बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

बसंत पंचमी विशेष

 

बसंत पंचमी को ही मृत्यु लोक त्याग गए थे पितामह भीष्म

बंसत ऋतु को ऋतुराज कहा जाता है। यह शिशिर ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का परिचायक है। बंसत ऋतु ठंड के जाने और गर्मी के आने का बौद्ध करवाती है। सर्दी से सिकुड़े प्राणियों के शरीरों में पुनः ऊष्मा का संचार होने लगता है। शरीर की अकड़ाहट दूर होने लगती है। सर्दी के कम होने से बुजुर्ग जहां राहत का अनुभव करते हैं वहीं विद्यार्थी परीक्षाओं की तैयारी के प्रति गंभीर हो जाते हैं। 

     बसंत को प्रकृति के नवसृजन का समय माना जाता है। प्रकृति भी अपना श्रृंगार बिखेरने लगती है। खेतों में गेहूं की फसल पर आ रही बालियां और सरसों के पीले फूलों की बयार लोगों के मन को हर्षित करती है। मंडियों में धान की फसल आने से किसानों के घरों में खुशहाली का संचार होता है। इससे बाजारों में रौनक बढ़ने लगती है तथा विवाह-शादियों का सीजन आरम्भ हो जाता है। अतः लोगों के चेहरे का ओज उनकी प्रसन्नता का बखान करने लगता है।

      इस दौरान ब्रह्मांड के महत्वपूर्ण अवयव सूर्य के तेज में उत्तरोतर वृद्धि आरम्भ हो जाती है। वर्ष के 12 महीनों में सूर्य की रश्मियों की गर्माहट 12 कलाओं के रूप में प्रदर्शित होने लगता हैं। चैत्र से फाल्गुण मास तक सूर्य की गति भिन्न-भिन्न होती जाती है, जिनसे ऋतुएं बनती हैं। सूर्य की गति और कलाओं से अयन बनते हैं, जिन्हें उत्तरायण और दक्षिणायन कहा जाता है। प्रत्येक अयन में तीन-तीन ऋतुएं आती हैं। मकर सक्रांति से लगे उत्तरायण में शिशिर, बसंत और ग्रीष्म तथा दक्षिणायन में वर्षा, शरद् तथा हेमन्त ऋतु रहती हैं।

          बसंत पंचमी, माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है। इसे श्री पंचमी या ज्ञान पंचमी भी कहा जाता है। इस दिन विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा की जाती है। सत्य सनातन वैदिक काल से ही बसंत पंचमी का अति महत्व रहा है। इस दिन सभी आम एवं खास परिवारों के बच्चों का दाखिला गुरुकुलों में करवाया जाता था। विद्यार्थियों का उपनयन संस्कार करवाया जाता है, जिससे उन्हें विद्या की देवी माता सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 

      हमारे शास्त्रों में कहा है कि...

‘आहार शुद्धो सत्व शुद्धि, सत्व शुद्धो ध्रुवा स्मृति’

इन दिनों खाने-पीने पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। गुरुकुलों में आयुर्वेद के अनुसार आहार की आदतों को एक दिशा दी जाती है। इससे बालकों का सर्वांगीण विकास होता है और वे पढ़ाई के साथ-साथ वह शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से बलिष्ठ बनते हैं। बसंत ऋतु के दौरान आहार-विहार पर ध्यान देने की आवश्यकता इसलिए भी है, क्योंकि यह प्रकृति के करवट लेने का समय होता है। हमारा शरीर प्रकृति का ही रूप है, उसके बदलने के साथ ही हमें भी अपनी दिनचर्या में बदलाव करने की आवश्यकता होती है। इसका बौद्ध बसंत पंचमी ही करवाती है। इस दिन से होलिका त्यौहार का आरम्भ माना जाता है तथा श्रद्धालु यज्ञ, पूजा तथा अग्निहोत्र करते हुए मीठे चावलों का भोग लगाते हैं।

      भारतीय इतिहास की अनेक घटनाओं का सम्बन्ध भी बसंत पंचमी से रहा है। हमारे देश के एक महान राजा भोज का जन्म इसी दिन हुआ था। इस दिन एक वीर बालक हकीकत राय ने अपने सत्य सनातन वैदिक धर्म पर अड़िग रहते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। पंजाब के सियालकोट में जन्मे हकीकत राय ने मात्र 12 वर्ष की आयु में जिंदा रहने के लिए मुस्लिम बनने की शर्त को ठुकरा कर गर्दन कटवाना बेहतर समझा। इसके फलस्वरूप ही हकीकत राय ने 1734 ईस्वी में धर्म की रक्षार्थ मौत को गले लगा लिया। इसी दिन इतिहास की एक और महत्वपूर्ण घटना घटी थी, जिसको अवश्य याद रखना चाहिए। 

     कुरुवंश के ज्येष्ठ और महाभारत के महान यौद्धा पितामह भीष्म ने बसंत पंचमी के दिन ही अपने प्राण त्यागे थे।महाभारत के अनुशासन पर्व के 32 वें अध्याय के 25 श्लोक में कहा है कि...

माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिर।

त्रिभागशेषं पक्षोऽयं शुक्ला भवितुमर्हति।।

अपने प्राण त्यागते हुए पितामह कहते है युधिष्ठिर ! इस समय चन्द्रमास के अनुसार माघ का महीना प्राप्त हुआ है। इसका यह शुक्लपक्ष चल रहा है, जिसका एक भाग बीत चुका है और तीन भाग शेष हैं। इस आधार पर उस समय माघ माह शुक्ल पक्ष की पंचमी का दिन बनता है, जिसे बंसत पंचमी कहा जाता है। 

     तब भीष्म ने कहा कि धृतराष्ट्र ! तुम अपने पुत्रों के लिए शोक मत करना, वह सब दुरात्मा थे। युधिष्ठिर शुद्ध हृदय है वह सदैव तुम्हारे अनुकूल रहेगा। इसके पश्चात् पितामह ने श्रीकृष्ण से कहा हे बैकुण्ठ ! हे पुरुषोत्तम ! अब मुझे जाने की आज्ञा दीजिए। श्रीकृष्ण ने कहा कि हे महातेजस्वी भीष्म जी ! मैं आपके लिए प्रार्थना करता हूँ कि आप वसुलोक (मोक्ष) को प्रस्थान करें। इस प्रकार अपनी मातृ भूमि को प्रणाम करते हुए पितामह भीष्म ने बसंत पंचमी को अपनी देह का त्याग कर दिया। मैंने इसका उल्लेख अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी कृष्ण’ में भी किया है।

      वर्तमान में बसंत पंचमी पर उल्लास का प्रतीक माने जाने वाली पतंगबाजी भी की जाती है। परन्तु इससे अनेक दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं। कहते हैं कि पतंगबाजी चीन, कोरिया और जापान के रास्ते से भारत आई है। हालांकि पूरे भारत में बसंत पंचमी के त्यौहार को अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल सहित अनेक प्रदेशों में इसे हर्षोल्लास से मनाया जाता है। बसंत हमारे जीवन में नवशक्ति का संचार करने वाला वह त्यौहार है, जिसके लिए कहा जा सकता है कि.. 

बसंत है त्यौहार निराला, उल्लास भरा अमृत प्याला।

चिर चेतना का संवाहक, सनातन की धधकती ज्वाला


   कृष्ण कुमार ‘आर्य’

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