शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

महर्षि दयानन्द



 डॉ. कृष्ण के आर्य                                                 

दयानंद बोध रात्रि- विशेष


महाशिवरात्रि को मूषक ने दयानन्द को कराया था बोध
सत्य-विद्या के उद्घोषक रहे-महर्षि दयानन्द

        भारत भूमि पर ऐसे असंख्य उदाहरण मिलते हैं, जब कोई महापुरुष किसी देश, काल और परिस्थिति जन्य ज्ञान को प्राप्त करता है। इनमें अनेक जन्म-जन्मांतरों के ऋषि मनुष्य मात्र के उपकार हेतु धरा पर आते हैं, तो कुछ किसी बोधि वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न होकर संसार की वास्तविकता का भान करते हैं और किसी के प्रज्ञाचक्षु मृत्यु या वृद्धावस्था को देखकर खुल जाते हैं। परन्तु महर्षि दयानन्द को किसी और ने नहीं बल्कि एक मूसक ने सत्य के दर्शन करवाए थे। तदोपरान्त उसी बालक मूल-शंकर नेेे अपना पूरा जीवन वास्तविक ‘शंकर के मूल’ को तलाशने में लगा दिया।
       सृष्टि के मूल तत्व को खोजने की जिद ने ही गुजरात के टंकारा में 12 फरवरी, 1824 को जन्मे बालक मूल शंकर को महर्षि बना दिया। एक साधारण बालक की भांति उन्हें अपनी माता यशोदा बाई से भगवान विष्णु तथा पिता श्रीकर्षण जी से महादेव शिव की कथाएं सुनने को मिलती रही, परन्तु उनकी ज्ञान-पिपासा की उत्कंठा शांत नहीं हो रही थी। इस तरह असली शिव के दर्शन करने की जिज्ञासा शारीरिक और बौद्धिक रूप से बढ़ते मूलशंकर की निरंतर बढ़ती गई। इसी दौरान उनके चाचा और बहन की मौत ने उनके निर्मल मन में वैराग्यभाव को और गहन कर दिए। इस घटना से व्यथित होकर मूलशंकर अपने माता-पिता से जीवन-मृत्यु पर प्रश्न करने लगा। अतः बेटे की मनोदशा देखकर माता-पिता चिंतित रहने लगे।

महाबोधि शिवरात्रि- मूषक ने दी शिक्षा
       एक कहावत है कि ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’। अर्थात् महापुरुषों की दिव्यता के दर्शन उनके बचपन में ही होने लगते हैं। ऐसे ही लक्षण किशोर मूलशंकर के जीवन में भी दृष्टिपात हो रहे थे। परन्तु महाशिवरात्रि के पर्व पर ही उन्हें जीवन के प्रवाह का ज्ञान प्राप्त हुआ। देश के अन्य भागों की तरह ही टंकारा में भी फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि पर व्रत-पूजा का आयोजन किया जा रहा था। उनके पिता श्रीकर्षण जी ने भी अपने पुत्र मूलशंकर को महाशिवरात्रि पर उपवास रखने की सलाह दी तथा गांव के शिवालय में पूजा करने व रात्रि जागरण करने को कहा। अतः मूलशंकर अपने परिवार के साथ शिवालय में भूखा-प्यासा रात्रि जागरण करता रहा। शीघ्र ही परिवार के सदस्य नींद के आगोश में चले गए लेकिन सच्चे शिव के दर्शन करने के लिए मूलशंकर जागता रहा।
       इसी दौरान शिवालय में घटित हुई एक घटना ने मूलशंकर को स्वयं के प्रति विद्रोही बना दिया। रात्रि के अंतिम प्रहर में जब सब श्रद्धालु निद्रा की गोद में थे तो मूलशंकर ने कुछ मूसक (चुंहों) को शिवलिंग पर चढ़ाए गए प्रसाद को खाते और वहीं मल-मूत्र करते हुए देखा। यह घटना देखकर मूलशंकर बड़ा व्यथित हुआ और कहने लगा यह सच्चा शिव नही हो सकता। यह शिवलिंग जो स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता है तो दूसरों की रक्षा कैसे करेगा। बालक ने अपने पिता जी को जगाते हुए पूरी घटना बताई और पूछा यह सच्चा शिव कैसे हो सकता है, वह कहां रहता है मुझे बताओ। इस पर पिता ने कहा कि सच्चा शिव तो कैलाश पर है यह तो केवल उनकी मूर्ति है। यह सुनकर बालक ने सच्चे शिव की खोज करने के लिए घर त्यागने का मन बना लिया। इस प्रकार यह महाशिवरात्रि बालक मूलशंकर के जीवन की महाबोध रात्रि बन गई।

सत्य की खोज-
       बालक के मनोभावों को जानकर माता-पिता बेटे का विवाह करने की तैयारी करने लगे। परन्तु मूलशंकर को तो सच्चे शंकर की खोज करनी थी, इसलिए मौका मिलते ही वह घर से निकलकर भाग गया। वह अनेक साधु, संतों से मिले और सच्चे शिव के विषय में जानना चाहा। अनेक गुरुजनों से शिक्षा प्राप्त करने पश्चात भी जब उन्हें शांति प्राप्त नहीं हुई तो वह मथुरा पहुंच गए। वहां उन्हें अंध गुरू विरजानन्द दंडी स्वामी के विषय में जानकारी मिली। एक सुबह उन्होंने स्वामी जी कुटिया का द्वार खटखटाया तो अन्दर से आवाज आई ‘कौन है’। इस पर उन्होंने कहा कि ‘यही तो जानने आया हूं कि मैं कौन हूं’। यह उत्तर सुनकर दंडी स्वामी के नेत्र भर आए और वे समझ गए कि एक योग्य शिष्य मिल गया है। अतः अब उनके जीवन की तपस्या पूर्ण होने वाली है।
        स्वामी विरजानन्द वेदों के प्रकाण्ड विद्वान थे, उन्होंने अपने शिष्य को वेद-वेदांग, दर्शन, शास्त्रों तथा व्याकरण का पूर्ण ज्ञान दिया। उन्होंने वेदानुसार सच्चे शिव अर्थात् कल्याणकारी ईश्वर की आभा के दर्शन करवाए, जिसके कारण उन्हें लम्बी अवधि की समाधि का अभ्यास हो गया। इसके उपरांत वह किशोर विश्व में स्वामी दयानन्द के नाम से विख्यात हुआ।

ज्ञान का प्रसार-
       दंडी स्वामी विरजानन्द की आज्ञा से दयानंद ने समाज में फैले अज्ञानता के अंधकार को दूर करने की प्रतिज्ञा ली। इसके पश्चात स्वामी दयानन्द ने स्वयं को तपाने के लिए छः वर्षों से अधिक समय तक हिमालय में वास किया। इससे उनकी वाणी में ओज तथा चेहरे के अनूठे तेज ने लोगों को उनका दीवाना बना दिया और वे महर्षि दयानन्द सरस्वती कहलाए। उन्होंने कुंभ मेले के दौरान हरिद्वार में ‘पाखण्ड खंडिनी पताका’ फहराई और अनेक तथाकथित धर्माचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित किया।
महर्षि ने कहा कि ज्ञान का मूल स्त्रोत केवल वेद है। वेद के अतिरिक्त कोई अन्य धर्मग्रंथ प्रामाणिक नहीं है। वेद के ज्ञान बिना ईश्वर के दर्शन सम्भव नहीं है।

प्राणीमात्र के कल्याणार्थ-
        महर्षि दयानन्द सरस्वती ने प्राणीमात्र के कल्याणार्थ विक्रमी संवत 1932, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को गिरगांव मुंबई में पहली ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। इसका उद्देश्य व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और दुनिया को आर्य अर्थात् श्रेष्ठ, कुलीन और सदाचारी बनाना था। उन्होंने वेद के मूल मंत्र ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का उद्घोष दिया। उनका मानना था कि मानव मात्र के आर्य (श्रेष्ठ) बनने से संसार की अनेक समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी और इससे शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा। उन्हीं के मार्ग पर चलते हुए अनेक आर्ष गुरुकुल, कन्या विद्यालय तथा डीएवी जैसी संस्थाएं आज विश्व में ख्याति प्राप्त कर रही हैं।

लेखन कार्य-
        गुजरात में पैदा होने के बावजूद और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान होते हुए भी स्वामी दयानन्द ने हिन्दी को प्राथमिकता दी। उन्होंने हिन्दी को ‘आर्य भाषा’ का नाम दिया और अपने लगभग डेढ़ दर्जन ग्रन्थों का लेखन हिन्दी में ही किया। सत्यार्थ प्रकाश उनका प्रमुख ग्रंथ माना जाता है परन्तु संस्कार विधि, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आर्योद्देश्यरत्नमाला, व्यवहारभानू इत्यादि पुस्तकें भी जनमानस को उचित राह दिखा रही है। उन्होंने हमारी प्राचीन खोई हुई सनातन धरोहर वेदों को पुनः सामने लाकर मानवमात्र पर बड़ा उपकार किया है। ऋग्वेद और यजुर्वेद का भाष्य इस दिशा में मील का पत्थर हैं।

कुरीतियों पर प्रहार-
        महर्षि दयानन्द को अलग-अलग बुद्धि के लोग अलग-अलग ढ़ंग से परिभाषित करते हैं। कुछ लोग उन्हें ब्रह्मचारी कहते हैं और कोई धर्म के पूरोद्धा, सत्य के रक्षक, वेदवेत्ता तो कुछ वेद उद्वारक कहते हैं। परन्तु महर्षि दयानन्द आधुनिक समाज के पथ प्रदर्शक तथा सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उनके उद्घोषक रहे हैं। उन्होंने 19वीं सदी में एक महान समाज सुधारक, दार्शनिक और वेद प्रसारक के तौर पर कार्य किया है। दयानन्द ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास, कुरीतियों और जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाई और सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को पुनर्स्थापित किया।

अन्तिम शब्द-
       देश की आजादी के प्रेरक रहे महर्षि दयानन्द का सानिध्य स्वामी श्रद्धानंद, पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी, श्याम जी कृष्ण वर्मा, लाला लाजपतराय, लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, मदन लाल ढींगरा, महात्मा हंसराज जैसे महानुभावों को प्राप्त हुआ। इससे खिन्न होकर देशद्रोहियों ने उन्हें विविध रूपों में 17 बार विष दिया। परन्तु यौगिक क्रियाओं के माध्यम से स्वामी जी स्वयं को फिर स्वस्थ कर लेते थे। अंत में विधर्मियों द्वारा पिसा हुआ कांच दूध में पिलाने से स्वामी जी की प्राण लीला समाप्त हो गई। इस तरह वर्ष 1883 में दीपावली के दिन उन्होंने ‘हे ईश्वर, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो’ कहते हुए अपनी नश्वर देह का त्याग कर दिया। महर्षि दयानन्द का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को नतमस्तक करता रहेगा
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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

नववर्ष

     डॉ. कृष्ण के. ‘आर्य’                                                        

        नववर्ष पर विशेष


वर्षभर में दुनिया पचास से अधिक बार मनाती है नया साल


        दुनिया में नववर्ष मनाने की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। ‘पीछे छोड़-आगे दौड़’ की कल्पना मानव के स्वस्थ रहने की अनूठी कला है। अतीत की घटनाओं को पकड़कर रखने से व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। विश्व के मनीषियों ने बीते समय को भूल जाना ही श्रेष्ठकर माना है। यही कारण लगता है कि व्यक्ति एक दूसरे को देखा-देखी हर बार नववर्ष मनाने की होड़ में लगा रहता है ताकि भूत की घटनाओं को भूलकर भविष्य पर ध्यान दे सकें।
        एक जनवरी को नए साल का जश्न मनाने वाले शायद ही यह नहीं जानते होंगे कि संसार में पूरे वर्ष की अवधि के दौरान 50 से अधिक बार नववर्ष मनाए जाते हैं। इस वैज्ञानिक युग में इंसान के कदम चांद तारों की तरफ बढ़ रहे हैं लेकिन आज भी पूरी दुनिया कैलेंडर प्रणाली पर एक मत नहीं है। दुनिया में कैलेंडर प्रणाली कहीं सूर्य या चन्द्रमा तो कहीं सूर्य, चन्द्रमा और तारों की चाल पर आधारित मानी जाती है। इसके अतिरिक्त धार्मिक मान्यताओं पर भी विभिन्न कैलेंडर प्रणालियां लागू हैं। इस कारण केवल भारत में ही वर्षभर के दौरान दर्जनभर नववर्ष मनाए जाते हैं।
स्ंसार की आबादी लगभग 8.30 अरब है। इसमें विभिन्न मत-सम्प्रदायों को मानने वालों की बड़ी संख्या है। दुनिया में लगभग 29 प्रतिशत आबादी ईसाई मत को मानती है, जबकि इस्लाम को मानने वाले लगभग 26 प्रतिशत हैं। सत्य सनातन वैदिक धर्म (हिन्दू) को लगभग 15 प्रतिशत, बौद्ध लगभग 5 प्रतिशत, अन्य मतावलम्बी लगभग 2.5 प्रतिशत हैं तथा शेष किसी भी धर्म या मत-सम्प्रदाय से असंबद्ध रखते है। विश्व में यही लोग अपने-अपने मतानुसार नया साल मनाते हैं।
        दुनिया में सबसे अधिक आबादी ईसाई समुदाय की है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर पर आधारित नववर्ष मनाती है। संसार में इसी कैलेंडर के आधार पर अधिकतम जनसंख्या द्वारा नया साल प्रतिवर्ष एक जनवरी को मनाया जाता है। इसे अन्य मत, सम्प्रदायों तथा धर्म के लोग भी जाने-अनजाने में एक जनवरी को ही नववर्ष मनाते है। इसके अतिरिक्त अन्य मतों के लोग अपनी आस्था और सामाजिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर निम्न प्रकार से नया साल मनाते है।

ग्रेगोरियन कैलेंडर- एक जनवरी को मनाया जाना वाला ईसाई नववर्ष इसी कैलेंडर पर आधारित है। इसे रोमन कैलेंडर भी कहा जाता है। यह नववर्ष ईसाई समुदाय के अलावा अन्य मत-सम्प्रदाय के लोगों द्वारा भी मनाया जाता है। इस कैलेंडर में ही महीनों के नाम जनवरी से दिसम्बर होते हुए साल की संरचना बनती है। रोम के पहले राजा रोमुलस ने इसकी शुरुआत 10 महीनों के एक चंद्र कैलेंडर के तौर पर की थी, जो मार्च से शुरू होता था और सर्दियों को छोड़ देता था। रोम के दूसरे राजा नूमा पोम्पिलियस ने इसमें जनवरी और फरवरी जोड़कर इसे 12 महीनों का बना दिया। जूलियस सीज़र ने 45 ईसा पूर्व इस कैलेंडर को सौर वर्ष (365.25 दिन) के हिसाब से सुधार किया और 1 जनवरी को नए साल की शुरुआत कर दी। सन् 1582 में पोप ग्रेगरी ने लीप ईयर की गणना करते हुए इसमें 10 दिन जोड़कर आज का ग्रेगोरियन कैलेंडर बनाया, जिसे अब दुनिया भर में अपनाया जाता है।
पारसी कैलेंडर- नवरोज दुनिया में मार्च महीने में मनाया जाता है, परन्तु भारत में पारसी समुदाय शहंशाही कैलेंडर का पालन करते हुए इसे जुलाई-अगस्त महीने में मनाते है। इसे लगभग 3000 वर्ष पूर्व शाह जमशेद ने मनाया था, जिसमें लीप वर्ष की गणना नहीं की जाती है।
जैन नववर्ष- जैन समुदाय के लोग इसे दीवाली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाते है। माना जाता है कि दीवाली के दिन भगवान महावीर जी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसलिए इसके अगले दिन से नया साल मनाते हैं।
बौद्ध नववर्ष- बौद्ध नववर्ष वैशाख की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह चंद्र और सौर चक्र पर आधारित माना जाता है।
यहूदी नववर्ष- यहूदी नववर्ष को रोश हशनाह के नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ होता है वर्ष का आरम्भ। इसे सितम्बर-अक्तूबर में मनाया जाता है।
इस्लामी नववर्ष- इसे हिजरी नया साल भी कहा जाता है। यह चंद्र कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की पहली तारीख को मनाया जाता है। यह ग्रेगोरियन कैलेंडर से 10-12 दिन छोटा माना जाता है। इसे इस्लामिक समुदाय की स्थापना के संबंधित माना जाता है।
नानकशाही कैलेंडर- सिखों में नववर्ष बैसाखी के अवसर पर मनाया जाता है, जो 13-14 अप्रैल को होती है। इसी दिन सन् 1699 में खालसा पंथ की स्थापना हुई थी।

सनातन कैलेंडर- सनातन (हिन्दू) कैलेंडर में नववर्ष अनेक रूपों में मनाया जाता है। सत्य सनातन वैदिक धर्म के अनुसार यह सबसे प्राचीन कैलेंडर है, जिसमें सृष्टि संवत्, कलियुग संवत्, विक्रमी संवत् तथा शक संवत् प्रमुख है। हालांकि इनका नाम तथा काल भिन्न है, परन्तु ये सभी होते एक ही दिन है। वैदिक साहित्य में कालचक्र का निर्धारण सृष्टि के पहले दिन से ही किया है। इनकी गणना वैज्ञानिक पद्धति से की गई है।
1. सृष्टि संवत्- यह सृष्टि प्रारम्भ का दिवस माना जाता है। इस दिन सृष्टि क्रम का आरम्भ हुआ था। इस संवत् का पहला दिन चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा होता है। इसे नववर्ष अर्थात् नवरात्र के नाम से जाना जाता है। इसकी गणना के 1,96,08,53,126 वर्ष हो चुके हैं। इसलिए इसे सृष्टि संवत् कहा गया है।
2. कलियुग संवत्- वर्तमान कलियुग काल 3102 ईस्वी पूर्व रहा है। इसकी शुरुआत ग्रेगोरियन कैलेंडर से 2025 वर्ष पूर्व हुई थी अर्थात 5127 वर्ष पूर्व कलियुग का आरम्भ हुआ था। इसका पहला दिन अर्थात नववर्ष भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही होता है। इसे कलियुगाब्द भी कहा जाता है।
3. विक्रमी संवत्- इसकी शुरुआत सनातन वैदिक सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल में हुई थी, जो उनकी विरोधियों पर विजय से संबंधित है। इस संवत् का आरम्भ ईसाई नववर्ष से लगभग 57 वर्ष पूर्व हुआ था। इसका पहला दिन अर्थात नववर्ष भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही होता है। यह भारत का आधिकारिक संवत् है।
4. शक संवत्- इसका पहला दिन अर्थात नववर्ष भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही होता है। यह ग्रेगोरियन कैलेंडर की सन् ईस्वी 78 में आरम्भ हुआ था। यह भारत सरकार का राष्ट्रीय कैलेंडर है।

        धर्म के आधार पर सृष्टि संवत् ही दुनिया का सबसे प्राचीन काल गणना है। इसके अतिरिक्त विभिन्न देशों में विभिन्न नामों तथा तिथियों को नववर्ष को मनाने की परंपरा है। भारत में भी हिन्दु नववर्ष को उगादी, गुड़ी पड़वा इत्यादि नामों से जाना जाता है। नेपाल में विक्रमी संवत् ही अधिकारिक सरकारी कैलेंडर है। जापान में पहली जनवरी का दिन नववर्ष ननाई या ओशोगत्यु के नाम से जाना जाता है। अमेरिका, इंग्लैंड, ब्राजील, मिस्र, मेक्सिको, नाइजीरिया, फिलीपींस इत्यादी देशों में एक जनवरी को ही नववर्ष मनाया जाता है। प्राचीन स्कॉटिश नववर्ष 11 जनवरी, वेल्स में इवान वैली का नववर्ष 12 जनवरी, मेल्टिक नववर्ष 21 जनवरी तथा चीन लेबनान, कोरिया और वियतनाम में 22 जनवरी को नववर्ष मनाया जाता।
       इसके अतिरिक्त पुराने फ्रांस में एक अप्रैल को अप्रैल फूल के रूप में नववर्ष मनाया जाता है जबकि थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, कम्बोडिया तथा साओ के बेरादिन 5 अप्रैल 2004 को चीर नववर्ष मनाया जाता है। इसी तरह 13 से 16 अप्रैल के दौरान बैसाखी को दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों भारत बांग्लादेश, श्रीलंका, थाईलैंड म्यांमार तथा कम्बोडिया में नववर्ष मनाया जाता है।पारसी नववर्ष 22 अप्रैल, बेबीलोनियन 24 अप्रैल, बौद्ध मई, प्राचीन ग्रीक 21 जून, 29 जून को रयूनिक, अरमीनिया 9 जुलाई, 16 अगस्त को मलयालम, जोरोस्ट्रियन 23 अगस्त, 30 अगस्त को एलेक्जैन्ड्रियन नववर्ष तथा रूस के रूढ़िवादी ईसाई एक सितम्बर को नया साल मनाते हैं।
       अतः दुनिया के विभिन्न मतों, सम्प्रदायांे, धर्मों तथा विभिन्न देशों की अलग-अलग मान्यताओं के आधार ही नववर्ष मनाया जाता है। इस आधार पर वर्षभर में पूरी दुनिया में लगभग पचास से अधिक बार नववर्ष मनाया जाता है।

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सोमवार, 22 दिसंबर 2025

राष्ट्रीय गणित दिवस

 डॉ. कृष्ण के. आर्य                      

राष्ट्रीय गणित दिवस पर विशेष

गणित भारतीय ऋषियों की अमूल्य धरोहर

    गणित एक अद्भूत विषय है, जिसे पढ़े तो कठिन लगता है और समझे तो आसान लगने लगता है। गणित की कठिनता का कोई पैमाना नहीं होता है। यह उस आकाश गंगा की भांति है, जिसमें जितनी गहराई तक चलते जाएंगे उतनी ही नई विशेषताओं को जानने लगते हैं। गणित जहां एक सागर की तरह गहरा है, वहीं महासागर की भांति अथाह है। इसे समझने के लिए यदि गहराई में उतरा जाएगा तो गणित की थाह पाना भी आसान हो जाता है।

    गणित, जीवन का एक ऐसा पहलु है, जिसकी हमंे हर मोड़ पर आवश्यकता अनुभव होती है। यह केवल संख्याओं और आकृतियों का खेल नहीं है, बल्कि एक ऐसी भाषा है जो हमें प्रकृति और विज्ञान को समझने में मदद करती है। गणित समस्याओं के समाधान, तार्किक और विश्लेषणात्मक चिंतन विकसित करने में हमारी मदद करता है। यह हमें कठिन समस्याओं का समाधान ढूंढने की क्षमता प्रदान करता है। गणित केवल एकल विषय नहीं है, बल्कि ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी’, भौतिकी, रसायन विज्ञान, इंजीनियरिंग और कंप्यूटर विज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी गणित की भूमिका महत्वपूर्ण है। दैनिक जीवन की समस्याओं का हल, समय प्रबंधन, बाजारवाद और दूरी की गणना इत्यादि सभी गणित के अनुप्रयोग हैं।

गणित के अनेक भाग है, जिन्हें समझकर विभिन्न क्षेत्रों में महारत प्राप्त की जा सकती है। यह केवल जमा-घटा तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन को सहज बनाने का मुख्य क्षेत्र है। इसके मुख्यः तौर पर निम्न श्रेणियों में समझा जा सकता है।

1. अंकगणित- इससे व्यक्ति जोड़, घटाव, गुणा, भाग जैसी मूलभूत क्रियाएं जान सकता है।

2. बीजगणित- यह एक रोचक विधा है। इससे गणित की कठिन पहेलियों, समीकरण, बहुपद और चर-अचर इत्यादि का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता  है। 

3. ज्यामिति- इसकी सहायता से विद्यार्थी आकृतियों, कोणों का परिमाप और क्षेत्रफल का अध्ययन कर सकता है।

4. त्रिकोणमिति- इसमें त्रिभुजों एवं अन्य आकृतियों के कोणों का माप इत्यादि के मध्य संबंधों का अध्ययन करना आसान होता है। 

5. कैलकुलस- इसमें परिस्थितियों के परिवर्तन और उनकी गति का आंकलन करना आसान रहता है।

    गणित न केवल एक विषय है, बल्कि एक कौशल है जो हमें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकता है। गणित का करियर के तौर पर उपयोग सदैव लाभप्रद रहता है। वर्तमान दौर में डेटा साइंस, डेटा विश्लेषण, मशीन लर्निंग और एआई जैसी आधुनिक विधाओं में गणित की महत्वपूण भूमिका है अर्थात् गणित के बिना इनकी कल्पना भी नही की जा सकती है। गणित ‘इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर’, सिविल, मकेनिकल तथा इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में एक अहम् टूल के रूप में प्रयोग होता है। इतना ही नही, फिनटेक और एक्ट्यूरी बैंकिंग, निवेश और बीमा क्षेत्र की कल्पना गणित के बिना अधूरी है। इनमें गणितीय कौशल की हमेशा मांग है।

    भारत भूमि पर गणितीयः समझ सृष्टि के आदि से रही है। सातवें मन्वतर के ऋषि मनु से लेकर भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण से लेकर आधुनिक गणितज्ञ इस विद्या को भली प्रकार से जानते थे। लगभग नौ लाख वर्ष पहले श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास काल की अवधि और उसकी सटीक गणना, पांडवों 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष अज्ञातकाल का आंकलन तथा वर्ष के सूर्य और चंद्रमास की जानकारी इस बात की द्यौतक है।

    परन्तु महाभारत काल के पश्चात भी भारत भूमि पर अनेक गणितज्ञों ने समाज निर्माण में अपना योगदान दिया है। मगध की धरती पर लगभग 250 वर्ष ईसा पूर्व आचार्य चाणक्य ने एक महान ग्रन्थ ‘कोटिलीय अर्थशास्त्र’ की रचना कर हमारे महान गणितज्ञ होने का प्रमाण दिया है। आचार्य आर्यभट्ट, वराहमीहिर, ब्रह्मगुप्त, भास्करार्चाय तथा लीलावती जैसे गणितज्ञों ने गणित को विशेष पहचान दिलाई है। इतना ही नही, आधुनिक भारत के श्रीनिवास रामानुजन का नाम गणित के क्षेत्र में दुनिया को आश्चर्यचकित करने वाले महान गणितज्ञ के रूप में लिया जाता है। भारत में उन्हीं के जन्म दिन 22 दिसम्बर को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है।

    महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को मैथ्स का जादूगर कहा जाता है। आज उनकी 138वीं जयंती है। उनका जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु में हुआ था। हर साल उनकी जयंती पर नेशनल मैथमेटिक्स डे होता है। 33 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था। अपनी छोटी से उम्र में उन्होंने दुनिया को 3900 से ज्यादा गणितीय सूत्र, प्रमेय और अनंत श्रृंखलाएं दीं, जिनमें π (पाई) के जरिए गणना सटीक और तेज हुई। वैज्ञानिक आज भी उनके अनेक प्रमेयों का हल निकालने में लगे हुए हैं। मान्यता है कि 12 साल की उम्र में गणित के प्रति उनकी दीवानगी इतनी थी कि वे त्रिकोणमिती में महारत हासिल कर चुके थे। 

    वर्तमान में जीवन हर क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। श्रीनिवास रामानुजन का आज के एआई साइंस में महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है। न्यूरल नेटवर्क्स और मशीन लर्निंग की नींव रामानुजन के उन गणितय सूत्रों पर टिकी है, जिसकी वजह से सुपरकंप्यूटर, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी और एल्गोरिदम डिजाइन संभव हुआ।

    अतः आज राष्ट्रीय गणित दिवस पर हमें बच्चों में गणित के प्रति लगाव और उसे समझने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

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शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

लोकभवन

 

 हरियाणा राजभवन का नाम अब होगा लोकभवन हरियाणा 

 


 कृष्ण उवाचः हरियाणा में राजभवन का नाम बदलकर अब लोकभवन हरियाणा कर दिया है। ऐसा करने वाला हरियाणा देश का 10वां राज्य बन गया है। इस संबंध में जारी अधिसूचना 1 दिसंबर 2025 से लागू हो गई है।

      हरियाणा के राज्यपाल प्रो0 असीम कुमार घोष के आदेश पर राज्यपाल के सचिव श्री दुष्मंता कुमार बेहरा आईएएस द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार यह निर्णय भारत सरकार के एक पत्रांक के आधार पर लिया गया है। अतः सभी आधिकारिक उद्देश्यों के लिए राजभवन हरियाणा का नाम अब लोकभवन हरियाणा कर दिया गया है। 

उवाच-1

सोमवार, 17 नवंबर 2025

गीता जयंती विशेष

 गीता जयंती विशेष                                               डॉ. कृष्ण के आर्य       

          विराट रूप ही भगवान श्रीकृष्ण का योगेश्वर स्वरूप

                       ‘मार्गशीर्ष की अमावस्या को दिया था गीता उपदेश’

Jagat Kranti   
             वैश्विक जनमानस की जीवनधारा को प्रभावित करने में गीता की अह्म भूमिका है। यह एक ऐसा सार्वभौमिक ग्रन्थ है, जिसकी व्यवहारिकता चिरकाल तक बनी रहेगी। कुरुक्षेत्र की धरा पर हुआ परस्पर संवाद कितना गहन था, इसका अनुमान अर्जुन की शंकाओं पर श्रीकृष्ण द्वारा की गई व्याख्या से ही स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसी संवाद को गीता कहा गया है। अर्जुन का मोहपाश कितना मोहित करने वाला था, उसे सहज ही जाना तो जा सकता है। परन्तु उसे समझने से जीवन के लक्ष्य बदल जाते हैं।

अर्जुन का वह एक प्रश्न, जिसे श्रीकृष्ण को अढ़ाई घड़ी का उपदेश देने के लिए विवश कर दिया, वह क्या था ? अर्जुन ने कहा कि

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।।

रणभूमि में युद्ध की इच्छा से खड़े बन्धु-बांधवों को देखकर मेरे अंग शिथिल हो गए हैं। मुख सूखा जा रहा है और मेरे शरीर में कम्पन पैदा होने लगी है। हे वासुदेव! मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष खिसका जा रहा है, त्वचा जल रही है, मन भ्रमित हो रहा है और मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ अनुभव कर रहा हूँ। हे मधुसूदन! पृथ्वी का राज्य तो क्या है, मैं तीनों लोकों के राज्य के लिए भी इन्हें मारना नहीं चाहता हूँ।

       ऐसी स्थिति का निर्माण कब हुआ अर्थात् वह कौन सा दिन था जब अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के मध्य इस विषय पर वार्तालाप हुई। वही दिवस गीता जयंती का दिन था। उसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान का संदेश दिया। महाभारत युद्ध की यह अनूठी घटना थी, परन्तु इसके लिए परिस्थितियां कब, क्यों और कैसे बनी। इसे जानने की अभिलाषा सभी के मन में उठ रही होंगी।

 

शांति से युद्ध की ओर-

हस्तिनापुर के दूत संजय ने विराटनगर पहुंच कर पांडवों को महाराज धृतराष्ट्र का संदेश सुनाते हुए कहा कि आप जहाँ भी हो वहीं स्वस्थ रहो। उन्होंने कहा कि अपने सगे-सम्बन्धियों को मारने से तो भीख मांग कर जीवित रहना अच्छा है। इस घटना के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण ने पांडव सभा में कहा कि मैं  कृष्ण, दोनों पक्षों के कल्याण के लिए कौरव सभा में जाऊँगा और एक शान्तिदूत बन कर शान्ति वार्ता करूँगा। हालांकि संजय की बात सुनकर मैं कौरवों के व्यवहार के विषय में जान चुका हूँ, फिर भी मैं हस्तिनापुर जाकर कौरवों की सभा में दुर्याेधन के अच्छा और बुरा होने के सभी संशय दूर कर दूँगा। वहाँ पहुँच कर मैं तनिक भी त्रुटि किए बिना समस्त कौरवों और पांडवों के कल्याण और सन्धि स्थापना का प्रयास करूँगा।

       राजसभा में पहुंचने पर भीष्म, द्रोण तथा महाराज धृतराष्ट्र सहित अन्य महानुभावों ने अपने आसनों से खड़े होकर श्रीकृष्ण का स्वागत किया। वहाँ विराजमान अनेक देशों के राजाओं ने भी श्रीकृष्ण का अभिवादन किया और उन्हें टकटकी लगाकर निहारने लगे। सभा में सन्नाटा छा गया और सभी श्रीकृष्ण के बोलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसके पश्चात् दुन्दुभि के समान गम्भीर स्वभाव वाले श्रीकृष्ण ने बोलना आरम्भ किया। उन्होंने अपने वक्तव्य की शुरूआत ठीक उसी प्रकार से की जैसे कोई वरिष्ठ व्यक्ति किसी कार्य के लिए बच्चों को मनाता है।

       श्रीकृष्ण ने महाराज धृतराष्ट्र की प्रशंसा करते हुए कहा कि कालातीत से समस्त राजाओं में कुरुवंश श्रेष्ठ रहा है। यहाँ शास्त्र और सदाचार का पालन किया जाता रहा है। यहाँ कृपा, अनुकम्पा, करुणा, विनम्रता, सरलता, क्षमा और सत्य आदि के जो गुण रहे हैं, वह अन्य राजाओं में नहीं रहे। हे राजन्! ऐसे उत्तम गुणयुक्त एवं प्रतिष्ठित कुल में उत्पन्न होकर भी आपके कारण हुए किसी अनुचित कार्य को कैसे उचित कहा जा सकता है।

       श्रीकृष्ण ने अपने विस्तृत वक्तव्य के दौरान कहा कि जहाँ अधर्म से धर्म और असत्य से सत्य का हनन होता है, वह सभा नष्ट हो जाती है। पांडव धर्म के मार्ग पर चलकर अपना राज्य लौटाने का अनुरोध कर रहे हैं। इसलिए अपने अनुज पुत्रों को पैतृक भाग देकर उनका मनोरथ पूर्ण करें। राजन् ! इससे पांडवों और कौरवों दोनों का समान रूप से कल्याण होगा। इस तरह से श्रीकृष्ण ने उन्हें युद्ध की भयावह स्थिति का भी आभास करवाया। परन्तु दुर्योधन द्वारा संधि प्रस्ताव न मानने पर भगवान श्रीकृष्ण विरक्त हो गए सभा से बाहर आ गए और न चाहते हुए भी शांति प्रस्ताव से युद्ध की स्थिति बन गई।

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गीता उपदेश स्थल-

युद्ध के लिए दोनों सेनाएं कुरुक्षेत्र की धरा पर एकत्र होने लगी। युद्धभूमि के पश्चिम की तरफ मुहं करके पूर्व दिशा में कौरव सेना खड़ी हो गई और पूर्व में मुख करके पश्चिम दिशा में पांडव सेना युद्ध के लिए डट गई। इस विषय पर उद्योगपर्व में दिया है कि

पञ्चयोजनमुत्सृज्य मंडलम् तद्रणाजिरम्।

सेनानिवेशास्ते राजन्ना विशञ्छतसंघशः।।

अर्थात् युद्ध के लिए दोनों सेनाओं के शिविरों के मध्य पांच योजन (लगभग 64 वर्ग किलोमीटर) का घेरा छोड़कर सौ-सौ की संख्या वाली श्रेणीबद्ध छावनियां डाल दी गईं। युद्धभूमि में प्रवेश के लिए चार द्वार बनाए गए और प्रत्येक द्वार पर एक-एक यक्ष को द्वारपाल रखा गया।

      सम्भवतः उस समय यह स्थान दोनों सेनाओं के मध्य और एक किनारे पर रहा होगा। इस स्थान पर अर्जुन और श्रीकृष्ण के मध्य हुई वार्त्ता को ही गीता उपदेश कहा गया है। मैंने अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ में इसे ज्ञानगीत की संज्ञा दी हैं। वर्तमान में वह स्थान ज्योतिसर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है, जो कुरुक्षेत्र बस अड्डा से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।


गीता उपदेश तिथि-

कौरव सभा में हुई ख़ीचतान के उपरान्त भगवान श्रीकृष्ण और कर्ण की एकान्त में भेंट हुई। श्रीकृष्ण ने कर्ण के सामने प्रस्ताव रखा कि पांडव उसके भाई है। अतः वह पांडवों की ओर से युद्ध करें परन्तु कर्ण ने इसे ठुकरा दिया। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा कि हे कर्ण ! मेरा प्रस्ताव तुम्हें स्वीकार नहीं है और तुम मेरे द्वारा प्रदत्त पृथ्वी का राज्य भी ग्रहण नहीं करना चाहते हो। इसलिए तुम आचार्य द्रोण, पितामह भीष्म और कृपाचार्य से जा कर कहना कि इस समय सौम्य मार्गशीर्ष मास चल रहा है। इसमें जलाने की लकड़ियां और घास सुगमता से प्राप्त हो जाती है। सभी प्रकार की औषधियां एवं फल-फूल से समृद्धि होती है। धान के खेतों में खूब फल लगे हैं, मक्खियां भी कम है और कीचड़ का भी नाम नहीं है। इस सुखद मास में न अधिक गर्मी है और न ही अधिक सर्दी है।

इस पर महाभारत के उद्योगपर्व के अध्याय 29, श्लोक 33 में कहा है कि

सप्तमाच्चापि दिवसादमावास्या भविष्यति।

संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम्।।

अर्थात् आज से सातवें दिन अमावस्या होगी, उसके देवता इन्द्र कहे गए हैं। उसी में युद्ध आरम्भ किया जाएगा। इसका अर्थ हुआ कि मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को श्रीकृष्ण हस्तिनापुर राजसभा में शान्तिदूत बन कर गए थे। परन्तु मौसलपर्व के अनुसार युद्ध वाले महीने में त्रयोदशी को अमावस्या थी। इस तरह श्रीकृष्ण ने कौरवों के सम्मुख कृष्ण पक्ष की सप्तमी को शान्ति प्रस्ताव रखा था।

      अतः मार्गशीर्ष की अमावस्या को ही कुरुक्षेत्र भूमि पर महायुद्ध आरम्भ हुआ था और मूलतः उसी दिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता उपदेश दिया था। इस वर्ष गीता जयंती अमावस्या 20 नवम्बर 2025 को है। इसी अमावस्या को सही मानना चाहिए। परन्तु अनेक जानकार गीता जयंती को मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी को मानते हैं, इसलिए इसे मोक्षदा एकादशी भी कहा गया है। यह इस वर्ष एक दिसम्बर 2025 को होगी

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गीता उपदेश-

मार्गशीर्ष की अमावस्या के उस दिन सूर्योदय के समय अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण रथ को दोनों सेनाओं के मध्य स्थान पर ले गए। वहां पर अर्जुन के विचलित होने की स्थिति, प्रश्न तथा उनके मोहपाश की स्थिति बड़ी दयनीय थी।  

अर्जुन की ‘किमकर्त्तव्य विमूढम्’ की स्थिति को भांपते हुए अर्जुन के उपरोक्त एक प्रश्न पर भगवान श्रीकृष्ण ने तीन तरफ से वार किया। श्रीकृष्ण ने त्रिविद्या के ज्ञान, कर्म और उपासना के गूढ़ रहस्य को समझाते हुए कर्म की महत्ता पर बल दिया। उन्होंने अर्जुन को ज्ञानयोग, कर्मयोग तथा भक्तियोग की धारा में प्रवाहित करते हुए कर्त्तव्य पालन का उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि इस संसार में कर्म को करने और कर्त्तव्य के पालन से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नही है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि

न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।

नान वाप्तम वाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! तीनों लोकों में मेरे लिए न तो कोई कर्त्तव्य कर्म करना शेष है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु मुझे अप्राप्य है, न मुझे किसी वस्तु का अभाव है और न ही प्राप्त करने की इच्छा है, फिर भी मैं निरंतर कर्म में लगा रहता हूँ। पार्थ ! ज्ञानी मनुष्य अनासक्त भाव से लोक-संग्रह के लिए कर्म करते हैं और वह तुम्हें भी करने चाहिए।

        गीता का यह रहस्य वर्तमान में प्राप्त श्रीमद्भागवत के 18 अध्यायों में दिए 700 श्लोकों में सम्मिलित है। परन्तु महाभारत में गीता उपदेश को मात्र 70 श्लोकों में दिया हुआ है, जिसे मैंने अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ में वर्णित करने का प्रयास किया है। श्रीकृष्ण और अर्जुन का यह वार्तालाप मात्र अढ़ाई घड़ी अर्थात् लगभग एक घंटे का हुआ था। श्रीकृष्ण और अर्जुन के परस्पर इसी संवाद को गीता उपदेश कहा गया है।


विराटरूप-

        गीता उपदेश के दौरान योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्त्तव्यवादी बनने और उनके संस्कारों को चित्त पर नहीं पड़ने देने का सूत्र दिया। उनके ज्ञान, कर्म और उपासना के संदेश के पश्चात् भी जब श्रीकृष्ण को लगा कि अर्जुन अभी संशय में घिरा है, तब उन्होंने योग का सहारा लिया और युद्धभूमि में ही समाधिस्थ हो गए। ब्रह्मचारी कृष्णदत्त के अनुसार श्रीकृष्ण ने अर्जुन की आत्मा को अपनी आत्मिक शक्ति के साथ संयोग करवाया। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन की आत्मा से मेल करते हुए प्राण की गति के रेचक को कुम्भक में परिणत कर दिया। उन्होंने अपने सभी दस प्राणों को मन से मिलाप कर परमात्मा के साथ एक सूत्र में पिरो दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण की आत्मा का अर्जुन की आत्मा से मिलन हुआ और आत्मा जागृत होने लगी।

       इससे अर्जुन की अन्तरात्मा अति हर्ष से भर गई और उन्हें दिव्य दृश्य दिखाई देने लगे। अर्जुन को जैसे ब्रह्मांड में अग्नि प्रदीप्त हो रही है, समुद्र स्थिर हो गया, वायु की गति का आभास होने लगा तथा जल तेज प्रवाह में चलता दिखाई दे रहा था। प्रकृति का चक्र भौतिक पिण्डों में गति कर रहा था। ईश्वर के आंगन में जीवन की गति का चक्र चलता दिखाई देने लगा था। इसमें कोई मृत्यु को प्राप्त हो रहा था तो कोई जन्म ले रहा था। इस प्रकार दोनों सेनाएं मृत्यु के आंगन में विराजमान दिखाई दे रही थीं। श्रीकृष्ण का यह आत्मिक मेल और भावों का अनूठा संचार था। इससे अर्जुन की बुद्धि निर्मलता को प्राप्त हो गई और वह ईश्वर के यर्थाथ स्वरूप के दर्शन कर पाये।यही विराटरूप भगवान श्रीकृष्ण का योगेश्वर स्वरूप कहलाया था, जो मात्र योग की उत्कृष्ठता से ही सम्भव हुआ।

      अतः श्रीकृष्ण और उनके संदेश की व्यवहारिकता को समझने के लिए केवल योग ही एकमात्र साधन है। व्यक्ति, योग को अपनाकर ही गीता के रहस्यों को जानने में सक्षम हो सकता है। यही गीता का मूल रूप है, जिससे मानव स्वयं और समाज का उत्थान करने में समर्थ होगा।

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सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

राधे-राधे

 राधे-राधे


       राधे, राधे, राधे, तू ओ३म् भूर् गा ले,

      ओ३म् भूर् गाले तू, भूव स्वः गा ले,

      राधे, राधे, राधे, तू ओ३म् भूर् गा ले,

      ओ३म् भूर् गाले तू, कष्ट मिटा ले, 

कष्ट मिटा ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...

सुख दिला तत्, सवितुर गा ले,

सूरज की भांति, जीवन उज्जवल बना ले,

वर योग्य ईश्वर, तू वरेण्यं गा ले,

भर्गाे से कर्मों को, शुद्ध बना ले,

शुद्ध बना ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...

भर्गाे है वह, तू उद्धार करा ले,

       देवस्य वह प्रभु, तू दिव्यता अपना ले,

धीमहि संग उससे, चिंतन लगा ले,

धियो के साथ तू, बुद्धि उत्तम पा ले,

बात ये मान ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...

‘यो’ है जो, ये मेरी बात मान ले,

       नः है हमारी, तू प्रचोदयात् सुना ले,

ईश स्तुति से तू, बुद्धि बल पा ले,

राधे राधे तू, ये सबको सुना ले,

सबको सुना दे तू, ‘केके’ को सुना दे, राधे, राधे, राधे...



डॉ. के. कृष्ण आर्य 


बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

सांझी विशेष

  सांझी विशेष-        हरियाणा की सांझी का ही प्रतिरूप है माता दूर्गा पूजा

        

       भारत भूमि को देवभूमि कहा गया है। यहाँ समय-समय पर दैवी आत्माओं का प्रकटीकरण होता रहा है। उन्होंने विश्व में सुख, शांति और समृद्धि के विस्तारिकरण के लिए अनेक मर्यादाओं की स्थापना की, इन्हीं मर्यादाओं के समुचित पालन की नियमावली को ही त्यौहार की संज्ञा दी है। इन त्यौहारों को वर्षभर मनाने से न केवल लोगों का जीवन रसमय बनता है बल्कि देवी-देवताओं के आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। इससे घरों में खुशियांे का आगाज होता है तथा बन्धुत्व की भावना को बल मिलता है। ऐसे ही श्रृंखलाबद्ध रूप में माता के नौ रूपों को नौ दिनों तक मनाना ही नवरात्र कहा गया है। इन्हीं नवरात्रों को माता दूर्गा के नव-दिवस भी कहते हैं। नवरात्रों के दौरान हरियाणा में सांझी माता की पूजा की जाती रही है, जिसका बृह्द रूप ही माता दूर्गा पूजा है।

          विश्व में आश्विन एवं शारदीय नवरात्र के दौरान दूर्गा पूजा की धूम होती है। बडे़-बडे़ पांड़ाल लगाए जाते हैं, जिनमें माता दूर्गा की विशालकाय मूर्ति स्थापित की जाती है। पांड़ालों को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है, जिससे उसकी अद्भूत छटा दिखाई देती है। इन पांड़ालों में सूर्यास्त के उपरान्त बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता दूर्गा की पूर्जा करते हैं। इतना ही नही, अपनी खुशी की अभिव्यक्ति करने के लिए उन्हें गायन एवं नृत्य से धूम मचाते भी देखा जा सकता हैं।

        दूर्गा पूजा को मनाने की परंपरा कब से आरम्भ हुई, इसका सही आंकलन तो नही किया जा सकता है। मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में अविभाजित भारत का बंगाल तथा वर्तमान बांग्ला देश के ताहिरपुर के राजा कंसनारायण ने अश्वमेध यज्ञ करने की इच्छा प्रकट की। परन्तु कलियुग होने के कारण पूरोहितों ने उन्हें अश्वमेध यज्ञ के स्थान पर माता दूर्गा की पूजा करने की सलाह दी। इसके पश्चात बंगाल के बड़े जमींदारों द्वारा दूर्गा पूजा की शुरूआत हुई। आजकल विदेशों से लेकर भारत के बड़े नगरों, कस्बों तथा गांवों तक दूर्गा पूजा के मंडप सजाए जाते हैं। उनमें गरबा एवं डांडियां नृत्य की झंकार सुनाई देती है।

     पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महिषासुर नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था। उसने देवताओं (श्रेष्ठ लोगों) को बन्दी बनाया और उन पर अत्याचार करने लगा। मुसिबत में फंसे देवताओं ने उससे छुटकारा पाने के लिए दुर्गा माता से प्रार्थना दी। देवताओं की प्रार्थना पर माता दुर्गा ने ‘अष्टभुज’ रूप धारण कर शेर पर सवार होकर महिषासुर का अन्त कर दिया। उसी समय से लोग इन दिनों को दुर्गा दिवसों अर्थात नवरात्रों के रूप में मनाते हैं। इसलिए दूर्गा पूजा भी बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में ही मनाया जाता है।

        हरियाणा राज्य में माता दूर्गा पूजा की परंपरा अति प्राचीन है, जिसको सांझी माता कहा जाता रहा है। माना जाता है कि 15वीं शताब्दी में वैष्णव मंदिरों में सांझी की पूजा आरम्भ की गई थी। हरियाणा के गांवों में सांझी पूजा सदियों से चली आ रही है। अतः प्रदेश में सांझी माता की पूजा का इतिहास आज मनाए जाने वाले दूर्गा महोत्सव से प्राचीन नजर आ रहा है। सांझी की पूजा पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान सहित उत्तर भारत में धूमधाम से की जाती है।


       सांझी, शब्द सांझ से बना है। सांझ का अर्थ सांय अर्थात गोधूली का समय। माता दूर्गा की पूजा सांझ के समय की जाती है, इसलिए इसे सांझी कहा गया है। आज भी गांवों में लोग दिवार पर सांझी माई की मूर्ति उकेरते है। गाय के गोबर, मिट्टी की टिकड़ियों को रंगीन करके दिवारों पर चिपकाते हैं और इसे माता दूर्गा का रूप देते हैं। इसके अगल-बगल में चांद और सूरज बनाए जाते हैं। उसके मुहं पर कपड़ा लगाया जाता और सांझ के समय सांझी की आरती की जाती है। कुवांरी लड़कियां अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए नवरात्रों में सांझी की आरती इस प्रकार करती हैं।

आरता ऐ आरता, सांझी माई आरता,

क्यांहे का तेरा दीवा, क्यांहे की तेरी बाती,

चांदी का दीवा, सोने की बाती,

जाग सांझी जाग ऐ, तेरे माथा लाग्या भाग ऐ...

नवरात्रों के दौरान ही नौ दिनों तक सांझी माई की पूजा की जाती है। घर की लड़कियां तथा महिलाएं इस प्रकार के अनेक लोक गीतों से मां की आराधना करती हैं तथा उनसे मन चाहे आशीर्वाद मांगती हैं। माता का आरता के लिए घी का दीपक जलाया जाता है और माता को हलवा या अन्य मिष्ठ पदार्थों का भोग लगाया जाता है। उसके पश्चात नवरात्रों के व्रती अपना उपवास खोलने के लिए भोजन करते हैं।

नवरात्रों में भोजना का भी विशेष महत्व है। सांझी माई के नौ दिनों तक फलाहार किया जाता है। सुबह से शहद और नींबू पानी, दूध या छाछ का सेवन किया जाता है तथा दोपहर को केला, सेब या पपीता इत्यादि फलों को खाद्य रूप में लिया जाता हैं। सांझी का आरता करने के बाद रात्रि में शामक, आलु का हलवा या साबुदाने की खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। इस प्रकार के आहार लेने के पीछे शरीर शौधन का ही कारण माना जाता है।

हमारे शास्त्रों में कहा है कि

 ‘आहार शुद्धो, सत्व शुद्धि, सत्व शुद्धि, ध्रुवा स्मृति’ 

अर्थात हमारे आहार के शुद्ध होने से बुद्धि तथा बुद्धि के पवित्र होने से हमारी स्मरण शक्ति का विकास होता है। नवरात्रों के दौरान अल्पाहार करने से शरीर की बीमारियों का भी शमन होता है। अतः नवरात्रों का न केवल धार्मिक महत्व है बल्कि वैज्ञानिक महत्व भी है।

हरियाणा की सांझी माई को नौ दिनों तक पूजा जाता है तथा दशहरे के दिन माई को तालाब या जोहड़ में इस प्रार्थना के साथ विसर्जित किया जाता है कि ‘माई तूं अगले साल फेर आईये और हमारे घरों मंे खुशियां लाईये’।

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                                                                                       डॉ. के कृष्ण आर्य    

बुधवार, 17 सितंबर 2025

मित्रता की डोर

 मित्रता की डोर

 

दिल से दिल को बांधे रखती,

और परेशानी को करती आसान,

जो एक दूसरे पर जमाए जोर,

वह है केवल मित्रता की डोर।

बिना खून के संबंध बने,

भावना संग दूसरे से जुड़े,

जाति बंधन दे जो तोड़,

वह केवल मित्रता की डोर।

रहे साथ खड़ा मुश्किल में,

न फूला समाए खुशी में,

जो भावों का है मजबूत जोड़,

वह है केवल मित्रता की डोर।

वह वसंत ऋतु की खुशबु,

बहे रंग हरा, सरसों की सुगंध,

जब वह पहुँचाए उनकी डगर,

है जो केवल मित्रता की डोर।

एक जमाना श्रीराम का भाई,

निषाद संग मित्रता निभाई,

नहीं बड़ा छोटा था किसी ओर,

ऐसी होती है मित्रता की डोर।

श्याम के महल सुदामा आए,

खुशी के आंसु से वह नहलाए,

ऐसी दोस्ती न देखी कोई और,

दे सम्मान बढ़ाए मित्रता की डोर।

आज जमाना बस ‘केके’ ऐसा,

अपनी खुशी में जग खुश जैसा, 

स्वार्थ सिद्धि पर भागे कहीं ओर,

फिर कौन उड़ाए मित्रता की डोर।


                                                                                       डॉ. के कृष्ण आर्य ‘केके’


गुरुवार, 11 सितंबर 2025

कर्मयोगी कृष्णः

  पुस्तक                                                                     विवरण

कर्मयोगी कृष्णः  

      यह पुस्तक भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित एक अनुसंधानात्मक जीवन चरित्र है। इसमें उनकी 60 पीढ़ी पहले से लेकर दो पीढ़ी बाद की वंशावली दी है। पुस्तक में उनके प्रारम्भिक जीवन की घटनाएं, उनकी शिक्षा, दिनचर्या, द्वारका तथा मूल गीत का विशेष तौर पर वर्णन किया गया है। इसका विमोचन हरियाणा के माननीय मुख्यमंत्री द्वारा 4 नवम्बर 2024 को किया गया था।

युवा पीढ़ी के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शक बनेगी और उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के वास्तविक जीवन के दर्शन करवाएगी। यह पुस्तक Google Play Books पर प्रकाशित है। इसका लिंक फोटो सहित ब्लॉग पर https://play.google.com/store/books/details?id=2-5-EQAAQBAJ भी दिया है।

       धन्यवाद।


 जीवन गीतः             यह पुस्तक काव्य पर आधारित है, जिसका शीघ्र प्रकाशन होने जा रहा है।


डॉ. के कृष्ण आर्य

चंडीगढ़।




बुधवार, 20 अगस्त 2025

वेद की ऋचाएं ही थी गोपियां ?



 वेद की ऋचाएं ही थी गोपियां ?

भगवान श्रीकृष्ण की महानता का बखान करना सहज नहीं है। उनके जीवन में गोपियांे का महत्ता प्रकाश रहा है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण सदैव गोपियों में रमण करते थे तथा नित्य उन्हीं के चिंतन में लगे रहते थे। इतना ही नही, वह गोपियों के वस्त्र चुराने, रासलीला करने तथा अपना अधिकतर समय उन्हीं के साथ व्यतीत करते रहते थे। परन्तु श्रीकृष्ण का जीवन इतना उत्कृष्ट था कि आमजन द्वारा उन्हें समझना तो दूर, पढ़ना भी आसान नहीं है।

श्रीकृष्ण जन्मजन्मातरों के ऋषि रहे। सत्य सनातन वैदिक साहित्य में उनके विषय में बड़ा गहरा चिंतन दिया है। यहां गोपियों का सूक्ष्म अर्थ बड़ा गहन और स्मरणीय दिया है। गो का अर्थ गाय तथा हमारी इन्द्रियां दोनों होता है। अपनी इंद्रियों के स्वभाव को समझने, परखने और यथानुकूल सात्विक आचरण करने वाले स्त्री-पुरुष को गोपी या गोप कहा गया है। श्रीकृष्ण भी ऐसे ही एक गोप थे, जो अपनी इंद्रियों को वासना रहित बनाने में लीन रहते थे। अतः इंद्रियों के आचरण को शुद्ध करने में प्रयासरत रहने के कारण ही उन्हें गोपिका रमण भी कहा गया, इसे ऐसे ही समझना चाहिए।

सोलह हजार गोपियों का सत्य-

पुराणों में श्रीकृष्ण की सोलह हजार गोपियां बताई गई है और वह सदैव उन्हीं में रमण करते रहते थे। इस संबंध में गर्ग मुनि महाराज ने सुन्दर व्याख्या करते हुए गर्ग संहिता में वेद की ऋचाओं को भी गोपियां कहा हैं। वेद के मंत्रों को ऋचाएं कहते हैं। ब्रह्मचारी कृष्णदत्त की पुस्तकों में भी ऐसा ही स्वीकार किया है। अतः वेद की ऋचाओं अर्थात् वेद के गोपनीय मंत्र ही गोपियां है। 

महर्षि ब्रह्मा से लेकर जैमिनी और ऋषि दयानन्द पर्यन्त सभी ने चार वेद स्वीकार किए हैं। इनमें सृष्टि का सम्पूर्ण ज्ञान समाहित है। इन चार वेदों में सम्मिलित ऋग्वेद में ज्ञान, यजुर्वेद में कर्म, सामवेद में उपासना तथा अथर्ववेद में विज्ञान विषय निहित है, जिनमें कुल 20,346 मंत्र हैं। इनमें से भगवान श्रीकृष्ण को सोलह हजार से अधिक वेदमंत्र कंठस्थ थे। इतना ही नहीं श्रीकृष्ण इन्हीं वेदमंत्रों के अर्थों को समझने एवं उनमें छुपे रहस्यों पर नित्य अनुसंधान करते और यथानुकूल आचरण करते थे। श्रीकृष्ण इन्हीं वेदमंत्र रूपी गोपियों में सदैव रमण करते थे। 

इस कार्य में वह इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें कभी खाने-पीने तक का भी आभास नहीं रहता था। ब्रह्मचारी कृष्णदत्त की पुस्तक ‘महाभारत एक दिव्य दृष्टि’ के अनुसार ‘श्रीकृष्ण को सोलह हजार आठ वेद की ऋचाएं कण्ठस्थ थी।’ इसका उल्लेख मैंने अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ में भी किया है। श्रीकृष्ण ने अपने जीवन का अधिकतम समय इन्हीं वेद की ऋचाओं अर्थात् गोपियों के साथ व्यतीत किया। परन्तु आधुनिक काल में इसे भगवान श्रीकृष्ण की 16108 गोपियां (रानियां) बना दिया है, जोकि अर्थों का अनर्थ ही समझना चाहिए। 

राधा रमण-

लोकाचार में यह प्रचलित है कि श्रीकृष्ण की 16108 गोपियां थी। श्रीकृष्ण उनमें राधा से विशेष प्रेम रखते थे और वह सदैव राधा के साथ एकान्तवास में रमण रहते थे। यह स्थूल वाक्य है परन्तु यदि इसका सही अर्थ समझे तो इसमें भी श्रीकृष्ण की महानता का ही चित्रण होता है। परन्तु तथाकथित विद्वानों ने इसे भिन्न शरीरों से जोडक़र भगवान श्रीकृष्ण को बदनाम करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। इससे समाज में अनेक भ्रांतियों ने जन्म ले लिया और अंतरिक्ष को दूषित किया। अतः लोकाचार में राधा को कहीं कृष्ण की सखी, माता, पुत्री या मामी दिखाया गया है, जिसे कपोल-कल्पित समझना चाहिए। 

ऋग्वेद के भाग-1, मंडल-1, मंत्र 2 में राधस शब्द का प्रयोग हुआ है। इसका अर्थ समस्त सुखों एवं वैभव का प्रतीक बताया है। ऋग्वेद (2/3,4,5) के मंत्रों में सुराधा शब्द श्रेष्ठ धनों के रूप में प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेद के ही एक मंत्र में राधा एवं आराधना शब्द को शोध कार्यों के लिए प्रयोग किया गया है। वस्तुतः सनातन वैदिक साहित्य में राधा शब्द संसार, ऐश्वर्य एवं श्री इत्यादि को धारण करने के लिए प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद (1,22,7) के एक मंत्र में कहा है।

विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः। सवितारं नृचक्षसम्।

यहाँ गोपियां हमारी इन्द्रियों तथा राधा आत्मा को कहा गया है। इसका काव्यांश अर्थ है कि ‘वह सब के हृदय में विराजमान, सर्वज्ञाता, सर्वद्रष्ट्रा जो राधा को गोपियों (इंद्रियां) से निकालकर ले गए’, वह ईश्वर हमारी रक्षा करें। अतः वह इन्द्रिय दोषों से हमारी आत्मा (राधा) की रक्षा करने वाला ईश्वर ही है। 

अर्थात् श्रीकृष्ण अपनी आत्मा रूपी राधा को गोपियां अर्थात् इन्द्रिय दोषों से निकाल कर एकांत में रमण करते थे। इसका अर्थ हुआ कि श्रीकृष्ण योग में इतने लीन रहते थे कि वह अपनी राधाई आत्मा को गोपीय (इंद्रिय) दोषों से दूर रखते थे। अतः श्रीकृष्ण की आत्मा सदैव एक द्रष्ट्रा की भूमिका में रहती थी। उनका स्वयं पर इतना नियंत्रण होता था कि वे अपनी पांचों ज्ञान इंद्रियों को किसी दोष की ओर आकर्षित नहीं होने देते थे। इतना ही नहीं, वह अपनी आंतरिक प्रेरणा से इंद्रिय दोषों के संस्कारों को आत्मा और चित्त पर भी नहीं पड़ने देते थे। इसके लिए श्रीकृष्ण सदैव चिन्तन, मनन और निदिध्यासन में रत रहते थे। इसलिए ही महर्षि दयानन्द सरस्वती ने श्रीकृष्ण को जीवन में कभी कोई अधर्म कार्य नहीं करने का प्रमाणपत्र दिया है। ब्रह्मचारी कृष्णदत्त ने भी उन्हें आप्त पुरुष स्वीकार किया है। अतः राधा का पर्याय आत्मा और गोपिकाओं का दस इंद्रियां एवं उनकी वासनाओं को समझना चाहिए।

कैसे शुद्ध होगा ब्रह्मांड-

जब ब्रह्मांड की किसी भी धरा पर ईश्वरीय व्यवस्थाओं का लोप होता है तो उससे उत्पन्न नकारात्मक प्रभाव से अन्तरिक्ष दूषित होने लगता है। इससे जीवों को उत्तम वृष्टि, सद्भावनाओं से युक्त विचारधारा तथा खाद्य पदार्थों की कमी होने लगती है तथा व्यवस्थाएं चरमरा जाती हैं। ब्रह्मचारी कृष्णदत्त के अनुसार ‘सुक्ष्म शरीर से अन्तरिक्ष में रमण करने वाली आत्माओं को देवता कहते हैं’। अर्थात वे आत्माएं अपने सूक्ष्म शरीर के माध्यम से सृष्टि पर दृष्टिपात करती हुई स्वछंद रूप से गमन करती हैं। 

ऐसी स्थिति में मुमुक्षु (मोक्ष के निकट) एवं सृष्टिद्रष्टा आत्माएं ईश्वर की प्रेरणा और व्यवस्था से धरा पर जन्म लेने का संकल्प लेती हैं ताकि व्यवस्थाओं में सुधार कर समाज में धर्म का पुनरुत्थान हो सके। इसी से ब्रह्मांड का शौधन होता है। इस तथ्य को स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता संदेश में अर्जुन के सामने प्रकट करते हुए भी कहा कि... 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे

अर्थात् संसार में जब-जब धर्म की हानि होती है, अत्याचार और अनाचार बढ़ता है तो उन (कृष्ण) जैसी आत्माएं संसार में पदार्पण करती हैं और लोगों को धर्म अर्थात् कर्त्तव्यपथ पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। इतना ही नहीं, ईश्वरीय व्यवस्थाओं की स्थापना के लिए ऐसी दिव्य आत्माएं युग-युग में जन्म लेती हैं। 

अतः श्रीकृष्ण एक ऐसी महान आत्मा थे, जिन्होंने व्यवस्थाओं के सुधार के लिए कभी धर्म के मार्ग का त्याग नही किया। उनका जीवन न केवल युगों तक मानव जाति को प्रेरणा देता रहेगा बल्कि संसार के लिए सदैव अनुसंधानात्मक विषय रहेगा। उनके विषय में फैली गलत धारणाओं का समाप्त करने से ब्रह्मांड का शौधन भी होगा।

धन्यवाद।


                                                                                                    डॉ. के कृष्ण आर्य

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

पूतना एक महामारी थी ?

                                                     



पूतना एक महामारी थी ?

संसार में सबसे अधिक यदि किसी विषय पर लिखा जाता है तो वह श्रीकृष्ण है। उनका जीवन अनेक रहस्यों से भरा रहा है। हम कभी उन्हें भगवान के रूप में पूजते हैं तो कभी रसिया बोल देते है। कभी अवतार मानते हैं तो कभी गोपियों के वस्त्र चुराने वाला बता देते हैं। कभी हम उनकी बाल लीलाओं को सुनकर हर्षित होते है तो कभी सोलह कलाओं का बखान करने लगते हैं। हमारे दिमाग में कभी पूतना की विशालकाय आकृति तैरने लगती है, तो कभी हम राधा की मनमोहक छवि से अभिभूत हो जाते हैं। अतः भगवान श्रीकृष्ण एक ऐसे परमपुरुष थे, जिनके जीवन के रहस्यों पर अनेक विद्वानों ने अपनी समझ से व्याख्या की है।
यह महापुरुष 3170 वर्ष विक्रमी सम्वत् पूर्व भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण योग, वृष लग्न, अष्टमी तिथि, अर्ध रात्रि चन्द्रोदय शून्यकाल में माता देवकी के गर्भ से अवतरित हुए। बालक का श्याम वर्ण, घुंघराले केश, कमल की भांति सुन्दर एवं विशाल नयन, तेजोमय चेहरा तथा स्फटिक की भांति कांतिमय शरीर विशेष आभा से दमक रहा था। उनके नामकरण के समय गर्ग मुनि ने कहा कि यह बालक षड्विध ऐश्वर्य के स्वामी, भगवान विष्णु की भांति प्रजापालक होगा। नरों में सिंह के समान बल वाला यह बालक नरसिंह कहलाएगा। अतः इसके गुण स्वभाव के अनुरूप यह बालक कृष्ण नाम से विख्यात होगा। कृष्ण पक्ष की अन्धेर रात्रि में चन्द्रोदय काल में जन्में कृष्ण को कृष्ण चन्द्र के नाम से जाना जाएगा। परन्तु माता यशोदा बाल कृष्ण को पीताम्बर वस्त्रों से विभूषित कर लाड लड़ाती थी।
इस बालक के जीवनकाल में अनेक ऐसी घटनाएं घटित हुई, जिनकी तुलना इतिहास में अन्य किसी से नही की जा सकती है। उन्होंने अपने जीवनकाल में पूतना संहार, कालीदह की घटना, राक्षससों का दमन तथा अनेक असाधारण कार्यों को अन्जाम दिया। वह एक यशस्वी, तेजस्वी, बलस्वी, धनस्वी, तपस्वी तथा धर्मात्मा की पूर्णता को प्राप्त थे, जिसके कारण भगवान कहलाए। उनके जीवन में राधा रमण, गोपियों संग रासलीला जैसे अध्याय भी सम्मिलित हैं, जिनसे उनके जीवन का अलग पहलू दिखाई देता है। ऐसे प्रकरणों का विशुद्ध लेखन मैंने अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ में प्रकट करने का प्रयास किया है ताकि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से संबंधित ऐसे अनेक रहस्यों से पर्दा उठ सके।
पूतना संहार-
बचपन से ही श्रीकृष्ण का जीवन विस्मित करने वाली घटनाओं से भरा रहा है। मान्यता है कि कृष्ण के गोकुल पहुँच जाने की सूचना पर कंस आग बबूला हो गया और उसने उस रात्रि में पैदा हुए सभी बच्चों की हत्या करने के आदेश दे दिए। कंस ने यह कार्य करने के लिए पूतना को लगाया। वह एक विशालकाय राक्षसी बताई गई है। ऐसा मानते हैं कि पूतना ने जब कृष्ण (लल्ला) को मारने के लिए विषाक्त स्तनों से दूध पिलाना आरम्भ किया तो कृष्ण ने स्तनों को जोर से खींच दिया और पूतना की मौत हो गई।
हमारे वैद्यक शास्त्रों में पूतना को अन्य प्रकार से परिभाषित किया है। आयुर्वेद की एक विख्यात पुस्तक सुश्रुत में पूतना को प्रसूता माताओं से नवजात बच्चों में होने वाला बालरोग का नाम बताया है, जिसके कारण मां का दूध पीते ही बच्चे बीमार होकर मौत का ग्रास बन जाते हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि उस समय गोकुल एवं आसपास क्षेत्र की प्रसूता माताओं में ऐसा रोग फैला हो, जिनके स्तनपान से बच्चे बीमार होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाते होंगे।
इस संबंध में आयुर्वेद के अन्य ग्रन्थ ‘कुमार तंत्र समुच्चय’ में विशेष जानकारी दी है। इस ग्रन्थ में बच्चों को होने वाले रोग और उनके निवारण के उपाय दिए हैं। ऐसी धारणा है कि इसकी रचना रावण द्वारा की गई थी। वर्तमान में श्री रमानाथ द्विवेदी एवं श्री अशोक कुमार वर्मा द्वारा इस पर टीका लिखी गई है। इसके अनुसार इस रोग से पीड़ित बच्चे अजीर्णता, पेट का बढऩा, शरीर कमजोर होना तथा मां का दूध नहीं पीने जैसी अन्य बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। यह रोग मृत्यु का कारण भी बन जाता है।
बालक कृष्ण के विषय में इस पर दो विकल्प हो सकते हैं। पहला उस समय बालक कृष्ण ने माता यशोदा का दूध पीया न हो, जिसके कारण उसे कोई हानि नहीं हुई होगी। दूसरा-माता यशोदा उस दौरान इस बीमारी से ग्रसित न रही हो। इसलिए पूतना नामक उस राक्षस का बालक कृष्ण पर कोई प्रभाव न पड़ा हो।
अथर्ववेद में रोग को भी राक्षस कहा है, इसलिए पूतना राक्षस का अर्थ पूतना रोग ही समझना चाहिए। सम्भव है कि इसी पूतना नामक रोग ने अधिकतर बच्चों को मौत का ग्रास बनाया हो। परन्तु शारीरिक बल, रोग प्रतिरोधक क्षमता और पारिवारिक सुरक्षा के कारण पूतना रोग बालक कृष्ण का कुछ नहीं बिगाड़ सका। इस तरह बालक कृष्ण पूतना को मारकर स्वयं को जीवित रखने में सफल रहे। इसी को अलंकारिक भाषा में कृष्ण द्वारा पूतना संहार माना जाए।
सुश्रुत एवं कुमारतंत्र के अनुसार यह रोग 3 दिन, 3 माह या 3 वर्ष की अवस्था में बालक को प्रभावित करता है। अतः सम्भव है कि उस समय कृष्ण की आयु 3 दिन से 3 महीने के आसपास रही होगी। इससे लगता है कि साहित्यकारों ने इस घटना को एक जीवित प्राणी के रूप में प्रस्तुत कर दिया है।
भागवत एवं अन्य पुराणों में पूतना का शरीर कहीं छह कोस तो कही 4-5 योजन बताया गया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने पूतना के 4-5 योजन लम्बे शरीर पर प्रश्नचिह्न लगाया है, जिसकी गणना इस प्रकार है।
एक कोस = 3.62 किलोमीटर
छह कोस = 3.62 गुणा 6 = 21.72 किलोमीटर = लगभग 22 किलोमीटर
एक मील = 1.609 कि.मी. तथा एक योजन = 8 मील
अतः आठ मील = एक योजन = 1.609 गुणा 8 = लगभग 13 कि.मी
पांच योजन = 13 गुणा 5 = 65 कि.मी.
इस तरह पूतना नामक यह बीमारी न्यूनतम लगभग 20 कि.मी. से 60 कि.मी. क्षेत्र तक फैली होगी। इसका उदाहरण कोरोना राक्षस को समझा जा सकता है, जिसका शरीर पूरी पृथ्वी के समान था। अतः पूतना की लम्बाई के विषय में पुराणों की बात भी कहीं न कहीं सत्य प्रतीत होती है परन्तु उसके अर्थ बदल गए हैं।
कालीदह-
कालीदह घटना का वर्णन अनेक पुस्तकों में लगभग एक समान ही दर्शाया गया है कि यमुना नदी के आसपास कालिया नामक नाग परिवार रहता था। वह यमुना नदी के पास आने वाली गऊओं एवं बछड़ों का भक्षण करता था और अपना विष नदी में छोडक़र पानी विषैला कर रहा था। इससे गांव के ग्वाल-बाल एवं लोग दुःखी रहते थे। अतः वे सभी मिलकर कृष्ण के पास गए और उन्हें पूरा वृत्तान्त सुनाया। यह सुन कृष्ण ने खेल-खेल में एक गेंद को पानी में उसी स्थान पर फेंक दिया जहाँ कालिया नाग रहता था। गेंद को निकालने के लिए कृष्ण यमुना के गहरे पानी में कूद गये और युद्ध में कालिया नाग, उसकी पत्नियों तथा बच्चों सहित सभी को पछाड़ दिया। इससे भयभीत हो नाग पत्नियों की प्रार्थना पर कृष्ण ने कालिया को जीवनदान देते हुए उसे स्थान का त्याग कर रमणक द्वीप पर प्रस्थान करने की आज्ञा दी। इसके बाद कृष्ण, कालिया के फनों पर नृत्य करते हुए यमुना नदी से बाहर आए और गांव वालों को बड़ी राहत हुई।
इस विषय पर ब्रह्मचारी कृष्णदत्त की पुस्तक ‘महाभारत एक दिव्य दृष्टि’ में नाग मंथन विषय विस्तार से लिखा है। इस घटना का सुन्दर चित्रण करते हुए उन्होंने इसे कालीदह नाम से पुकारा है। ‘एक समय पातालपुरी (वर्तमान अमेरिका) में रक्तमयी क्रांति हुई, जिससे वहाँ पर राज्य और समाज पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया। फलस्वरूप पातालपुरी के निवासी धरती के अनेक अन्य स्थानों पर जाकर निवास करने लगे। वहाँ से नाग सम्प्रदाय की बड़ी आबादी भारत में भी आकर बसने लगी। उन्होंने भारत के एक ‘कालीदय’ नामक स्थान पर अपना निवास बना लिया। यह स्थान पर्वतों के मध्य स्थित बताया गया है। वहाँ ये सभी वनवासियों की भांति अपना जीवन यापन करने लगे।’
श्रीकृष्ण जब कुछ बड़े हुए तो अपनी कुशाग्र बौद्धिक बल, वैदिक ज्ञान, वाकचातुर्य और नाग यज्ञ द्वारा उनकी सहायता करने का संकल्प लिया। कृष्ण ने उन्हें धर्म एवं शास्त्रों की जानकारी दी तथा योग एवं अन्य विधाओं की शिक्षा प्रदान की। इससे नाग समुदाय पूरी तरह से कृष्ण के पक्ष में हो गया और उनके अनुसार ही आचरण करने लगा। फलस्वरूप पूरा नाग समुदाय उनके अनुकूल हो गया और ऐसा लगने लगा था जैसे श्रीकृष्ण ने उन्हें स्वयं में धारण कर लिया। इसको नाग समुदाय को नाथने की संज्ञा भी दी गई, जिसे नाग मंथन कहा गया है। यह घटना कालीदह स्थान की है, इसलिए इसे कालीदह नाथन नाम भी कहा गया।
वसुदेव की पहली पत्नी रोहिणी को भी नाग समुदाय का बताया है। इस कारण नाग समुदाय के लोग कृष्ण को अपना देवता (दोहता) भी मानते थे, जिसके कारण वह सब कृष्ण की बातों को महत्व देने लगे। इसी कारण माता देवकी के शेष तथा नाग कन्या रोहिणी के गर्भ से प्रकट हुए दाऊ बलराम को शेषनाग से अवतरित माना गया और उन्हें शेषनाग का अवतार कहा जाने लगा। आजकल अधिकतर लोग नाग को एक सम्प्रदाय की बजाए उसे रेंगने वाला प्राणी सर्प समझते हैं, जो सही नही है।
डॉ. के कृष्ण आर्य

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