डॉ. कृष्ण के आर्य
दयानंद बोध रात्रि- विशेष
'कुल्हिया में हाथी'... एक विचार-जरा सोचिये, सृष्टि संवत --1972949125, कलियुगाब्द---5125, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा- विक्रमी संवत-2081
डॉ. कृष्ण के आर्य
दयानंद बोध रात्रि- विशेष
डॉ. कृष्ण के. ‘आर्य’
नववर्ष पर विशेष
डॉ. कृष्ण के. आर्य
राष्ट्रीय गणित दिवस पर विशेष
गणित भारतीय ऋषियों की अमूल्य धरोहर
गणित एक अद्भूत विषय है, जिसे पढ़े तो कठिन लगता है और समझे तो आसान लगने लगता है। गणित की कठिनता का कोई पैमाना नहीं होता है। यह उस आकाश गंगा की भांति है, जिसमें जितनी गहराई तक चलते जाएंगे उतनी ही नई विशेषताओं को जानने लगते हैं। गणित जहां एक सागर की तरह गहरा है, वहीं महासागर की भांति अथाह है। इसे समझने के लिए यदि गहराई में उतरा जाएगा तो गणित की थाह पाना भी आसान हो जाता है।
गणित, जीवन का एक ऐसा पहलु है, जिसकी हमंे हर मोड़ पर आवश्यकता अनुभव होती है। यह केवल संख्याओं और आकृतियों का खेल नहीं है, बल्कि एक ऐसी भाषा है जो हमें प्रकृति और विज्ञान को समझने में मदद करती है। गणित समस्याओं के समाधान, तार्किक और विश्लेषणात्मक चिंतन विकसित करने में हमारी मदद करता है। यह हमें कठिन समस्याओं का समाधान ढूंढने की क्षमता प्रदान करता है। गणित केवल एकल विषय नहीं है, बल्कि ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी’, भौतिकी, रसायन विज्ञान, इंजीनियरिंग और कंप्यूटर विज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी गणित की भूमिका महत्वपूर्ण है। दैनिक जीवन की समस्याओं का हल, समय प्रबंधन, बाजारवाद और दूरी की गणना इत्यादि सभी गणित के अनुप्रयोग हैं।
गणित के अनेक भाग है, जिन्हें समझकर विभिन्न क्षेत्रों में महारत प्राप्त की जा सकती है। यह केवल जमा-घटा तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन को सहज बनाने का मुख्य क्षेत्र है। इसके मुख्यः तौर पर निम्न श्रेणियों में समझा जा सकता है।
1. अंकगणित- इससे व्यक्ति जोड़, घटाव, गुणा, भाग जैसी मूलभूत क्रियाएं जान सकता है।
2. बीजगणित- यह एक रोचक विधा है। इससे गणित की कठिन पहेलियों, समीकरण, बहुपद और चर-अचर इत्यादि का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
3. ज्यामिति- इसकी सहायता से विद्यार्थी आकृतियों, कोणों का परिमाप और क्षेत्रफल का अध्ययन कर सकता है।
4. त्रिकोणमिति- इसमें त्रिभुजों एवं अन्य आकृतियों के कोणों का माप इत्यादि के मध्य संबंधों का अध्ययन करना आसान होता है।
5. कैलकुलस- इसमें परिस्थितियों के परिवर्तन और उनकी गति का आंकलन करना आसान रहता है।
गणित न केवल एक विषय है, बल्कि एक कौशल है जो हमें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकता है। गणित का करियर के तौर पर उपयोग सदैव लाभप्रद रहता है। वर्तमान दौर में डेटा साइंस, डेटा विश्लेषण, मशीन लर्निंग और एआई जैसी आधुनिक विधाओं में गणित की महत्वपूण भूमिका है अर्थात् गणित के बिना इनकी कल्पना भी नही की जा सकती है। गणित ‘इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर’, सिविल, मकेनिकल तथा इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में एक अहम् टूल के रूप में प्रयोग होता है। इतना ही नही, फिनटेक और एक्ट्यूरी बैंकिंग, निवेश और बीमा क्षेत्र की कल्पना गणित के बिना अधूरी है। इनमें गणितीय कौशल की हमेशा मांग है।
भारत भूमि पर गणितीयः समझ सृष्टि के आदि से रही है। सातवें मन्वतर के ऋषि मनु से लेकर भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण से लेकर आधुनिक गणितज्ञ इस विद्या को भली प्रकार से जानते थे। लगभग नौ लाख वर्ष पहले श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास काल की अवधि और उसकी सटीक गणना, पांडवों 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष अज्ञातकाल का आंकलन तथा वर्ष के सूर्य और चंद्रमास की जानकारी इस बात की द्यौतक है।
परन्तु महाभारत काल के पश्चात भी भारत भूमि पर अनेक गणितज्ञों ने समाज निर्माण में अपना योगदान दिया है। मगध की धरती पर लगभग 250 वर्ष ईसा पूर्व आचार्य चाणक्य ने एक महान ग्रन्थ ‘कोटिलीय अर्थशास्त्र’ की रचना कर हमारे महान गणितज्ञ होने का प्रमाण दिया है। आचार्य आर्यभट्ट, वराहमीहिर, ब्रह्मगुप्त, भास्करार्चाय तथा लीलावती जैसे गणितज्ञों ने गणित को विशेष पहचान दिलाई है। इतना ही नही, आधुनिक भारत के श्रीनिवास रामानुजन का नाम गणित के क्षेत्र में दुनिया को आश्चर्यचकित करने वाले महान गणितज्ञ के रूप में लिया जाता है। भारत में उन्हीं के जन्म दिन 22 दिसम्बर को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है।
महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को मैथ्स का जादूगर कहा जाता है। आज उनकी 138वीं जयंती है। उनका जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु में हुआ था। हर साल उनकी जयंती पर नेशनल मैथमेटिक्स डे होता है। 33 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था। अपनी छोटी से उम्र में उन्होंने दुनिया को 3900 से ज्यादा गणितीय सूत्र, प्रमेय और अनंत श्रृंखलाएं दीं, जिनमें π (पाई) के जरिए गणना सटीक और तेज हुई। वैज्ञानिक आज भी उनके अनेक प्रमेयों का हल निकालने में लगे हुए हैं। मान्यता है कि 12 साल की उम्र में गणित के प्रति उनकी दीवानगी इतनी थी कि वे त्रिकोणमिती में महारत हासिल कर चुके थे।
वर्तमान में जीवन हर क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। श्रीनिवास रामानुजन का आज के एआई साइंस में महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है। न्यूरल नेटवर्क्स और मशीन लर्निंग की नींव रामानुजन के उन गणितय सूत्रों पर टिकी है, जिसकी वजह से सुपरकंप्यूटर, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी और एल्गोरिदम डिजाइन संभव हुआ।
अतः आज राष्ट्रीय गणित दिवस पर हमें बच्चों में गणित के प्रति लगाव और उसे समझने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
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हरियाणा राजभवन का नाम अब होगा लोकभवन हरियाणा
कृष्ण उवाचः हरियाणा में राजभवन का नाम बदलकर अब लोकभवन हरियाणा कर दिया है। ऐसा करने वाला हरियाणा देश का 10वां राज्य बन गया है। इस संबंध में जारी अधिसूचना 1 दिसंबर 2025 से लागू हो गई है।
हरियाणा के राज्यपाल प्रो0 असीम कुमार घोष के आदेश पर राज्यपाल के सचिव श्री दुष्मंता कुमार बेहरा आईएएस द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार यह निर्णय भारत सरकार के एक पत्रांक के आधार पर लिया गया है। अतः सभी आधिकारिक उद्देश्यों के लिए राजभवन हरियाणा का नाम अब लोकभवन हरियाणा कर दिया गया है।
उवाच-1
गीता जयंती विशेष डॉ. कृष्ण के आर्य
विराट रूप ही भगवान श्रीकृष्ण का योगेश्वर स्वरूप
‘मार्गशीर्ष की अमावस्या को दिया था गीता उपदेश’
Jagat Kranti वैश्विक जनमानस की जीवनधारा को प्रभावित करने में गीता की अह्म भूमिका है। यह एक ऐसा सार्वभौमिक ग्रन्थ है, जिसकी व्यवहारिकता चिरकाल तक बनी रहेगी। कुरुक्षेत्र की धरा पर हुआ परस्पर संवाद कितना गहन था, इसका अनुमान अर्जुन की शंकाओं पर श्रीकृष्ण द्वारा की गई व्याख्या से ही स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसी संवाद को गीता कहा गया है। अर्जुन का मोहपाश कितना मोहित करने वाला था, उसे सहज ही जाना तो जा सकता है। परन्तु उसे समझने से जीवन के लक्ष्य बदल जाते हैं।अर्जुन का वह एक प्रश्न, जिसे श्रीकृष्ण को अढ़ाई घड़ी का उपदेश देने के लिए विवश कर दिया, वह क्या था ? अर्जुन ने कहा कि
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।।
रणभूमि में युद्ध की इच्छा से खड़े बन्धु-बांधवों को देखकर मेरे अंग शिथिल हो गए हैं। मुख सूखा जा रहा है और मेरे शरीर में कम्पन पैदा होने लगी है। हे वासुदेव! मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष खिसका जा रहा है, त्वचा जल रही है, मन भ्रमित हो रहा है और मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ अनुभव कर रहा हूँ। हे मधुसूदन! पृथ्वी का राज्य तो क्या है, मैं तीनों लोकों के राज्य के लिए भी इन्हें मारना नहीं चाहता हूँ।
ऐसी स्थिति का निर्माण कब हुआ अर्थात् वह कौन सा दिन था जब अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के मध्य इस विषय पर वार्तालाप हुई। वही दिवस गीता जयंती का दिन था। उसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान का संदेश दिया। महाभारत युद्ध की यह अनूठी घटना थी, परन्तु इसके लिए परिस्थितियां कब, क्यों और कैसे बनी। इसे जानने की अभिलाषा सभी के मन में उठ रही होंगी।
शांति से युद्ध की ओर-
हस्तिनापुर के दूत संजय ने विराटनगर पहुंच कर पांडवों को महाराज धृतराष्ट्र का संदेश सुनाते हुए कहा कि आप जहाँ भी हो वहीं स्वस्थ रहो। उन्होंने कहा कि अपने सगे-सम्बन्धियों को मारने से तो भीख मांग कर जीवित रहना अच्छा है। इस घटना के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण ने पांडव सभा में कहा कि मैं कृष्ण, दोनों पक्षों के कल्याण के लिए कौरव सभा में जाऊँगा और एक शान्तिदूत बन कर शान्ति वार्ता करूँगा। हालांकि संजय की बात सुनकर मैं कौरवों के व्यवहार के विषय में जान चुका हूँ, फिर भी मैं हस्तिनापुर जाकर कौरवों की सभा में दुर्याेधन के अच्छा और बुरा होने के सभी संशय दूर कर दूँगा। वहाँ पहुँच कर मैं तनिक भी त्रुटि किए बिना समस्त कौरवों और पांडवों के कल्याण और सन्धि स्थापना का प्रयास करूँगा।
राजसभा में पहुंचने पर भीष्म, द्रोण तथा महाराज धृतराष्ट्र सहित अन्य महानुभावों ने अपने आसनों से खड़े होकर श्रीकृष्ण का स्वागत किया। वहाँ विराजमान अनेक देशों के राजाओं ने भी श्रीकृष्ण का अभिवादन किया और उन्हें टकटकी लगाकर निहारने लगे। सभा में सन्नाटा छा गया और सभी श्रीकृष्ण के बोलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसके पश्चात् दुन्दुभि के समान गम्भीर स्वभाव वाले श्रीकृष्ण ने बोलना आरम्भ किया। उन्होंने अपने वक्तव्य की शुरूआत ठीक उसी प्रकार से की जैसे कोई वरिष्ठ व्यक्ति किसी कार्य के लिए बच्चों को मनाता है।
श्रीकृष्ण ने महाराज धृतराष्ट्र की प्रशंसा करते हुए कहा कि कालातीत से समस्त राजाओं में कुरुवंश श्रेष्ठ रहा है। यहाँ शास्त्र और सदाचार का पालन किया जाता रहा है। यहाँ कृपा, अनुकम्पा, करुणा, विनम्रता, सरलता, क्षमा और सत्य आदि के जो गुण रहे हैं, वह अन्य राजाओं में नहीं रहे। हे राजन्! ऐसे उत्तम गुणयुक्त एवं प्रतिष्ठित कुल में उत्पन्न होकर भी आपके कारण हुए किसी अनुचित कार्य को कैसे उचित कहा जा सकता है।
श्रीकृष्ण ने अपने विस्तृत वक्तव्य के दौरान कहा कि जहाँ अधर्म से धर्म और असत्य से सत्य का हनन होता है, वह सभा नष्ट हो जाती है। पांडव धर्म के मार्ग पर चलकर अपना राज्य लौटाने का अनुरोध कर रहे हैं। इसलिए अपने अनुज पुत्रों को पैतृक भाग देकर उनका मनोरथ पूर्ण करें। राजन् ! इससे पांडवों और कौरवों दोनों का समान रूप से कल्याण होगा। इस तरह से श्रीकृष्ण ने उन्हें युद्ध की भयावह स्थिति का भी आभास करवाया। परन्तु दुर्योधन द्वारा संधि प्रस्ताव न मानने पर भगवान श्रीकृष्ण विरक्त हो गए सभा से बाहर आ गए और न चाहते हुए भी शांति प्रस्ताव से युद्ध की स्थिति बन गई।
गीता उपदेश स्थल-
Dainik Tribune युद्ध के लिए दोनों सेनाएं कुरुक्षेत्र की धरा पर एकत्र होने लगी। युद्धभूमि के पश्चिम की तरफ मुहं करके पूर्व दिशा में कौरव सेना खड़ी हो गई और पूर्व में मुख करके पश्चिम दिशा में पांडव सेना युद्ध के लिए डट गई। इस विषय पर उद्योगपर्व में दिया है कि
पञ्चयोजनमुत्सृज्य मंडलम् तद्रणाजिरम्।
सेनानिवेशास्ते राजन्ना विशञ्छतसंघशः।।
अर्थात् युद्ध के लिए दोनों सेनाओं के शिविरों के मध्य पांच योजन (लगभग 64 वर्ग किलोमीटर) का घेरा छोड़कर सौ-सौ की संख्या वाली श्रेणीबद्ध छावनियां डाल दी गईं। युद्धभूमि में प्रवेश के लिए चार द्वार बनाए गए और प्रत्येक द्वार पर एक-एक यक्ष को द्वारपाल रखा गया।
सम्भवतः उस समय यह स्थान दोनों सेनाओं के मध्य और एक किनारे पर रहा होगा। इस स्थान पर अर्जुन और श्रीकृष्ण के मध्य हुई वार्त्ता को ही गीता उपदेश कहा गया है। मैंने अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ में इसे ज्ञानगीत की संज्ञा दी हैं। वर्तमान में वह स्थान ज्योतिसर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है, जो कुरुक्षेत्र बस अड्डा से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
गीता उपदेश तिथि-
कौरव सभा में हुई ख़ीचतान के उपरान्त भगवान श्रीकृष्ण और कर्ण की एकान्त में भेंट हुई। श्रीकृष्ण ने कर्ण के सामने प्रस्ताव रखा कि पांडव उसके भाई है। अतः वह पांडवों की ओर से युद्ध करें परन्तु कर्ण ने इसे ठुकरा दिया। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा कि हे कर्ण ! मेरा प्रस्ताव तुम्हें स्वीकार नहीं है और तुम मेरे द्वारा प्रदत्त पृथ्वी का राज्य भी ग्रहण नहीं करना चाहते हो। इसलिए तुम आचार्य द्रोण, पितामह भीष्म और कृपाचार्य से जा कर कहना कि इस समय सौम्य मार्गशीर्ष मास चल रहा है। इसमें जलाने की लकड़ियां और घास सुगमता से प्राप्त हो जाती है। सभी प्रकार की औषधियां एवं फल-फूल से समृद्धि होती है। धान के खेतों में खूब फल लगे हैं, मक्खियां भी कम है और कीचड़ का भी नाम नहीं है। इस सुखद मास में न अधिक गर्मी है और न ही अधिक सर्दी है।
इस पर महाभारत के उद्योगपर्व के अध्याय 29, श्लोक 33 में कहा है कि
सप्तमाच्चापि दिवसादमावास्या भविष्यति।
संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम्।।
अर्थात् आज से सातवें दिन अमावस्या होगी, उसके देवता इन्द्र कहे गए हैं। उसी में युद्ध आरम्भ किया जाएगा। इसका अर्थ हुआ कि मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को श्रीकृष्ण हस्तिनापुर राजसभा में शान्तिदूत बन कर गए थे। परन्तु मौसलपर्व के अनुसार युद्ध वाले महीने में त्रयोदशी को अमावस्या थी। इस तरह श्रीकृष्ण ने कौरवों के सम्मुख कृष्ण पक्ष की सप्तमी को शान्ति प्रस्ताव रखा था।
अतः मार्गशीर्ष की अमावस्या को ही कुरुक्षेत्र भूमि पर महायुद्ध आरम्भ हुआ था और मूलतः उसी दिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता उपदेश दिया था। इस वर्ष गीता जयंती अमावस्या 20 नवम्बर 2025 को है। इसी अमावस्या को सही मानना चाहिए। परन्तु अनेक जानकार गीता जयंती को मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी को मानते हैं, इसलिए इसे मोक्षदा एकादशी भी कहा गया है। यह इस वर्ष एक दिसम्बर 2025 को होगी
गीता उपदेश-
Arth Prakash मार्गशीर्ष की अमावस्या के उस दिन सूर्योदय के समय अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण रथ को दोनों सेनाओं के मध्य स्थान पर ले गए। वहां पर अर्जुन के विचलित होने की स्थिति, प्रश्न तथा उनके मोहपाश की स्थिति बड़ी दयनीय थी।
अर्जुन की ‘किमकर्त्तव्य विमूढम्’ की स्थिति को भांपते हुए अर्जुन के उपरोक्त एक प्रश्न पर भगवान श्रीकृष्ण ने तीन तरफ से वार किया। श्रीकृष्ण ने त्रिविद्या के ज्ञान, कर्म और उपासना के गूढ़ रहस्य को समझाते हुए कर्म की महत्ता पर बल दिया। उन्होंने अर्जुन को ज्ञानयोग, कर्मयोग तथा भक्तियोग की धारा में प्रवाहित करते हुए कर्त्तव्य पालन का उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि इस संसार में कर्म को करने और कर्त्तव्य के पालन से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नही है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि
न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नान वाप्तम वाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! तीनों लोकों में मेरे लिए न तो कोई कर्त्तव्य कर्म करना शेष है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु मुझे अप्राप्य है, न मुझे किसी वस्तु का अभाव है और न ही प्राप्त करने की इच्छा है, फिर भी मैं निरंतर कर्म में लगा रहता हूँ। पार्थ ! ज्ञानी मनुष्य अनासक्त भाव से लोक-संग्रह के लिए कर्म करते हैं और वह तुम्हें भी करने चाहिए।
गीता का यह रहस्य वर्तमान में प्राप्त श्रीमद्भागवत के 18 अध्यायों में दिए 700 श्लोकों में सम्मिलित है। परन्तु महाभारत में गीता उपदेश को मात्र 70 श्लोकों में दिया हुआ है, जिसे मैंने अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ में वर्णित करने का प्रयास किया है। श्रीकृष्ण और अर्जुन का यह वार्तालाप मात्र अढ़ाई घड़ी अर्थात् लगभग एक घंटे का हुआ था। श्रीकृष्ण और अर्जुन के परस्पर इसी संवाद को गीता उपदेश कहा गया है।
विराटरूप-
गीता उपदेश के दौरान योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्त्तव्यवादी बनने और उनके संस्कारों को चित्त पर नहीं पड़ने देने का सूत्र दिया। उनके ज्ञान, कर्म और उपासना के संदेश के पश्चात् भी जब श्रीकृष्ण को लगा कि अर्जुन अभी संशय में घिरा है, तब उन्होंने योग का सहारा लिया और युद्धभूमि में ही समाधिस्थ हो गए। ब्रह्मचारी कृष्णदत्त के अनुसार श्रीकृष्ण ने अर्जुन की आत्मा को अपनी आत्मिक शक्ति के साथ संयोग करवाया। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन की आत्मा से मेल करते हुए प्राण की गति के रेचक को कुम्भक में परिणत कर दिया। उन्होंने अपने सभी दस प्राणों को मन से मिलाप कर परमात्मा के साथ एक सूत्र में पिरो दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण की आत्मा का अर्जुन की आत्मा से मिलन हुआ और आत्मा जागृत होने लगी।
इससे अर्जुन की अन्तरात्मा अति हर्ष से भर गई और उन्हें दिव्य दृश्य दिखाई देने लगे। अर्जुन को जैसे ब्रह्मांड में अग्नि प्रदीप्त हो रही है, समुद्र स्थिर हो गया, वायु की गति का आभास होने लगा तथा जल तेज प्रवाह में चलता दिखाई दे रहा था। प्रकृति का चक्र भौतिक पिण्डों में गति कर रहा था। ईश्वर के आंगन में जीवन की गति का चक्र चलता दिखाई देने लगा था। इसमें कोई मृत्यु को प्राप्त हो रहा था तो कोई जन्म ले रहा था। इस प्रकार दोनों सेनाएं मृत्यु के आंगन में विराजमान दिखाई दे रही थीं। श्रीकृष्ण का यह आत्मिक मेल और भावों का अनूठा संचार था। इससे अर्जुन की बुद्धि निर्मलता को प्राप्त हो गई और वह ईश्वर के यर्थाथ स्वरूप के दर्शन कर पाये।यही विराटरूप भगवान श्रीकृष्ण का योगेश्वर स्वरूप कहलाया था, जो मात्र योग की उत्कृष्ठता से ही सम्भव हुआ।
अतः श्रीकृष्ण और उनके संदेश की व्यवहारिकता को समझने के लिए केवल योग ही एकमात्र साधन है। व्यक्ति, योग को अपनाकर ही गीता के रहस्यों को जानने में सक्षम हो सकता है। यही गीता का मूल रूप है, जिससे मानव स्वयं और समाज का उत्थान करने में समर्थ होगा।
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राधे-राधे
राधे, राधे, राधे, तू ओ३म् भूर् गा ले,
ओ३म् भूर् गाले तू, भूव स्वः गा ले,
राधे, राधे, राधे, तू ओ३म् भूर् गा ले,
ओ३म् भूर् गाले तू, कष्ट मिटा ले,
कष्ट मिटा ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...
सुख दिला तत्, सवितुर गा ले,
सूरज की भांति, जीवन उज्जवल बना ले,
वर योग्य ईश्वर, तू वरेण्यं गा ले,
भर्गाे से कर्मों को, शुद्ध बना ले,
शुद्ध बना ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...
भर्गाे है वह, तू उद्धार करा ले,
देवस्य वह प्रभु, तू दिव्यता अपना ले,
धीमहि संग उससे, चिंतन लगा ले,
धियो के साथ तू, बुद्धि उत्तम पा ले,
बात ये मान ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...
‘यो’ है जो, ये मेरी बात मान ले,
नः है हमारी, तू प्रचोदयात् सुना ले,
ईश स्तुति से तू, बुद्धि बल पा ले,
राधे राधे तू, ये सबको सुना ले,
सबको सुना दे तू, ‘केके’ को सुना दे, राधे, राधे, राधे...
डॉ. के. कृष्ण आर्य
सांझी विशेष- हरियाणा की सांझी का ही प्रतिरूप है माता दूर्गा पूजा
भारत भूमि को देवभूमि कहा गया है। यहाँ समय-समय पर दैवी आत्माओं का प्रकटीकरण होता रहा है। उन्होंने विश्व में सुख, शांति और समृद्धि के विस्तारिकरण के लिए अनेक मर्यादाओं की स्थापना की, इन्हीं मर्यादाओं के समुचित पालन की नियमावली को ही त्यौहार की संज्ञा दी है। इन त्यौहारों को वर्षभर मनाने से न केवल लोगों का जीवन रसमय बनता है बल्कि देवी-देवताओं के आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। इससे घरों में खुशियांे का आगाज होता है तथा बन्धुत्व की भावना को बल मिलता है। ऐसे ही श्रृंखलाबद्ध रूप में माता के नौ रूपों को नौ दिनों तक मनाना ही नवरात्र कहा गया है। इन्हीं नवरात्रों को माता दूर्गा के नव-दिवस भी कहते हैं। नवरात्रों के दौरान हरियाणा में सांझी माता की पूजा की जाती रही है, जिसका बृह्द रूप ही माता दूर्गा पूजा है।
विश्व में आश्विन एवं शारदीय नवरात्र के दौरान दूर्गा पूजा की धूम होती है। बडे़-बडे़ पांड़ाल लगाए जाते हैं, जिनमें माता दूर्गा की विशालकाय मूर्ति स्थापित की जाती है। पांड़ालों को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है, जिससे उसकी अद्भूत छटा दिखाई देती है। इन पांड़ालों में सूर्यास्त के उपरान्त बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता दूर्गा की पूर्जा करते हैं। इतना ही नही, अपनी खुशी की अभिव्यक्ति करने के लिए उन्हें गायन एवं नृत्य से धूम मचाते भी देखा जा सकता हैं।
दूर्गा पूजा को मनाने की परंपरा कब से आरम्भ हुई, इसका सही आंकलन तो नही किया जा सकता है। मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में अविभाजित भारत का बंगाल तथा वर्तमान बांग्ला देश के ताहिरपुर के राजा कंसनारायण ने अश्वमेध यज्ञ करने की इच्छा प्रकट की। परन्तु कलियुग होने के कारण पूरोहितों ने उन्हें अश्वमेध यज्ञ के स्थान पर माता दूर्गा की पूजा करने की सलाह दी। इसके पश्चात बंगाल के बड़े जमींदारों द्वारा दूर्गा पूजा की शुरूआत हुई। आजकल विदेशों से लेकर भारत के बड़े नगरों, कस्बों तथा गांवों तक दूर्गा पूजा के मंडप सजाए जाते हैं। उनमें गरबा एवं डांडियां नृत्य की झंकार सुनाई देती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महिषासुर नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था। उसने देवताओं (श्रेष्ठ लोगों) को बन्दी बनाया और उन पर अत्याचार करने लगा। मुसिबत में फंसे देवताओं ने उससे छुटकारा पाने के लिए दुर्गा माता से प्रार्थना दी। देवताओं की प्रार्थना पर माता दुर्गा ने ‘अष्टभुज’ रूप धारण कर शेर पर सवार होकर महिषासुर का अन्त कर दिया। उसी समय से लोग इन दिनों को दुर्गा दिवसों अर्थात नवरात्रों के रूप में मनाते हैं। इसलिए दूर्गा पूजा भी बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में ही मनाया जाता है।
हरियाणा राज्य में माता दूर्गा पूजा की परंपरा अति प्राचीन है, जिसको सांझी माता कहा जाता रहा है। माना जाता है कि 15वीं शताब्दी में वैष्णव मंदिरों में सांझी की पूजा आरम्भ की गई थी। हरियाणा के गांवों में सांझी पूजा सदियों से चली आ रही है। अतः प्रदेश में सांझी माता की पूजा का इतिहास आज मनाए जाने वाले दूर्गा महोत्सव से प्राचीन नजर आ रहा है। सांझी की पूजा पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान सहित उत्तर भारत में धूमधाम से की जाती है।
सांझी, शब्द सांझ से बना है। सांझ का अर्थ सांय अर्थात गोधूली का समय। माता दूर्गा की पूजा सांझ के समय की जाती है, इसलिए इसे सांझी कहा गया है। आज भी गांवों में लोग दिवार पर सांझी माई की मूर्ति उकेरते है। गाय के गोबर, मिट्टी की टिकड़ियों को रंगीन करके दिवारों पर चिपकाते हैं और इसे माता दूर्गा का रूप देते हैं। इसके अगल-बगल में चांद और सूरज बनाए जाते हैं। उसके मुहं पर कपड़ा लगाया जाता और सांझ के समय सांझी की आरती की जाती है। कुवांरी लड़कियां अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए नवरात्रों में सांझी की आरती इस प्रकार करती हैं।
आरता ऐ आरता, सांझी माई आरता,
क्यांहे का तेरा दीवा, क्यांहे की तेरी बाती,
चांदी का दीवा, सोने की बाती,
जाग सांझी जाग ऐ, तेरे माथा लाग्या भाग ऐ...
नवरात्रों के दौरान ही नौ दिनों तक सांझी माई की पूजा की जाती है। घर की लड़कियां तथा महिलाएं इस प्रकार के अनेक लोक गीतों से मां की आराधना करती हैं तथा उनसे मन चाहे आशीर्वाद मांगती हैं। माता का आरता के लिए घी का दीपक जलाया जाता है और माता को हलवा या अन्य मिष्ठ पदार्थों का भोग लगाया जाता है। उसके पश्चात नवरात्रों के व्रती अपना उपवास खोलने के लिए भोजन करते हैं।
नवरात्रों में भोजना का भी विशेष महत्व है। सांझी माई के नौ दिनों तक फलाहार किया जाता है। सुबह से शहद और नींबू पानी, दूध या छाछ का सेवन किया जाता है तथा दोपहर को केला, सेब या पपीता इत्यादि फलों को खाद्य रूप में लिया जाता हैं। सांझी का आरता करने के बाद रात्रि में शामक, आलु का हलवा या साबुदाने की खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। इस प्रकार के आहार लेने के पीछे शरीर शौधन का ही कारण माना जाता है।
हमारे शास्त्रों में कहा है कि
‘आहार शुद्धो, सत्व शुद्धि, सत्व शुद्धि, ध्रुवा स्मृति’
अर्थात हमारे आहार के शुद्ध होने से बुद्धि तथा बुद्धि के पवित्र होने से हमारी स्मरण शक्ति का विकास होता है। नवरात्रों के दौरान अल्पाहार करने से शरीर की बीमारियों का भी शमन होता है। अतः नवरात्रों का न केवल धार्मिक महत्व है बल्कि वैज्ञानिक महत्व भी है।
हरियाणा की सांझी माई को नौ दिनों तक पूजा जाता है तथा दशहरे के दिन माई को तालाब या जोहड़ में इस प्रार्थना के साथ विसर्जित किया जाता है कि ‘माई तूं अगले साल फेर आईये और हमारे घरों मंे खुशियां लाईये’।
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डॉ. के कृष्ण आर्य
मित्रता की डोर
दिल से दिल को बांधे रखती,
और परेशानी को करती आसान,
जो एक दूसरे पर जमाए जोर,
वह है केवल मित्रता की डोर।
बिना खून के संबंध बने,
भावना संग दूसरे से जुड़े,
जाति बंधन दे जो तोड़,
वह केवल मित्रता की डोर।
रहे साथ खड़ा मुश्किल में,
न फूला समाए खुशी में,
जो भावों का है मजबूत जोड़,
वह है केवल मित्रता की डोर।
वह वसंत ऋतु की खुशबु,
बहे रंग हरा, सरसों की सुगंध,
जब वह पहुँचाए उनकी डगर,
है जो केवल मित्रता की डोर।
एक जमाना श्रीराम का भाई,
निषाद संग मित्रता निभाई,
नहीं बड़ा छोटा था किसी ओर,
ऐसी होती है मित्रता की डोर।
श्याम के महल सुदामा आए,
खुशी के आंसु से वह नहलाए,
ऐसी दोस्ती न देखी कोई और,
दे सम्मान बढ़ाए मित्रता की डोर।
आज जमाना बस ‘केके’ ऐसा,
अपनी खुशी में जग खुश जैसा,
स्वार्थ सिद्धि पर भागे कहीं ओर,
फिर कौन उड़ाए मित्रता की डोर।
पुस्तक विवरण
कर्मयोगी कृष्णः
यह पुस्तक भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित एक अनुसंधानात्मक जीवन चरित्र है। इसमें उनकी 60 पीढ़ी पहले से लेकर दो पीढ़ी बाद की वंशावली दी है। पुस्तक में उनके प्रारम्भिक जीवन की घटनाएं, उनकी शिक्षा, दिनचर्या, द्वारका तथा मूल गीत का विशेष तौर पर वर्णन किया गया है। इसका विमोचन हरियाणा के माननीय मुख्यमंत्री द्वारा 4 नवम्बर 2024 को किया गया था।
युवा पीढ़ी के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शक बनेगी और उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के वास्तविक जीवन के दर्शन करवाएगी। यह पुस्तक Google Play Books पर प्रकाशित है। इसका लिंक फोटो सहित ब्लॉग पर https://play.google.com/store/books/details?id=2-5-EQAAQBAJ भी दिया है।
धन्यवाद।
जीवन गीतः यह पुस्तक काव्य पर आधारित है, जिसका शीघ्र प्रकाशन होने जा रहा है।
डॉ. के कृष्ण आर्य
चंडीगढ़।
भगवान श्रीकृष्ण की महानता का बखान करना सहज नहीं है। उनके जीवन में गोपियांे का महत्ता प्रकाश रहा है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण सदैव गोपियों में रमण करते थे तथा नित्य उन्हीं के चिंतन में लगे रहते थे। इतना ही नही, वह गोपियों के वस्त्र चुराने, रासलीला करने तथा अपना अधिकतर समय उन्हीं के साथ व्यतीत करते रहते थे। परन्तु श्रीकृष्ण का जीवन इतना उत्कृष्ट था कि आमजन द्वारा उन्हें समझना तो दूर, पढ़ना भी आसान नहीं है।
श्रीकृष्ण जन्मजन्मातरों के ऋषि रहे। सत्य सनातन वैदिक साहित्य में उनके विषय में बड़ा गहरा चिंतन दिया है। यहां गोपियों का सूक्ष्म अर्थ बड़ा गहन और स्मरणीय दिया है। गो का अर्थ गाय तथा हमारी इन्द्रियां दोनों होता है। अपनी इंद्रियों के स्वभाव को समझने, परखने और यथानुकूल सात्विक आचरण करने वाले स्त्री-पुरुष को गोपी या गोप कहा गया है। श्रीकृष्ण भी ऐसे ही एक गोप थे, जो अपनी इंद्रियों को वासना रहित बनाने में लीन रहते थे। अतः इंद्रियों के आचरण को शुद्ध करने में प्रयासरत रहने के कारण ही उन्हें गोपिका रमण भी कहा गया, इसे ऐसे ही समझना चाहिए।
सोलह हजार गोपियों का सत्य-
पुराणों में श्रीकृष्ण की सोलह हजार गोपियां बताई गई है और वह सदैव उन्हीं में रमण करते रहते थे। इस संबंध में गर्ग मुनि महाराज ने सुन्दर व्याख्या करते हुए गर्ग संहिता में वेद की ऋचाओं को भी गोपियां कहा हैं। वेद के मंत्रों को ऋचाएं कहते हैं। ब्रह्मचारी कृष्णदत्त की पुस्तकों में भी ऐसा ही स्वीकार किया है। अतः वेद की ऋचाओं अर्थात् वेद के गोपनीय मंत्र ही गोपियां है।
महर्षि ब्रह्मा से लेकर जैमिनी और ऋषि दयानन्द पर्यन्त सभी ने चार वेद स्वीकार किए हैं। इनमें सृष्टि का सम्पूर्ण ज्ञान समाहित है। इन चार वेदों में सम्मिलित ऋग्वेद में ज्ञान, यजुर्वेद में कर्म, सामवेद में उपासना तथा अथर्ववेद में विज्ञान विषय निहित है, जिनमें कुल 20,346 मंत्र हैं। इनमें से भगवान श्रीकृष्ण को सोलह हजार से अधिक वेदमंत्र कंठस्थ थे। इतना ही नहीं श्रीकृष्ण इन्हीं वेदमंत्रों के अर्थों को समझने एवं उनमें छुपे रहस्यों पर नित्य अनुसंधान करते और यथानुकूल आचरण करते थे। श्रीकृष्ण इन्हीं वेदमंत्र रूपी गोपियों में सदैव रमण करते थे।
इस कार्य में वह इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें कभी खाने-पीने तक का भी आभास नहीं रहता था। ब्रह्मचारी कृष्णदत्त की पुस्तक ‘महाभारत एक दिव्य दृष्टि’ के अनुसार ‘श्रीकृष्ण को सोलह हजार आठ वेद की ऋचाएं कण्ठस्थ थी।’ इसका उल्लेख मैंने अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ में भी किया है। श्रीकृष्ण ने अपने जीवन का अधिकतम समय इन्हीं वेद की ऋचाओं अर्थात् गोपियों के साथ व्यतीत किया। परन्तु आधुनिक काल में इसे भगवान श्रीकृष्ण की 16108 गोपियां (रानियां) बना दिया है, जोकि अर्थों का अनर्थ ही समझना चाहिए।
राधा रमण-
लोकाचार में यह प्रचलित है कि श्रीकृष्ण की 16108 गोपियां थी। श्रीकृष्ण उनमें राधा से विशेष प्रेम रखते थे और वह सदैव राधा के साथ एकान्तवास में रमण रहते थे। यह स्थूल वाक्य है परन्तु यदि इसका सही अर्थ समझे तो इसमें भी श्रीकृष्ण की महानता का ही चित्रण होता है। परन्तु तथाकथित विद्वानों ने इसे भिन्न शरीरों से जोडक़र भगवान श्रीकृष्ण को बदनाम करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। इससे समाज में अनेक भ्रांतियों ने जन्म ले लिया और अंतरिक्ष को दूषित किया। अतः लोकाचार में राधा को कहीं कृष्ण की सखी, माता, पुत्री या मामी दिखाया गया है, जिसे कपोल-कल्पित समझना चाहिए।
ऋग्वेद के भाग-1, मंडल-1, मंत्र 2 में राधस शब्द का प्रयोग हुआ है। इसका अर्थ समस्त सुखों एवं वैभव का प्रतीक बताया है। ऋग्वेद (2/3,4,5) के मंत्रों में सुराधा शब्द श्रेष्ठ धनों के रूप में प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेद के ही एक मंत्र में राधा एवं आराधना शब्द को शोध कार्यों के लिए प्रयोग किया गया है। वस्तुतः सनातन वैदिक साहित्य में राधा शब्द संसार, ऐश्वर्य एवं श्री इत्यादि को धारण करने के लिए प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद (1,22,7) के एक मंत्र में कहा है।
विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः। सवितारं नृचक्षसम्।
यहाँ गोपियां हमारी इन्द्रियों तथा राधा आत्मा को कहा गया है। इसका काव्यांश अर्थ है कि ‘वह सब के हृदय में विराजमान, सर्वज्ञाता, सर्वद्रष्ट्रा जो राधा को गोपियों (इंद्रियां) से निकालकर ले गए’, वह ईश्वर हमारी रक्षा करें। अतः वह इन्द्रिय दोषों से हमारी आत्मा (राधा) की रक्षा करने वाला ईश्वर ही है।
अर्थात् श्रीकृष्ण अपनी आत्मा रूपी राधा को गोपियां अर्थात् इन्द्रिय दोषों से निकाल कर एकांत में रमण करते थे। इसका अर्थ हुआ कि श्रीकृष्ण योग में इतने लीन रहते थे कि वह अपनी राधाई आत्मा को गोपीय (इंद्रिय) दोषों से दूर रखते थे। अतः श्रीकृष्ण की आत्मा सदैव एक द्रष्ट्रा की भूमिका में रहती थी। उनका स्वयं पर इतना नियंत्रण होता था कि वे अपनी पांचों ज्ञान इंद्रियों को किसी दोष की ओर आकर्षित नहीं होने देते थे। इतना ही नहीं, वह अपनी आंतरिक प्रेरणा से इंद्रिय दोषों के संस्कारों को आत्मा और चित्त पर भी नहीं पड़ने देते थे। इसके लिए श्रीकृष्ण सदैव चिन्तन, मनन और निदिध्यासन में रत रहते थे। इसलिए ही महर्षि दयानन्द सरस्वती ने श्रीकृष्ण को जीवन में कभी कोई अधर्म कार्य नहीं करने का प्रमाणपत्र दिया है। ब्रह्मचारी कृष्णदत्त ने भी उन्हें आप्त पुरुष स्वीकार किया है। अतः राधा का पर्याय आत्मा और गोपिकाओं का दस इंद्रियां एवं उनकी वासनाओं को समझना चाहिए।
कैसे शुद्ध होगा ब्रह्मांड-
जब ब्रह्मांड की किसी भी धरा पर ईश्वरीय व्यवस्थाओं का लोप होता है तो उससे उत्पन्न नकारात्मक प्रभाव से अन्तरिक्ष दूषित होने लगता है। इससे जीवों को उत्तम वृष्टि, सद्भावनाओं से युक्त विचारधारा तथा खाद्य पदार्थों की कमी होने लगती है तथा व्यवस्थाएं चरमरा जाती हैं। ब्रह्मचारी कृष्णदत्त के अनुसार ‘सुक्ष्म शरीर से अन्तरिक्ष में रमण करने वाली आत्माओं को देवता कहते हैं’। अर्थात वे आत्माएं अपने सूक्ष्म शरीर के माध्यम से सृष्टि पर दृष्टिपात करती हुई स्वछंद रूप से गमन करती हैं।
ऐसी स्थिति में मुमुक्षु (मोक्ष के निकट) एवं सृष्टिद्रष्टा आत्माएं ईश्वर की प्रेरणा और व्यवस्था से धरा पर जन्म लेने का संकल्प लेती हैं ताकि व्यवस्थाओं में सुधार कर समाज में धर्म का पुनरुत्थान हो सके। इसी से ब्रह्मांड का शौधन होता है। इस तथ्य को स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता संदेश में अर्जुन के सामने प्रकट करते हुए भी कहा कि...
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे
अर्थात् संसार में जब-जब धर्म की हानि होती है, अत्याचार और अनाचार बढ़ता है तो उन (कृष्ण) जैसी आत्माएं संसार में पदार्पण करती हैं और लोगों को धर्म अर्थात् कर्त्तव्यपथ पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। इतना ही नहीं, ईश्वरीय व्यवस्थाओं की स्थापना के लिए ऐसी दिव्य आत्माएं युग-युग में जन्म लेती हैं।
अतः श्रीकृष्ण एक ऐसी महान आत्मा थे, जिन्होंने व्यवस्थाओं के सुधार के लिए कभी धर्म के मार्ग का त्याग नही किया। उनका जीवन न केवल युगों तक मानव जाति को प्रेरणा देता रहेगा बल्कि संसार के लिए सदैव अनुसंधानात्मक विषय रहेगा। उनके विषय में फैली गलत धारणाओं का समाप्त करने से ब्रह्मांड का शौधन भी होगा।
धन्यवाद।
डॉ. के कृष्ण आर्य
डॉ. कृष्ण के आर्य दयानंद बोध रात्रि- विशेष महाशिवरात्रि को मूषक ने दयानन्द को कराया था बो...