों वर्णों द्वारा मनाए जाते रहे हैं। इनमें श्रावणी पर्व (ब्राह्मण), आश्विन पर्व (क्षत्रिय), कार्तिक पर्व (वैश्य) तथा फाल्गुनी पर्व (शुद्र अर्थात् अशिक्षित) वर्ण को समर्पित रहे हैं। आज की कथित जातियों से इनका कोई संबंध नहीं है। मनुस्मृति में कहा है कि
शर्मवद्ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम्
वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शुद्रस्य प्रेष्यसंयुक्तम्।
श्रावणी पर्व- यह शिक्षकों से जुड़ा पर्व है। इस दिन बालकों को गुरूकुल में प्रवेश करवाया जाता था। आजकल इसे रक्षाबंधन के नाम से जानते हैं।
आश्विन पर्व- इस पर्व का संबंध देश के रक्षकों से है। वर्षा ऋतु के उपरान्त क्षत्रिय अर्थात् सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्रों का नवीनीकरण करते हैं। इस पर्व को बाद में शौर्य के प्रतीक भगवान श्रीराम की रावण पर विजय से जोड़ दिया। अब इसे दशहरा कहा जाता हैं।
कार्तिक पर्व- यह पर्व किसानों, व्यापारियों तथा कर्मकारों के लिए है। इसलिए इसे वैश्य पर्व कहा है। कार्तिक की अमावस्या को मनाए जाने वाले इस पर्व को दिवाली कहते है।
फाल्गुनी पर्व- फाल्गुनी अर्थात् होली का पर्व शूद्र यानी अशिक्षित वर्ग को समर्पित है। होली पर खेल-खेल में जीवन को रंगीन करना ही मात्र इसका उद्देश्य रहा है।
     भगवान श्रीकृष्ण एक चातुष्वर्ण्य देव पुरुष थे। वह जब गीता का उपदेश देते हैं तो ब्राह्मण हैं, सुदर्शन चक्र धारण करते हैं तो क्षत्रिय हैं, गोपालक के रूप में वैश्य तथा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में पग धोते समय शूद्र का कार्य करते हैं। वह उक्त सभी वर्णों के साथ संयम और समभाव से होली खेलने का संदेश देते हैं, परन्तु फूहड़पन उनके जीवन में नहीं रहा।
Aaj Samaj

होली का वैज्ञानिक महत्व-
     इस पर्व को भक्त प्रह्लाद, उनकी बुआ होलिका तथा पिता हिरण्यकशिपु से भी जोड़ कर देखा जाता है। परन्तु भारतीय संस्कृति में सभी त्यौहारों को प्रकृति के साथ जोड़ा गया है। होली के रंगों का शरीर, मन और बुद्धि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। होली पर सरसों, पलाश, अमलताश, नीम, हल्दी इत्यादि से प्राकृतिक रंगों का निर्माण किया जाता रहा है। यह रंग, त्वचा के छिद्रों तथा अयनों का शौधन कर मानव को संक्रामक रोगों से बचाते हैं। इतना ही नहीं, रंगों से खेलने, नृत्य तथा संगीत से मनुष्य में सकारात्मक तरंगे फैलती हैं। आजकल ऋतु परिवर्तन का समय है। इस दौरान हानिकारक जीवाणुओं की अधिकता हो जाती है। इसलिए गाय के गोबर के कंडे, आम की लकडियां, देसी घी तथा सूखे मेवों का प्रयोग होली दहन में किया जाता है। इससे बैक्टीरिया नष्ट होने से पर्यावरण शुद्ध होता हैं।

हरियाणा की होली-दुलंड़ी-
     हरियाणा में होली का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। गांवों में बंसत पंचमी पर होली मनाने का स्थान निर्धारित करते हुए डंडा गाड़ देते हैं, जिसे होली का डांडा कहते हैं। होलिका दहन पर गाय के गोबर के कंड़े व अन्य सामग्री अर्पित की जाती हैं। होली की इस ज्वाला में गेंहू और चने के बुट्टों को भून कर खाया जाता है, जिन्हें ‘होलक’ या होला कहते हैं। होलक शरीर से अनावश्यक चर्बी, सर्दी में जमी कफ तथा थकान को दूर करता है।
     बच्चों के लिए बेर तथा सुखे मेवों की कंड़ी बनाई जाती है। प्रदेश में होली के बाद फाग का त्यौहार बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन सभी आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को गुलाल, अबीर और रंग लगाकर गले मिलते हैं। परन्तु अनेक स्थानों पर बच्चे एक-दूसरे को कीचड़ से भी ढ़क देते हैं, जो पर्व और शरीर की अशुद्धि बढ़ाने वाला होता है।

होली का ‘कामदहनम्’ रूप-
     दक्षिण भारत में होलिका दहन को ‘कामदहनम्’ नाम से पुकारा जाता हैं। मान्यता है कि इस दिन देवताओं द्वारा समाधिस्थ भगवान शिव के मन में कामवासना जागृत करने का प्रयास किया गया। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया। इसे जीवन की उत्कृष्टता हेतु काम पर विजय प्राप्त करना ही समझना चाहिए। यह समय ऋतु और वर्ष परिवर्तन का होता है। अतः इस दौरान शरीर को बलिष्ठ और त्रिदोषों को सम रखना चाहिए।
होलिका एक प्राचीन एवं वैज्ञानिक पर्व है। भगवान श्रीकृष्ण सनातन सिद्धांतों के अनुरूप पर्वों के आयोजन की प्रेरणा देते हैं। अतः हमें स्नेह व श्रद्धाभाव से होली मनाने का संकल्प लेना चाहिए।
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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

महर्षि दयानन्द



 डॉ. कृष्ण के आर्य                                                 

दयानंद बोध रात्रि- विशेष


महाशिवरात्रि को मूषक ने दयानन्द को कराया था बोध
सत्य-विद्या के उद्घोषक रहे-महर्षि दयानन्द

        भारत भूमि पर ऐसे असंख्य उदाहरण मिलते हैं, जब कोई महापुरुष किसी देश, काल और परिस्थिति जन्य ज्ञान को प्राप्त करता है। इनमें अनेक जन्म-जन्मांतरों के ऋषि मनुष्य मात्र के उपकार हेतु धरा पर आते हैं, तो कुछ किसी बोधि वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न होकर संसार की वास्तविकता का भान करते हैं और किसी के प्रज्ञाचक्षु मृत्यु या वृद्धावस्था को देखकर खुल जाते हैं। परन्तु महर्षि दयानन्द को किसी और ने नहीं बल्कि एक मूसक ने सत्य के दर्शन करवाए थे। तदोपरान्त उसी बालक मूल-शंकर नेेे अपना पूरा जीवन वास्तविक ‘शंकर के मूल’ को तलाशने में लगा दिया।
       सृष्टि के मूल तत्व को खोजने की जिद ने ही गुजरात के टंकारा में 12 फरवरी, 1824 को जन्मे बालक मूल शंकर को महर्षि बना दिया। एक साधारण बालक की भांति उन्हें अपनी माता यशोदा बाई से भगवान विष्णु तथा पिता श्रीकर्षण जी से महादेव शिव की कथाएं सुनने को मिलती रही, परन्तु उनकी ज्ञान-पिपासा की उत्कंठा शांत नहीं हो रही थी। इस तरह असली शिव के दर्शन करने की जिज्ञासा शारीरिक और बौद्धिक रूप से बढ़ते मूलशंकर की निरंतर बढ़ती गई। इसी दौरान उनके चाचा और बहन की मौत ने उनके निर्मल मन में वैराग्यभाव को और गहन कर दिए। इस घटना से व्यथित होकर मूलशंकर अपने माता-पिता से जीवन-मृत्यु पर प्रश्न करने लगा। अतः बेटे की मनोदशा देखकर माता-पिता चिंतित रहने लगे।

महाबोधि शिवरात्रि- मूषक ने दी शिक्षा
       एक कहावत है कि ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’। अर्थात् महापुरुषों की दिव्यता के दर्शन उनके बचपन में ही होने लगते हैं। ऐसे ही लक्षण किशोर मूलशंकर के जीवन में भी दृष्टिपात हो रहे थे। परन्तु महाशिवरात्रि के पर्व पर ही उन्हें जीवन के प्रवाह का ज्ञान प्राप्त हुआ। देश के अन्य भागों की तरह ही टंकारा में भी फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि पर व्रत-पूजा का आयोजन किया जा रहा था। उनके पिता श्रीकर्षण जी ने भी अपने पुत्र मूलशंकर को महाशिवरात्रि पर उपवास रखने की सलाह दी तथा गांव के शिवालय में पूजा करने व रात्रि जागरण करने को कहा। अतः मूलशंकर अपने परिवार के साथ शिवालय में भूखा-प्यासा रात्रि जागरण करता रहा। शीघ्र ही परिवार के सदस्य नींद के आगोश में चले गए लेकिन सच्चे शिव के दर्शन करने के लिए मूलशंकर जागता रहा।
       इसी दौरान शिवालय में घटित हुई एक घटना ने मूलशंकर को स्वयं के प्रति विद्रोही बना दिया। रात्रि के अंतिम प्रहर में जब सब श्रद्धालु निद्रा की गोद में थे तो मूलशंकर ने कुछ मूसक (चुंहों) को शिवलिंग पर चढ़ाए गए प्रसाद को खाते और वहीं मल-मूत्र करते हुए देखा। यह घटना देखकर मूलशंकर बड़ा व्यथित हुआ और कहने लगा यह सच्चा शिव नही हो सकता। यह शिवलिंग जो स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता है तो दूसरों की रक्षा कैसे करेगा। बालक ने अपने पिता जी को जगाते हुए पूरी घटना बताई और पूछा यह सच्चा शिव कैसे हो सकता है, वह कहां रहता है मुझे बताओ। इस पर पिता ने कहा कि सच्चा शिव तो कैलाश पर है यह तो केवल उनकी मूर्ति है। यह सुनकर बालक ने सच्चे शिव की खोज करने के लिए घर त्यागने का मन बना लिया। इस प्रकार यह महाशिवरात्रि बालक मूलशंकर के जीवन की महाबोध रात्रि बन गई।

सत्य की खोज-
       बालक के मनोभावों को जानकर माता-पिता बेटे का विवाह करने की तैयारी करने लगे। परन्तु मूलशंकर को तो सच्चे शंकर की खोज करनी थी, इसलिए मौका मिलते ही वह घर से निकलकर भाग गया। वह अनेक साधु, संतों से मिले और सच्चे शिव के विषय में जानना चाहा। अनेक गुरुजनों से शिक्षा प्राप्त करने पश्चात भी जब उन्हें शांति प्राप्त नहीं हुई तो वह मथुरा पहुंच गए। वहां उन्हें अंध गुरू विरजानन्द दंडी स्वामी के विषय में जानकारी मिली। एक सुबह उन्होंने स्वामी जी कुटिया का द्वार खटखटाया तो अन्दर से आवाज आई ‘कौन है’। इस पर उन्होंने कहा कि ‘यही तो जानने आया हूं कि मैं कौन हूं’। यह उत्तर सुनकर दंडी स्वामी के नेत्र भर आए और वे समझ गए कि एक योग्य शिष्य मिल गया है। अतः अब उनके जीवन की तपस्या पूर्ण होने वाली है।
        स्वामी विरजानन्द वेदों के प्रकाण्ड विद्वान थे, उन्होंने अपने शिष्य को वेद-वेदांग, दर्शन, शास्त्रों तथा व्याकरण का पूर्ण ज्ञान दिया। उन्होंने वेदानुसार सच्चे शिव अर्थात् कल्याणकारी ईश्वर की आभा के दर्शन करवाए, जिसके कारण उन्हें लम्बी अवधि की समाधि का अभ्यास हो गया। इसके उपरांत वह किशोर विश्व में स्वामी दयानन्द के नाम से विख्यात हुआ।

ज्ञान का प्रसार-
       दंडी स्वामी विरजानन्द की आज्ञा से दयानंद ने समाज में फैले अज्ञानता के अंधकार को दूर करने की प्रतिज्ञा ली। इसके पश्चात स्वामी दयानन्द ने स्वयं को तपाने के लिए छः वर्षों से अधिक समय तक हिमालय में वास किया। इससे उनकी वाणी में ओज तथा चेहरे के अनूठे तेज ने लोगों को उनका दीवाना बना दिया और वे महर्षि दयानन्द सरस्वती कहलाए। उन्होंने कुंभ मेले के दौरान हरिद्वार में ‘पाखण्ड खंडिनी पताका’ फहराई और अनेक तथाकथित धर्माचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित किया।
महर्षि ने कहा कि ज्ञान का मूल स्त्रोत केवल वेद है। वेद के अतिरिक्त कोई अन्य धर्मग्रंथ प्रामाणिक नहीं है। वेद के ज्ञान बिना ईश्वर के दर्शन सम्भव नहीं है।

प्राणीमात्र के कल्याणार्थ-
        महर्षि दयानन्द सरस्वती ने प्राणीमात्र के कल्याणार्थ विक्रमी संवत 1932, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को गिरगांव मुंबई में पहली ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। इसका उद्देश्य व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और दुनिया को आर्य अर्थात् श्रेष्ठ, कुलीन और सदाचारी बनाना था। उन्होंने वेद के मूल मंत्र ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का उद्घोष दिया। उनका मानना था कि मानव मात्र के आर्य (श्रेष्ठ) बनने से संसार की अनेक समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी और इससे शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा। उन्हीं के मार्ग पर चलते हुए अनेक आर्ष गुरुकुल, कन्या विद्यालय तथा डीएवी जैसी संस्थाएं आज विश्व में ख्याति प्राप्त कर रही हैं।

लेखन कार्य-
        गुजरात में पैदा होने के बावजूद और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान होते हुए भी स्वामी दयानन्द ने हिन्दी को प्राथमिकता दी। उन्होंने हिन्दी को ‘आर्य भाषा’ का नाम दिया और अपने लगभग डेढ़ दर्जन ग्रन्थों का लेखन हिन्दी में ही किया। सत्यार्थ प्रकाश उनका प्रमुख ग्रंथ माना जाता है परन्तु संस्कार विधि, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आर्योद्देश्यरत्नमाला, व्यवहारभानू इत्यादि पुस्तकें भी जनमानस को उचित राह दिखा रही है। उन्होंने हमारी प्राचीन खोई हुई सनातन धरोहर वेदों को पुनः सामने लाकर मानवमात्र पर बड़ा उपकार किया है। ऋग्वेद और यजुर्वेद का भाष्य इस दिशा में मील का पत्थर हैं।

कुरीतियों पर प्रहार-
        महर्षि दयानन्द को अलग-अलग बुद्धि के लोग अलग-अलग ढ़ंग से परिभाषित करते हैं। कुछ लोग उन्हें ब्रह्मचारी कहते हैं और कोई धर्म के पूरोद्धा, सत्य के रक्षक, वेदवेत्ता तो कुछ वेद उद्वारक कहते हैं। परन्तु महर्षि दयानन्द आधुनिक समाज के पथ प्रदर्शक तथा सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उनके उद्घोषक रहे हैं। उन्होंने 19वीं सदी में एक महान समाज सुधारक, दार्शनिक और वेद प्रसारक के तौर पर कार्य किया है। दयानन्द ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास, कुरीतियों और जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाई और सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को पुनर्स्थापित किया।

अन्तिम शब्द-
       देश की आजादी के प्रेरक रहे महर्षि दयानन्द का सानिध्य स्वामी श्रद्धानंद, पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी, श्याम जी कृष्ण वर्मा, लाला लाजपतराय, लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, मदन लाल ढींगरा, महात्मा हंसराज जैसे महानुभावों को प्राप्त हुआ। इससे खिन्न होकर देशद्रोहियों ने उन्हें विविध रूपों में 17 बार विष दिया। परन्तु यौगिक क्रियाओं के माध्यम से स्वामी जी स्वयं को फिर स्वस्थ कर लेते थे। अंत में विधर्मियों द्वारा पिसा हुआ कांच दूध में पिलाने से स्वामी जी की प्राण लीला समाप्त हो गई। इस तरह वर्ष 1883 में दीपावली के दिन उन्होंने ‘हे ईश्वर, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो’ कहते हुए अपनी नश्वर देह का त्याग कर दिया। महर्षि दयानन्द का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को नतमस्तक करता रहेगा
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