डॉ. कृष्ण के आर्य
त्यागभाव से जीते थे श्रीकृष्ण-
श्रीकृष्ण का जीवन बहु-आयामी था। वे जहाँ एक सभ्य एवं उत्सुक शिष्य थे, वहीं आज्ञा पालक पुत्र थे, एक श्रेष्ठ संचालक, उत्कृष्ट भ्राता, एक पत्नीव्रती ब्रह्मचारी, समर्पित मित्र तथा उत्कृष्ट संप्रेषक थे। उनकी मित्रता तो वैसे अनेक समेल तथा बेमेल लोगों के साथ रही होगी, परन्तु सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन तथा सहपाठी सुदामा की मित्रता को अधिक पहचान प्राप्त हुई है। सुदामा एवं श्रीकृष्ण गुरु सांदीपनी आश्रम के सहपाठी थे, वह श्रीकृष्ण की भांति ही वेदों का ज्ञाता, श्रेष्ठ आचरण युक्त और तपस्वी ब्राह्मण था।
गुरुकुल में पढ़ते समय श्रीकृष्ण को जब किसी विषय पर चर्चा करनी होती थी तो वह गुरु के अतिरिक्त सुदामा से ही वार्ता करते थे। वे दोनों वेद विषयों, विज्ञान, आत्मचिन्तन तथा अन्य यौगिक विषयों पर गहन चिन्तन करते थे। श्रीकृष्ण का सुदामा के साथ विचार-विनिमय होता रहता था। उनका आचरण पवित्र था और वह सदैव अध्ययनरत रहते थे।
गुरुकुल में श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता गहरी बनती गई। महर्षि सांदीपनी के आश्रम में प्रातः सांय नियमित अग्निहोत्र होता था। मान्यता है कि एक दिन गुरुमाता ने श्रीकृष्ण और सुदामा को यज्ञ के लिए समिधा एकत्र करने के लिए जंगल में भेज दिया तथा दोनों के खाने के लिए सुदामा की पोटली में चूड़ा (चने) बांध दिए। इस बीच जंगल में ही तेज वर्षा आरम्भ हो गई। तेज बारिश से बचने के लिए उन दोनों को पेड़ पर रात्रि गुजारनी पड़ी। परन्तु भूख लगने पर सुदामा ने वह सारे चने स्वयं ही खा लिए।
सुदामा ने इस घटना का वृत्तान्त गुरुदेव को सुनाया। गुरु सांदीपनी ने इसे भंयकर पापकर्म बताते हुए कहा कि सुदामा तुमने अपने भाग्य में दरिद्रता लिख ली है। कालांतर में श्रीकृष्ण द्वारकाधीश बन गए और सुदामा एक दरिद्र ब्राह्मण रह गया। पत्नी के कहने पर सुदामा अपने मित्र श्रीकृष्ण से भेंट करने द्वारका आ गए। सुदामा की पत्नी ने पड़ोस से मांगकर लाए दो मुठी चावल ले जाने हेतु उनकी पोटली में बांध दिए थे।
श्रीकृष्ण और सुदामा की सामाजिक तौर पर कोई समानता नहीं थी। सुदामा आध्यात्मिक और बौद्धिक चिंतन में श्रीकृष्ण के लगभग तुल्य ही बताए गए हैं। द्वारका में सुदामा के आगमन पर श्रीकृष्ण ने उनका आदर, सम्मान और सेवा सुश्रुषा की। इतना ही नहीं, दो मुठी चावल जो सुदामा लेकर आए थे, उसे खाने लगे। परन्तु रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण से कुछ चावल छोडऩे की प्रार्थना की।
यह घटना एक गहन संदेश भी देती है कि दूसरे के भाग का खाने से व्यक्ति दरिद्रता को आंमन्त्रित करता है। उसी प्रकार रुक्मिणी ने सुदामा द्वारा लाए गए चावलों में से कुछ चावल छोडऩे की प्रार्थना भी एक संदेश है कि कभी भी अकेले ही किसी वस्तु का भक्षण नहीं करना चाहिए अन्यथा वह भी पाप के समान ही होता है। इसके बदले श्रीकृष्ण ने सुदामा को धन-धान्य से परिपूर्ण कर दिया।
श्रीकृष्ण का ऐसा त्यागपूर्ण जीवन सदैव अनुकरणीय रहेगा।


















