बुधवार, 1 जुलाई 2026

मुद्रिका


 डॉ. कृष्ण के आर्य

मुद्रिका ज्ञान-

श्रीकृष्ण ने आचार्य सांदीपनी से कहा कि वह मुद्रा अथवा मुद्रिका का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हैं। अतः मुझे बताएं कि मुद्रिका किसे कहते हैं? उन्होंने कहा कि मानव के हाथ में पांच अंगुष्ठान (अंगुलियां) होती हैं। इनका पृथ्वी, अग्नि, अन्तरिक्ष, जल (आपः) एवं वायु सहित पांच तत्वों से अलग-अलग संबंध होता है। इसमें पृथ्वी का प्रतिनिधित्व अंगूठा करता है तथा अंगूठे के साथ वाली अंगुली अग्नि का, उससे आगे की अंगुली से अन्तरिक्ष, फिर जल तथा अंतिम अंगुली का वायु से संबंध होता है। 

       यह विद्या क्रियात्मक है, अध्ययनात्मक नहीं है। इसके लिए साधक को एकान्त स्थल पर शान्त मुद्रा में (विशेष आसन) अपनी आत्मा को अन्धकार से प्रकाश में लाना होता है। जब योगी पृथ्वी तत्व को अग्नि तत्व, पृथ्वी को अन्तरिक्ष, जल और वायु तत्वों से क्रमशः मिलान करते हैं तो साधक को पंचमहाभूत विषयों का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त होता है। इसी अभ्यास को मुद्रिका ज्ञान कहा है। इससे साधक ब्रह्मांड एवं वेदमन्त्रों के गंभीर रहस्यों को समझने में सक्षम होता है। इससे वह ब्रह्मचर्य की आभा में रमण करता हुआ ब्रह्मवर्चसी बनता है। वह इन्द्रियों के प्रत्येक विषय का ज्ञान प्राप्त कर अन्तर्मुखी हो जाता है।

 

      इसके साथ ही पांच प्राणों तथा मन की अवस्था को एक स्थान पर संयमित करना भी मुद्रिका कहलाता है। शरीर के प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान का मिलान एक ही स्थान पर एकत्रित करने को भी मुद्रिका कहा है। मुद्रिका के विभिन्न अभ्यासों से साधक गहन विद्याओं का स्पष्ट दर्शन करने में समर्थ बन जाता है। श्रीकृष्ण रात्रि के अन्तिम काल (प्रहर) में जागृत होकर इन्हीं मुद्राओं का नित्य अभ्यास करते थे, जिससे उन्हें ब्रह्मांड का विशेष ज्ञान प्राप्त था। 

      श्रीकृष्ण ने महर्षि सांदीपनी से कहा कि भगवन! मैं चित्त मंडल पर अध्ययन करना चाहता हूँ। ऋषि के निर्देश पर उन्होंने अग्नि और पृथ्वी दोनों की मुद्रिका बनाई और अन्तर्मुखी हो गए। ‘उस समय श्रीकृष्ण की आयु 20 वर्ष की थी। ऐसी युवा अवस्था में किसी ब्रह्मचारी का अन्तर्मुखी हो जाना, शिशु विज्ञान को जानना इत्यादि पर अध्ययन होता रहता था।’ यह उनकी महानता को प्रदर्शित करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि इतनी छोटी अवस्था से ही श्रीकृष्ण बाह्य जगत् की गतिविधियों का असर स्वयं पर नहीं पडऩे दे रहे थे।

इस प्रकार श्रीकृष्ण ने पृथ्वी तत्व से अग्नि, अन्तरिक्ष, जल और वायु तत्व की मुद्राओं का समन्वय कर अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। योगाभ्यास द्वारा उन्होंने अग्नि और पृथ्वी के परमाणुओं का मिलान कर धरती के गर्भ का ज्ञान प्राप्त किया था। ऐसे ही वह कभी चन्द्रमा में मुद्रित होकर उसकी शीतल आभा तो कभी सूर्य विज्ञान को समझने के लिए विभिन्न मुद्राओं का अभ्यास करते रहे। यही श्रीकृष्ण की महानता है।

शुक्रवार, 26 जून 2026

विमोचन


डॉ. कृष्ण के आर्य

 विधानसभा अध्यक्ष ने किया ‘जीवन गीत’ का विमोचन

                    

हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष श्री हरविन्द्र सिंह कल्याण ने हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम में ‘जीवन गीत’ काव्य संग्रह पुस्तक का विमोचन किया। पुस्तक का लेखन हरियाणा सरकार में जिला/सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी के पद पर कार्यरत डॉ. कृष्ण के आर्य ने किया हैं।
      विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि साहित्यकार समाज के मार्गदर्शक हैं, जो अपनी लेखनी से उत्कृष्ट इतिहास का सृजन करते हैं। उन्होंने कहा कि वह साहित्यकार ही होते हैं, जो मानव मात्र को प्राचीन इतिहास के छिपे रहस्यों से अवगत करवाते हैं। इससे हमारे समाज का उत्थान और सरकार को दिशा प्राप्त होती है। इस अवसर पर उन्होंने साहित्यकारों को पुरस्कार वितरित किए।

                  
                   

    पुस्तक के लेखक ड़ॉ आर्य ने कहा कि यह उनकी दूसरी पुस्तक है, जिसमें इकावन कविताओं का संग्रह है। इसमें देश प्रेम, सामाजिक ताना-बाना, कृष्ण भक्ति, पक्षियों की जीवन शैली, मानव जीवनचर्या तथा त्यौहारों पर आधारित कविताएं हैं। इनमें इंसान हूॅं, पक्षियों की दूनिया, चुप रहता हूं, पैसे पेड़ पर लगते हैं, चौकीदार, भाग मत, शब्द नहीं मिलते तथा तेरी मां जैसी सामाजिक सरोकारों की कविताएं शामिल हैं।
     डॉ. आर्य ने कहा कि उनकी पहली पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ है। इस पुस्तक को चंडीगढ़ साहित्य अकादमी द्वारा बेस्ट बुक ऑफ द ईयर 2025 की सर्वश्रेष्ठ कृति का पुरस्कार प्राप्त है। इस पुस्तक में भगवान श्रीकृष्ण का अनुसंधानात्मक सम्पूर्ण जीवन चरित्र दिया गया है, जिसमें लगभग दो दर्जन पुस्तकों के संदर्भ सम्मिलित किए गए है। पुस्तक में ग्यारह अध्याय है, जिनमें भगवान श्रीकृष्ण से पूर्व की 60 पीढ़ियों, उनकी शिक्षा, दिनचर्या तथा वास्तविक और मूल द्वारका सहित अन्य खंडों का विस्तार से वर्णन है।

000 

    

शुक्रवार, 12 जून 2026

त्याग


डॉ. कृष्ण के आर्य 

 त्याग

 



त्याग ही सेवा, त्याग कृपण,

त्याग, त्याग का क्या कहना,

त्याग ही सूरत, त्याग मूर्त,

त्याग, त्याग है जीवन गहना।

त्याग ही शासक, त्याग विरासत,

त्याग, त्याग में ही रहना,

त्याग ही कर्म, त्याग प्रारब्ध,

त्याग, त्याग से तुम सहना।

त्याग ही आकर्षण, त्याग विकर्षण,

त्याग, त्याग ही निष्कर्म कहना,

त्याग ही भाव, त्याग प्रभाव,

त्याग, त्याग के स्वभाव रहना।

त्याग ही तप, त्याग कोप,

त्याग, त्याग में नित रहना,

त्याग ही स्नेह, त्याग द्वेष,

त्याग, त्याग तूं मम् कहना।

त्याग ही शांति, त्याग क्रांति,

त्याग, त्याग तूं करते रहना,

त्याग ही जीवन, त्याग मोह,

त्याग, त्याग तेरा मत रहना।

त्याग ही हवन, त्याग समिधा,

त्याग, त्याग से करते रहना,

त्याग ही आहुति, त्याग स्वाहा,

त्याग, त्याग में बोलते रहना।

त्याग ही कर्म, त्याग काम,

त्याग, त्याग में स्थिर रहना,

त्याग ही धर्म, त्याग पिपाशा,

त्याग, त्याग की बात कहना।

त्याग ही मुक्ति, त्याग युक्ति,

त्याग, त्याग में पा जाना,

त्याग ही भक्ति, त्याग सूक्ति,

त्याग, त्याग में रत रहना।

त्याग ही प्रेम, त्याग परीक्षा,

त्याग, त्याग में मग्न रहना,

त्याग ईश है, त्याग लोभ,

त्याग, त्याग में ‘केके’ रहना।

000 


 

सोमवार, 25 मई 2026

बेस्ट बुक

        

‘कर्मयोगी कृष्ण’ पुस्तक को ‘बेस्ट बुक ऑफ द ईयर-2024’ पुरस्कार 

         पंजाब के राज्यपाल एवं चंडीगढ़ प्रशासक श्री गुलाब चंद कटारिया ने चंडीगढ़ साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित उत्कृष्ट कृति वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह में ‘कर्मयोगी कृष्ण’ पुस्तक को ‘बेस्ट बुक ऑफ द ईयर-2024’ पुरस्कार से सम्मानित किया। इसका लेखन हरियाणा सरकार में कार्यरत जिला सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी डॉ0 कृष्ण के आर्य ने किया है। इसके लिए उन्होंने चंडीगढ़ साहित्य अकादमी का आभार व्यक्त किया।

        राज्यपाल ने इस दौरान विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट लेखन कार्य करने वाले साहित्यकारों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि समाज के नवनिर्माण और नवीनीकरण में साहित्य का अहम योगदान होता है। इस प्रकार के आयोजन साहित्यिक लेखकों को रचनात्मक और अनुसंधानात्मक लेखन के लिए प्रेरित करते हैं।

 

        डॉ0 आर्य ने अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ के विषय में जानकारी देते हुए बताया कि यह पुस्तक भग
वान श्रीकृष्ण के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं और उनके महान चरित्र की शुद्ध अभिव्यक्ति है। वर्तमान परिदृश्य में भगवान श्रीकृष्ण मानव मात्र के पुरोद्धा है। उनके जीवन की दिव्यता से आज का समाज रोशन हो रहा है। सृष्टि के अभी तक के काल में वही एक मात्र ऐसे चरित्र रहे हैं, जिनको अनेक ऋषियों ने उत्कृष्टता प्रमाण पत्र दिया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने तो यहां तक कहा है कि ‘भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म से मृत्यु पर्यन्त कभी कोई अधर्म का कार्य नहीं किया। वह एक आप्त पुरुष थे’। परन्तु इसके इतर, कुछ लोग दुर्भावनाओं से ग्रसित होकर श्रीकृष्ण के चरित्र को गदला कर रहे हैं। उनके  लिए चोर, लम्पट, रसिया जैसे अनैतिक और  घटिया शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे न केवल हमारी सत्य सनातन वैदिक संस्कृति के नायकों को बदनाम किया जा रहा है बल्कि विधर्मी लोगों में हम हंसी के पात्र बन रहे हैं।


  डॉ0 आर्य ने कहा कि इस कारण भगवान श्रीकृष्ण और हमारी सनातन संस्कृति के प्रति नकारात्मक तरंगे फैलने से पर्यावरण दूषित हो रहा है। फलतः मैंने ‘कर्मयोगी कृष्ण’ पुस्तक लेखन का कार्य आरम्भ किया, जिसमें लगभग 40 माह का समय लगा। इस पुस्तक में डेढ़ दर्जन से अधिक ग्रन्थों के संदर्भों को सम्मिलित किया गया है। यह एक अनुसंधानात्मक पुस्तक है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य जीवन और वास्तविक घटनाक्रमों को दर्शाने का प्रयास किया है। इस पुस्तक लेखन का मेरा उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की महानता के हो रहे लोप को कम करना रहा है। अतः श्रीकृष्ण के विषय में ब्रह्मांड़ में फैली नकारात्मक तरंगों को न्यून करने हेतु अधिक से अधिक लोगों द्वारा इस पुस्तक का पठन किया जाना वांच्छनीय है ताकि हमारे प्राचीन ज्ञान, विज्ञान और उत्कृष्ट चरित्र की धमक से विश्व परिचित हो सके ।




000

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

पलाश

 डॉ. कृष्ण के आर्य

पलाश-एक दिव्य औषधी

          

प्रकृति एक अनमोल खजाना है। ऋतु के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के फल, फूल, पौधे तथा पेड़ों पर रंगत देखी जा सकती है। इसी प्रकार पलाश एक तरह का पेड़ है, जिस पर बैसाख महीने में फूल चमकने लगते हैं। पलास के पेड़ के फूल सुंदर नारंगी रंग के होते हैं। यह देखने में अति सुन्दर और आग की तरह चमते दिखाई देते है। यह अति प्राचीन पेड़ है, जिसका वर्णन महाभारत काल में होता रहा है। 

इसका सबसे अधिक विवरण पांड़वों के लाक्षागृह यात्रा के दौरान हुआ था। जब दुर्योधन और शकुनी द्वारा पांड़वों को लाक्षागृह में जलाकर मारने का षडयंत्र रचा था। उस समय विदुर जी ने इन्हीं पलाश के फूलों का उदाहरण देकर पांड़वों को आग से बचने के लिए सचेत किया था। इसी के परिणामस्वरूप पांड़व उस लाक्षागृह से सुरक्षित निकल पाए थे।

यह प्रकृति की अनूठी देन है। यह शुष्क मौसम में सूखे क्षेत्रों में ही पाया जाता है। इन फूलों का उपयोग युनानी, होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने में किया जाता है। चिकित्सकों की राय के अनुसार पलाश के पेड़ के लगभग सभी हिस्से औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। 

पलाश के लाभ

मानना है कि पलाश के पेड़ से कई तरह के रोगों का उपचार संभव है। इसकी जानकारी सामान्यतः कम लोगों को होती है। 

मोतियाबिंद में फायदेमंद- चिकित्सकों का मानना है कि इनका उपयोग आंखों के मोतियाबिंद के उपचार के लिए किया जाता है। इसके फूलों का रस मोतियाबिंद के लिए बहुत उपयोगी बताया है। 

त्वचा रोग- पलाश के पत्तों और इसके फूल को पीसकर चेहरे पर लगाने से त्वचा की रंगत निखरती है और त्वचा संबधी अनेक रोगों में आराम मिलता हैं।

दर्द में आराम- चोट, दर्द और सूजन को खत्म करने में भी पलास के फूल बहुत लाभदायक है। 

मधुमेह- पलाश के सूखे फूलों का पाउडर मधुमेह को नियंत्रित करने में मदद करता है।

खांसी-जुकाम- इन रोगों में पलाश एक गुणकारी पौधा माना जाता है। 

यह एक ऐसा पौधा है जिसके उपयोग से शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। इतना ही नहीं इसके फूलों का उपयोग होली के रंग बनाने में भी किए जाते हैं। परन्तु इसका उपयोग बीमारी से संबंधित चिकित्सकों के मत के अनुसार ही करना चाहिए। 


For You

New Post

मुद्रिका

 डॉ. कृष्ण के आर्य मुद्रिका ज्ञान- श्रीकृष्ण ने आचार्य सांदीपनी से कहा कि वह मुद्रा अथवा मुद्रिका का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हैं। अतः मुझ...