डॉ. कृष्ण के आर्य
मुद्रिका ज्ञान-
श्रीकृष्ण ने आचार्य सांदीपनी से कहा कि वह मुद्रा अथवा मुद्रिका का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हैं। अतः मुझे बताएं कि मुद्रिका किसे कहते हैं? उन्होंने कहा कि मानव के हाथ में पांच अंगुष्ठान (अंगुलियां) होती हैं। इनका पृथ्वी, अग्नि, अन्तरिक्ष, जल (आपः) एवं वायु सहित पांच तत्वों से अलग-अलग संबंध होता है। इसमें पृथ्वी का प्रतिनिधित्व अंगूठा करता है तथा अंगूठे के साथ वाली अंगुली अग्नि का, उससे आगे की अंगुली से अन्तरिक्ष, फिर जल तथा अंतिम अंगुली का वायु से संबंध होता है।
यह विद्या क्रियात्मक है, अध्ययनात्मक नहीं है। इसके लिए साधक को एकान्त स्थल पर शान्त मुद्रा में (विशेष आसन) अपनी आत्मा को अन्धकार से प्रकाश में लाना होता है। जब योगी पृथ्वी तत्व को अग्नि तत्व, पृथ्वी को अन्तरिक्ष, जल और वायु तत्वों से क्रमशः मिलान करते हैं तो साधक को पंचमहाभूत विषयों का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त होता है। इसी अभ्यास को मुद्रिका ज्ञान कहा है। इससे साधक ब्रह्मांड एवं वेदमन्त्रों के गंभीर रहस्यों को समझने में सक्षम होता है। इससे वह ब्रह्मचर्य की आभा में रमण करता हुआ ब्रह्मवर्चसी बनता है। वह इन्द्रियों के प्रत्येक विषय का ज्ञान प्राप्त कर अन्तर्मुखी हो जाता है।
इसके साथ ही पांच प्राणों तथा मन की अवस्था को एक स्थान पर संयमित करना भी मुद्रिका कहलाता है। शरीर के प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान का मिलान एक ही स्थान पर एकत्रित करने को भी मुद्रिका कहा है। मुद्रिका के विभिन्न अभ्यासों से साधक गहन विद्याओं का स्पष्ट दर्शन करने में समर्थ बन जाता है। श्रीकृष्ण रात्रि के अन्तिम काल (प्रहर) में जागृत होकर इन्हीं मुद्राओं का नित्य अभ्यास करते थे, जिससे उन्हें ब्रह्मांड का विशेष ज्ञान प्राप्त था।
श्रीकृष्ण ने महर्षि सांदीपनी से कहा कि भगवन! मैं चित्त मंडल पर अध्ययन करना चाहता हूँ। ऋषि के निर्देश पर उन्होंने अग्नि और पृथ्वी दोनों की मुद्रिका बनाई और अन्तर्मुखी हो गए। ‘उस समय श्रीकृष्ण की आयु 20 वर्ष की थी। ऐसी युवा अवस्था में किसी ब्रह्मचारी का अन्तर्मुखी हो जाना, शिशु विज्ञान को जानना इत्यादि पर अध्ययन होता रहता था।’ यह उनकी महानता को प्रदर्शित करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि इतनी छोटी अवस्था से ही श्रीकृष्ण बाह्य जगत् की गतिविधियों का असर स्वयं पर नहीं पडऩे दे रहे थे।
इस प्रकार श्रीकृष्ण ने पृथ्वी तत्व से अग्नि, अन्तरिक्ष, जल और वायु तत्व की मुद्राओं का समन्वय कर अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। योगाभ्यास द्वारा उन्होंने अग्नि और पृथ्वी के परमाणुओं का मिलान कर धरती के गर्भ का ज्ञान प्राप्त किया था। ऐसे ही वह कभी चन्द्रमा में मुद्रित होकर उसकी शीतल आभा तो कभी सूर्य विज्ञान को समझने के लिए विभिन्न मुद्राओं का अभ्यास करते रहे। यही श्रीकृष्ण की महानता है।

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