डॉ कृष्ण के आर्य
संघीकरण प्रतिज्ञा-
कलियुग के आगमन का काल 3045 विक्रमी संवत वर्ष पूर्व रहा है। महाभारत काल में देश की सामरिक व्यवस्थाएं चरमरा रही थी। एक छत्र राज्य की न्यूनता होने के कारण देश छोटे-छोटे खंडों में बंट गया था। इससे सामाजिक ताना-बाना नष्ट हो रहा था। स्वक्षेत्र के राजा की इच्छा को ही राजाज्ञा मानते हुए प्रजा का उत्पीडऩ होने लगा था। ऐसी व्यवस्था युद्ध से पहले भी रही थी, जिसका परिणाम महाभारत का युद्ध रहा। परन्तु युद्ध के उपरान्त यह व्यवस्था ओर अधिक भयावह हो गई थी। इस कारण जम्बूद्वीप की जनता त्राहीमाम् कर रही थी।
महाराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ के राजा बन गए थे तो श्रीकृष्ण की इच्छा से उन्होंने समस्त भारतवर्ष के राजाओं को एक ध्वज के नीचे लाने का प्रयास किया। इस विषय पर महाभारत में एक श्लोक में कहा गया है कि उस समय देश छोटे-छोटे राज्यों में विभिक्त हो गया था।
गृहे गृहे हि राजानः स्वस्य स्वस्य प्रियङ्कराः।
न च साम्राज्यमाप्तास्ते सम्राटछब्दो हि कृच्छ्रभाक्।। (अध्याय 4.02)
महाराज युधिष्ठिर अपने भाईयों को कहते हैं कि आजकल तो घर-घर में राजा हैं और वे सभी अपना-अपना प्रिय करने में रत हैं। परन्तु वे सम्राट पद को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सम्राट की पदवी बड़ी कठिनाई से प्राप्त होती है।
महाराज युधिष्ठिर ने कहा कि मैं तो शम (मन) और इन्द्रियों के संयम को ही श्रेष्ठ मानता हूँ। राजसूय यज्ञ की सम्पन्नता से सम्राट पद पर आसीन होने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति नहीं होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं हे राजन्! युवनाश्व के पुत्र मान्धाता ने असमर्थ राजाओं को जीतकर सम्राट पद प्राप्त किया था। महाराज भगीरथ प्रजा पालन से, सहस्रबाहु अर्जुन ने तपोबल से तथा राजा भरत स्वाभाविक बल से सम्राट बने थे। वैसे ही राजा मरुत अपनी समृद्धि के प्रभाव से सम्राट पद पर आसीन हुए थे। इन सभी राजाओं ने अपने एक-एक गुण के कारण सम्राट पद प्राप्त किया था परन्तु आप तो सम्पूर्ण रूप से सम्राट बनने योग्य हैं। आप शत्रु विजयी, प्रजापालक, तपः शक्ति, धन-समृद्धि और साम्राज्य प्राप्ति की नीति सहित सर्वगुण सम्पन्न हो। यदि आप मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण करते हुए राजव्यवस्था का संचालन करंेगे तो ब्रह्मलोक की प्राप्ति कठिन नहीं है।
भगवान श्रीकृष्ण ने समाज के उत्थान और राष्ट का एकीकरण करते हुए धर्म की स्थापना हेतु पाँच कार्य मुख्य रूप से किए। इसके अन्तर्गत मगध नरेश जरासंध का वध करके 86 राजाओं को मुक्त करवाया, राजसूय यज्ञ को सम्पन्न करवाते हुए युधिष्ठिर को पहली बार सम्राट पद पर विभूषित किया। परन्तु शकुनि के मायाजाल से युधिष्ठिर को पुनः राजसत्ता से बाहर कर दिया और फलस्वरूप पांडव 13 वर्षों तक वनाज्ञातवास में रहे। दूसरी बार युधिष्ठिर को सम्राट पद पर आसीन करने के लिए श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध में कौरवों का वध करवाया, इसके पश्चात अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करवाकर युधिष्ठिर को पुन सम्राट बनाने का कार्य किया।
उस समय सम्राट एक महान पद माना जाता था। तब देश में अनेक छोटे-छोटे राज्य और राजा हो गए थे, जिससे पूरे जम्बूद्वीप में क्षेत्रवार भिन्न-भिन्न व्यवस्था बन गई। उन सभी राजाओं के सम्राट के अधीन होने से देश में एक ध्वज, एक राजा तथा एक व्यवस्था बनाई जानी थी ताकि देश में धर्मात्मा राजा के नेतृत्व में धर्मराज्य की स्थापना की जा सके। यही वह समय था जब युधिष्ठिर के राजत्व में श्रीकृष्ण ने खंड-खंड में बंटे हुए भारतवर्ष को एकता के सूत्र में पिरोया था।
श्रीकृष्ण द्वारा राज्यों के संघीकरण का ऐसा महान कार्य गत पाँच हजार वर्ष पहले प्रथम बार किया गया। इसलिए श्रीकृष्ण को महान् एवं अखंड भारत के निर्माण के पुरोधा कहा जाता है। यह व्यवस्था महाभारत के लगभग 2500 वर्ष बाद तक ऐसे ही ठीक चलती रही परन्तु उसके उपरान्त खंडित हुए राज्यों का एकीकरण चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के नेतृत्व में आचार्य चाणक्य ने किया। सम्राट विक्रमादित्य तथा बाद में खंडित 565 रिसायतों को जोडऩे का कार्य सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भी किया।
000






