सोमवार, 28 सितंबर 2026

कृष्ण की व्यापकता-

 कृष्ण की व्यापकता-

व्यापक एक बृहद शब्द है। इसका अर्थ भिन्न प्रकरण में भिन्न होता है। यदि कहा जाए कि ईश्वर व्यापक है तो इसका अर्थ हुआ कि ईश्वर प्रत्येक स्थान पर है, वह ब्रह्मांड के कण-कण में विद्यमान है। उसकी सत्ता की कोई थाह नहीं है अर्थात् ईश्वर सर्वव्यापक है। यहाँ श्रीकृष्ण की व्यापकता पर चिंतन करने का प्रयास कर रहे हैं। उनके परिपेक्ष्य में व्यापक शब्द का अर्थ विस्तृत, बोधपूर्ण, सर्वग्राही, समावेशी तथा अस्पष्ट है। अतः श्रीकृष्ण का वैशिष्टय विशाल एवं विस्तृत था, उन्हें घटनाओं और उनसे पैदा हुई परिस्थितियों के निराकरण का सम्पूर्ण बोध रहा। वह सर्व गुणग्राही, चिंतक तथा अस्पष्ट थे। उनके विषय में यह अनुमान लगाना कठिन था कि वह अगले ही पल क्या करने वाले हैं।

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के 11वें समुल्लास में लिखा है कि महाभारत काल से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व बिगाड़ आरम्भ हो गया था। इसके फलस्वरूप श्रीकृष्ण के कालखंड में जम्बूद्वीप और भरतखंड के असंख्य राजाओं ने मनमानी करना आरम्भ कर दिया था। इस कारण देश में वेद की व्यवस्था एवं आचरण लुप्त प्रायः हो रहे थे। इससे धर्म, कर्म, शासन व्यवस्था एवं वर्ण व्यवस्था का लोप होने लगा और जनता अनेक कष्टों में जीवन यापन करने को विवश थी। ऐसे समय में विक्रमी संवत 3170 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने समस्त 14 विद्याओं के ज्ञान से पूर्ण होकर जम्बूद्वीप में राजाओं के मन में धर्मानुकूल आचरण बनाने का प्रसार करने का प्रयास किया। भगवान श्रीकृष्ण की अथाह क्षमताएं थी। उनके कार्य सदैव पूर्णता को प्राप्त होते थे। इसलिए वेदानुकूल व्यवस्था के स्थापन का कार्य उन्होंने स्वयं अपने हाथ में लिया। 

अतः श्रीमद्भगवद्गीता के अनेक प्रसंगों में इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक बार कहा है कि...

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

अर्थात् जब-जब भरतखंड में शासक और जनता धर्मानुकूल आचरण से विमुख हो जाते हैं, तब-तब वह अनकी आत्मा में धर्म का अभ्युदय, सृजन और उत्थान करने की प्रेरणा देता है। श्रीकृष्ण एक धर्मपरायण साम्राज्यवाद के पोषक थे। जैन साहित्य में श्रीकृष्ण को ‘श्लाका’ पुरुष कहा गया है। जो तेजस्वी, ओजस्वी, कांतिमान, वर्चस्वी, हितोपदेशी, मधुरवाची, अल्पवाची, अपराज्यीय, गंभीर, ज्ञानी-ध्यानी तथा अनेक दिव्य गुणों से सम्पन्न ही श्लाका पुरुष कहा जाता है। यहाँ उन्हें अर्ध-जम्बूद्वीप के शासक के रूप में दर्शाया गया है।

श्रीकृष्ण सदैव राष्ट्र को धर्म-परायण बनाने के विचार में व्याप्त रहते थे। इसलिए उन्होंने इस कार्य की सफलता के लिए तुलनात्मक उत्कृष्ट स्वभाव और आचरण वाले पांडवों का चयन किया ताकि पृथ्वी पर वेदानुकूल राज्य का संचालन किया जा सके। अतः उनके मन में युधिष्ठिर को ही सम्राट बनाने पर मंथन चलता रहता था। गीता में श्लोक दिया है कि

धर्मसंस्थापनार्थय सम्भवामि युगे-युगे।

अर्थात् साधु प्रवृति के लोगों की सुरक्षा, दुष्ट स्वभाव वालों का विनाश और संसार में धर्म की स्थापना हेतु युगों-युगों में जन्म लेता हूँ। इसे यदि अन्य भावों में समझा जाए तो गोलोक (अंतरिक्ष) में विचरण करने वाली भगवान श्रीकृष्ण की वह दिव्य एवं मुमुक्षु आत्मा सृष्टि के घटनाक्रमों का आंकलन करती रहती। इसलिए श्रीकृष्ण को सृष्टिद्रष्टा भी कहा गया है।

भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मांड की अधिकतम विधाओं में व्याप्त थे। उनका उज्ज्वल चरित्र, उत्कृष्ट आचरण, सद्व्यवहार, जितेन्द्रीय संस्कार, वेद में विशेषज्ञता, सत्य-असत्य का विवेचन, धर्मज्ञान की सर्वज्ञता, वरिष्ठ विद्वानों का सम्मान, शत्रुओं का संहार, योग में पराकाष्ठा इत्यादि उनकी व्यापकता को सिद्ध करते हैं। श्रीकृष्ण एक ऐसा अनपेक्षित चरित्र थे, जिनको नदी की धारा के मध्य बांधा नहीं जा सकता है। उन्हें जब भी, जहाँ भी कुछ ठीक नहीं लगा वहीं धर्म को वरियता देते तदनुसार निर्णय ले लेते थे।

डॉ. कृष्ण के आर्य 


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