शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

नववर्ष

     डॉ. कृष्ण के. ‘आर्य’                                                        

        नववर्ष पर विशेष


वर्षभर में दुनिया पचास से अधिक बार मनाती है नया साल


        दुनिया में नववर्ष मनाने की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। ‘पीछे छोड़-आगे दौड़’ की कल्पना मानव के स्वस्थ रहने की अनूठी कला है। अतीत की घटनाओं को पकड़कर रखने से व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। विश्व के मनीषियों ने बीते समय को भूल जाना ही श्रेष्ठकर माना है। यही कारण लगता है कि व्यक्ति एक दूसरे को देखा-देखी हर बार नववर्ष मनाने की होड़ में लगा रहता है ताकि भूत की घटनाओं को भूलकर भविष्य पर ध्यान दे सकें।
        एक जनवरी को नए साल का जश्न मनाने वाले शायद ही यह नहीं जानते होंगे कि संसार में पूरे वर्ष की अवधि के दौरान 50 से अधिक बार नववर्ष मनाए जाते हैं। इस वैज्ञानिक युग में इंसान के कदम चांद तारों की तरफ बढ़ रहे हैं लेकिन आज भी पूरी दुनिया कैलेंडर प्रणाली पर एक मत नहीं है। दुनिया में कैलेंडर प्रणाली कहीं सूर्य या चन्द्रमा तो कहीं सूर्य, चन्द्रमा और तारों की चाल पर आधारित मानी जाती है। इसके अतिरिक्त धार्मिक मान्यताओं पर भी विभिन्न कैलेंडर प्रणालियां लागू हैं। इस कारण केवल भारत में ही वर्षभर के दौरान दर्जनभर नववर्ष मनाए जाते हैं।
स्ंसार की आबादी लगभग 8.30 अरब है। इसमें विभिन्न मत-सम्प्रदायों को मानने वालों की बड़ी संख्या है। दुनिया में लगभग 29 प्रतिशत आबादी ईसाई मत को मानती है, जबकि इस्लाम को मानने वाले लगभग 26 प्रतिशत हैं। सत्य सनातन वैदिक धर्म (हिन्दू) को लगभग 15 प्रतिशत, बौद्ध लगभग 5 प्रतिशत, अन्य मतावलम्बी लगभग 2.5 प्रतिशत हैं तथा शेष किसी भी धर्म या मत-सम्प्रदाय से असंबद्ध रखते है। विश्व में यही लोग अपने-अपने मतानुसार नया साल मनाते हैं।
        दुनिया में सबसे अधिक आबादी ईसाई समुदाय की है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर पर आधारित नववर्ष मनाती है। संसार में इसी कैलेंडर के आधार पर अधिकतम जनसंख्या द्वारा नया साल प्रतिवर्ष एक जनवरी को मनाया जाता है। इसे अन्य मत, सम्प्रदायों तथा धर्म के लोग भी जाने-अनजाने में एक जनवरी को ही नववर्ष मनाते है। इसके अतिरिक्त अन्य मतों के लोग अपनी आस्था और सामाजिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर निम्न प्रकार से नया साल मनाते है।

ग्रेगोरियन कैलेंडर- एक जनवरी को मनाया जाना वाला ईसाई नववर्ष इसी कैलेंडर पर आधारित है। इसे रोमन कैलेंडर भी कहा जाता है। यह नववर्ष ईसाई समुदाय के अलावा अन्य मत-सम्प्रदाय के लोगों द्वारा भी मनाया जाता है। इस कैलेंडर में ही महीनों के नाम जनवरी से दिसम्बर होते हुए साल की संरचना बनती है। रोम के पहले राजा रोमुलस ने इसकी शुरुआत 10 महीनों के एक चंद्र कैलेंडर के तौर पर की थी, जो मार्च से शुरू होता था और सर्दियों को छोड़ देता था। रोम के दूसरे राजा नूमा पोम्पिलियस ने इसमें जनवरी और फरवरी जोड़कर इसे 12 महीनों का बना दिया। जूलियस सीज़र ने 45 ईसा पूर्व इस कैलेंडर को सौर वर्ष (365.25 दिन) के हिसाब से सुधार किया और 1 जनवरी को नए साल की शुरुआत कर दी। सन् 1582 में पोप ग्रेगरी ने लीप ईयर की गणना करते हुए इसमें 10 दिन जोड़कर आज का ग्रेगोरियन कैलेंडर बनाया, जिसे अब दुनिया भर में अपनाया जाता है।
पारसी कैलेंडर- नवरोज दुनिया में मार्च महीने में मनाया जाता है, परन्तु भारत में पारसी समुदाय शहंशाही कैलेंडर का पालन करते हुए इसे जुलाई-अगस्त महीने में मनाते है। इसे लगभग 3000 वर्ष पूर्व शाह जमशेद ने मनाया था, जिसमें लीप वर्ष की गणना नहीं की जाती है।
जैन नववर्ष- जैन समुदाय के लोग इसे दीवाली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाते है। माना जाता है कि दीवाली के दिन भगवान महावीर जी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसलिए इसके अगले दिन से नया साल मनाते हैं।
बौद्ध नववर्ष- बौद्ध नववर्ष वैशाख की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह चंद्र और सौर चक्र पर आधारित माना जाता है।
यहूदी नववर्ष- यहूदी नववर्ष को रोश हशनाह के नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ होता है वर्ष का आरम्भ। इसे सितम्बर-अक्तूबर में मनाया जाता है।
इस्लामी नववर्ष- इसे हिजरी नया साल भी कहा जाता है। यह चंद्र कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की पहली तारीख को मनाया जाता है। यह ग्रेगोरियन कैलेंडर से 10-12 दिन छोटा माना जाता है। इसे इस्लामिक समुदाय की स्थापना के संबंधित माना जाता है।
नानकशाही कैलेंडर- सिखों में नववर्ष बैसाखी के अवसर पर मनाया जाता है, जो 13-14 अप्रैल को होती है। इसी दिन सन् 1699 में खालसा पंथ की स्थापना हुई थी।

सनातन कैलेंडर- सनातन (हिन्दू) कैलेंडर में नववर्ष अनेक रूपों में मनाया जाता है। सत्य सनातन वैदिक धर्म के अनुसार यह सबसे प्राचीन कैलेंडर है, जिसमें सृष्टि संवत्, कलियुग संवत्, विक्रमी संवत् तथा शक संवत् प्रमुख है। हालांकि इनका नाम तथा काल भिन्न है, परन्तु ये सभी होते एक ही दिन है। वैदिक साहित्य में कालचक्र का निर्धारण सृष्टि के पहले दिन से ही किया है। इनकी गणना वैज्ञानिक पद्धति से की गई है।
1. सृष्टि संवत्- यह सृष्टि प्रारम्भ का दिवस माना जाता है। इस दिन सृष्टि क्रम का आरम्भ हुआ था। इस संवत् का पहला दिन चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा होता है। इसे नववर्ष अर्थात् नवरात्र के नाम से जाना जाता है। इसकी गणना के 1,96,08,53,126 वर्ष हो चुके हैं। इसलिए इसे सृष्टि संवत् कहा गया है।
2. कलियुग संवत्- वर्तमान कलियुग काल 3102 ईस्वी पूर्व रहा है। इसकी शुरुआत ग्रेगोरियन कैलेंडर से 2025 वर्ष पूर्व हुई थी अर्थात 5127 वर्ष पूर्व कलियुग का आरम्भ हुआ था। इसका पहला दिन अर्थात नववर्ष भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही होता है। इसे कलियुगाब्द भी कहा जाता है।
3. विक्रमी संवत्- इसकी शुरुआत सनातन वैदिक सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल में हुई थी, जो उनकी विरोधियों पर विजय से संबंधित है। इस संवत् का आरम्भ ईसाई नववर्ष से लगभग 57 वर्ष पूर्व हुआ था। इसका पहला दिन अर्थात नववर्ष भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही होता है। यह भारत का आधिकारिक संवत् है।
4. शक संवत्- इसका पहला दिन अर्थात नववर्ष भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही होता है। यह ग्रेगोरियन कैलेंडर की सन् ईस्वी 78 में आरम्भ हुआ था। यह भारत सरकार का राष्ट्रीय कैलेंडर है।

        धर्म के आधार पर सृष्टि संवत् ही दुनिया का सबसे प्राचीन काल गणना है। इसके अतिरिक्त विभिन्न देशों में विभिन्न नामों तथा तिथियों को नववर्ष को मनाने की परंपरा है। भारत में भी हिन्दु नववर्ष को उगादी, गुड़ी पड़वा इत्यादि नामों से जाना जाता है। नेपाल में विक्रमी संवत् ही अधिकारिक सरकारी कैलेंडर है। जापान में पहली जनवरी का दिन नववर्ष ननाई या ओशोगत्यु के नाम से जाना जाता है। अमेरिका, इंग्लैंड, ब्राजील, मिस्र, मेक्सिको, नाइजीरिया, फिलीपींस इत्यादी देशों में एक जनवरी को ही नववर्ष मनाया जाता है। प्राचीन स्कॉटिश नववर्ष 11 जनवरी, वेल्स में इवान वैली का नववर्ष 12 जनवरी, मेल्टिक नववर्ष 21 जनवरी तथा चीन लेबनान, कोरिया और वियतनाम में 22 जनवरी को नववर्ष मनाया जाता।
       इसके अतिरिक्त पुराने फ्रांस में एक अप्रैल को अप्रैल फूल के रूप में नववर्ष मनाया जाता है जबकि थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, कम्बोडिया तथा साओ के बेरादिन 5 अप्रैल 2004 को चीर नववर्ष मनाया जाता है। इसी तरह 13 से 16 अप्रैल के दौरान बैसाखी को दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों भारत बांग्लादेश, श्रीलंका, थाईलैंड म्यांमार तथा कम्बोडिया में नववर्ष मनाया जाता है।पारसी नववर्ष 22 अप्रैल, बेबीलोनियन 24 अप्रैल, बौद्ध मई, प्राचीन ग्रीक 21 जून, 29 जून को रयूनिक, अरमीनिया 9 जुलाई, 16 अगस्त को मलयालम, जोरोस्ट्रियन 23 अगस्त, 30 अगस्त को एलेक्जैन्ड्रियन नववर्ष तथा रूस के रूढ़िवादी ईसाई एक सितम्बर को नया साल मनाते हैं।
       अतः दुनिया के विभिन्न मतों, सम्प्रदायांे, धर्मों तथा विभिन्न देशों की अलग-अलग मान्यताओं के आधार ही नववर्ष मनाया जाता है। इस आधार पर वर्षभर में पूरी दुनिया में लगभग पचास से अधिक बार नववर्ष मनाया जाता है।

000

कोई टिप्पणी नहीं:

For You

New Post

नव संवत्

 डॉ. कृष्ण के ‘आर्य’              नव संवत् वर्ष-विशेष   नव संवत् पर देह त्याग गए थे भगवान श्रीकृष्ण Dainik Tribune दोपहर का समय थ...