शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

पलाश

 डॉ. कृष्ण के आर्य

पलाश-एक दिव्य औषधी

          

प्रकृति एक अनमोल खजाना है। ऋतु के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के फल, फूल, पौधे तथा पेड़ों पर रंगत देखी जा सकती है। इसी प्रकार पलाश एक तरह का पेड़ है, जिस पर बैसाख महीने में फूल चमकने लगते हैं। पलास के पेड़ के फूल सुंदर नारंगी रंग के होते हैं। यह देखने में अति सुन्दर और आग की तरह चमते दिखाई देते है। यह अति प्राचीन पेड़ है, जिसका वर्णन महाभारत काल में होता रहा है। 

इसका सबसे अधिक विवरण पांड़वों के लाक्षागृह यात्रा के दौरान हुआ था। जब दुर्योधन और शकुनी द्वारा पांड़वों को लाक्षागृह में जलाकर मारने का षडयंत्र रचा था। उस समय विदुर जी ने इन्हीं पलाश के फूलों का उदाहरण देकर पांड़वों को आग से बचने के लिए सचेत किया था। इसी के परिणामस्वरूप पांड़व उस लाक्षागृह से सुरक्षित निकल पाए थे।

यह प्रकृति की अनूठी देन है। यह शुष्क मौसम में सूखे क्षेत्रों में ही पाया जाता है। इन फूलों का उपयोग युनानी, होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने में किया जाता है। चिकित्सकों की राय के अनुसार पलाश के पेड़ के लगभग सभी हिस्से औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। 

पलाश के लाभ

मानना है कि पलाश के पेड़ से कई तरह के रोगों का उपचार संभव है। इसकी जानकारी सामान्यतः कम लोगों को होती है। 

मोतियाबिंद में फायदेमंद- चिकित्सकों का मानना है कि इनका उपयोग आंखों के मोतियाबिंद के उपचार के लिए किया जाता है। इसके फूलों का रस मोतियाबिंद के लिए बहुत उपयोगी बताया है। 

त्वचा रोग- पलाश के पत्तों और इसके फूल को पीसकर चेहरे पर लगाने से त्वचा की रंगत निखरती है और त्वचा संबधी अनेक रोगों में आराम मिलता हैं।

दर्द में आराम- चोट, दर्द और सूजन को खत्म करने में भी पलास के फूल बहुत लाभदायक है। 

मधुमेह- पलाश के सूखे फूलों का पाउडर मधुमेह को नियंत्रित करने में मदद करता है।

खांसी-जुकाम- इन रोगों में पलाश एक गुणकारी पौधा माना जाता है। 

यह एक ऐसा पौधा है जिसके उपयोग से शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। इतना ही नहीं इसके फूलों का उपयोग होली के रंग बनाने में भी किए जाते हैं। परन्तु इसका उपयोग बीमारी से संबंधित चिकित्सकों के मत के अनुसार ही करना चाहिए। 


सोमवार, 13 अप्रैल 2026

बैसाखी विशेष

 डॉ. कृष्ण के आर्य                                                            बैसाखी विशेष 


फसल, शौर्य और बलिदान का पर्व बैसाखी


        बैसाखी हिन्दु और सिक्खों का एक विशेष त्यौहार है। यह देश की आन, बान और शान को बनाए रखने वाला महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन से पंजाब तथा हरियाणा प्रदेशों के किसान अपने खेतों से गेहूं की फसल की कटाई आरम्भ करते हैं। मूगलों के शासन के मुक्त होने के लिए गुरू गोविंद सिंह जी ने इसी दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी। इसी दिन पंच प्यारों ने आगे बढ़कर देश पर सर्वस्य न्यौछावर करने की शपथ ली थी। परिणामस्वरूप आज हम आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं।

1. धरती का उत्सव

इसे धरती का उत्सव कहा जाता है। हमारे सोना उगलते खेतों से आज ही के दिन गेहूं की बालियां कट कर घर लाई जाती हैं। इसलिए हरियाणा, पंजाब में इसे बैसाखी, असम में बोहाग बिहू, केरल में विशु, बंगाल में पोइला बैशाख, तमिलनाडु में पुथांडु के नाम से जाना जाता है। 

2. खालसा का जन्मदिन - 13 अप्रैल 1699

इस दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने श्री आनंदपुर साहिब में देश पर बलिदान होने के लिए संगत से सिर मांगा था। उनमें से पाँच महानुभावों दया राम, धरम दास, हिम्मत राय, मोहकम चंद, साहिब चंद ने उठकर गुरू जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

उसी दिन सिक्ख पंथ में पंच प्यारे बने और खालसा पंथ की स्थापना हुई। इस पर गुरु साहिब ने एलान किया कि

‘चिड़ियों से मैं बाज तुड़ाऊं,

गीदड़ों को मैं शेर बनाऊं,

सवा लाख से एक लड़ाऊं,

तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।’

3.        गुरू साहब के चार साहिबज़ादे बड़े शौर्य और निड़रता से मूगलों के साथ लड़े। इनमें से दो चमकौर साहिब में लड़े तथा छोटे दो को मूगलों ने सरहिंद में उस समय दीवार में जिंदा चिनवा दिया। उस समय उनकी आयु मात्र 9 और 6 साल थी। परन्तु उन्होंने अनेक प्रलोबनों के बावजूद भी अपना धर्म नही छोड़ा। इस तरह गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार देश पर कुर्बान हो गया। परन्तु गुरूदेव जाते-जाते गुरू गद्दी को गुरु ग्रंथ साहिब को सौंप गए। 

4.     बैसाखी का दूसरा चेहरा 13 अप्रैल 1919 का रहा। इस दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने निर्दोष लोगों को गोलियों से भून डाला। इसमें लगभग 1500 लोग शहीद हो गए। इसका बदला 21 साल बाद शहीद ऊधम सिंह ने लंदन में डायर की हत्या कर लिया। 

         ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात भगवान वेदव्यास जी ने बैसाख शुक्ल पक्ष की एकादशी को महाभारत ग्रन्थ की रचना करना आरम्भ किया था। एकांतवास में रहते हुए उन्होंने इस ग्रन्थ का नाम पहले ‘जय’ रखा था, जिसमें लगभग 4400 श्लोक शामिल किए गए। इसके उपरान्त उनके शिष्यों ने 6600 श्लोकों की रचना कर इस ग्रन्थ में मात्र 11000 श्लोकों को सम्मिलित किया। इस ग्रन्थ को बाद में महाभारत के नाम से जाना जाने लगा, जिसमें आजकल लगभग एक लाख श्लोक हैं।

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