रविवार, 8 मई 2011

मातृ दिवस पर लिखित - माँ

 माँ

बचपन में जब हम छोटे थे,
मां की गोद के लिए रोते थे।
रोते-रोते सो जाते थे,
फिर सपनों में यह कहते थे, कि ये मेरी मां है, मेरी मां है।
सुबह उठकर माता मुझको,
दूध अपना पिलाती थी,
दूलार कर फिर मुझको माता,
छाती से लगाती थी, फिर हम ये कहते थे, ये मेरी मां है।
बाहर से जब बड़ा भाई आया,
गोद से उसने मुझको उतरवाया,
मां से उसने फिर खाने को मंगवाया,
गोद में बैठकर वह, फिर ये कहने लगा कि ये मेरी मां है।
इन्हीं हठखेलियों में हम,
पढ लिखकर हुए बड़े,
इसी संग माता के भी,
हाथ पांव लगे सिकुडने, फिर हम लगे कहने कि ये हमारी मां है।
छोटा बेटा बना बड़ा अधिकारी,
बड़ा बेटा हुआ अफसर सरकारी,
एक से बढ़ कर दूसरा समझे,
वृद्घ मां को आश्रय देने पर, फिर वे कहने लगे कि ये हमारी मां है।
एक शाम फिर ऐसी आई,
टहलते हुए मां ने चोट खाई,
इससे टांग में हुई खिचाई,
मां को साथ ले जाने को लेकर कहने लगे दोनों भाई कि ये हमारी मां है।
चोट का दर्द हुआ बड़ा भारी,
चलने फिरने में भी हुई लाचारी,
मां को दिक्कत थी बड़ी सारी,
सेवा के लिए फिर कहने लगे दोऊ भाई, ये तेरी मां है, तेरी मां है।
परेशान मां की परेशानी से,
परेशान हुए दोनों भाई,
देखरेख करने को उन्होंने बुला ली फिर अपनी ताई,
साथ ले जाने पर फिर वे लगे झगड़ने कि ये तेरी मां है।
बिमार मां को फिर दोनों ने,
वृद्घाश्रम दिया पहुंचाये,
दवाई बूटी पर खर्च के लिए,
हाथापाई करते हुए फिर वे कहने लगे कि ये तेरी मां है, तेरी मां है।

                                        कृष्ण आर्य

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