सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

राधे-राधे

 राधे-राधे


       राधे, राधे, राधे, तू ओ३म् भूर् गा ले,

      ओ३म् भूर् गाले तू, भूव स्वः गा ले,

      राधे, राधे, राधे, तू ओ३म् भूर् गा ले,

      ओ३म् भूर् गाले तू, कष्ट मिटा ले, 

कष्ट मिटा ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...

सुख दिला तत्, सवितुर गा ले,

सूरज की भांति, जीवन उज्जवल बना ले,

वर योग्य ईश्वर, तू वरेण्यं गा ले,

भर्गाे से कर्मों को, शुद्ध बना ले,

शुद्ध बना ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...

भर्गाे है वह, तू उद्धार करा ले,

       देवस्य वह प्रभु, तू दिव्यता अपना ले,

धीमहि संग उससे, चिंतन लगा ले,

धियो के साथ तू, बुद्धि उत्तम पा ले,

बात ये मान ले तूं, खुशियां दिला दे, राधे, राधे, राधे...

‘यो’ है जो, ये मेरी बात मान ले,

       नः है हमारी, तू प्रचोदयात् सुना ले,

ईश स्तुति से तू, बुद्धि बल पा ले,

राधे राधे तू, ये सबको सुना ले,

सबको सुना दे तू, ‘केके’ को सुना दे, राधे, राधे, राधे...



डॉ. के. कृष्ण आर्य 


बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

सांझी विशेष

  सांझी विशेष-        हरियाणा की सांझी का ही प्रतिरूप है माता दूर्गा पूजा

        

       भारत भूमि को देवभूमि कहा गया है। यहाँ समय-समय पर दैवी आत्माओं का प्रकटीकरण होता रहा है। उन्होंने विश्व में सुख, शांति और समृद्धि के विस्तारिकरण के लिए अनेक मर्यादाओं की स्थापना की, इन्हीं मर्यादाओं के समुचित पालन की नियमावली को ही त्यौहार की संज्ञा दी है। इन त्यौहारों को वर्षभर मनाने से न केवल लोगों का जीवन रसमय बनता है बल्कि देवी-देवताओं के आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। इससे घरों में खुशियांे का आगाज होता है तथा बन्धुत्व की भावना को बल मिलता है। ऐसे ही श्रृंखलाबद्ध रूप में माता के नौ रूपों को नौ दिनों तक मनाना ही नवरात्र कहा गया है। इन्हीं नवरात्रों को माता दूर्गा के नव-दिवस भी कहते हैं। नवरात्रों के दौरान हरियाणा में सांझी माता की पूजा की जाती रही है, जिसका बृह्द रूप ही माता दूर्गा पूजा है।

          विश्व में आश्विन एवं शारदीय नवरात्र के दौरान दूर्गा पूजा की धूम होती है। बडे़-बडे़ पांड़ाल लगाए जाते हैं, जिनमें माता दूर्गा की विशालकाय मूर्ति स्थापित की जाती है। पांड़ालों को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है, जिससे उसकी अद्भूत छटा दिखाई देती है। इन पांड़ालों में सूर्यास्त के उपरान्त बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता दूर्गा की पूर्जा करते हैं। इतना ही नही, अपनी खुशी की अभिव्यक्ति करने के लिए उन्हें गायन एवं नृत्य से धूम मचाते भी देखा जा सकता हैं।

        दूर्गा पूजा को मनाने की परंपरा कब से आरम्भ हुई, इसका सही आंकलन तो नही किया जा सकता है। मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में अविभाजित भारत का बंगाल तथा वर्तमान बांग्ला देश के ताहिरपुर के राजा कंसनारायण ने अश्वमेध यज्ञ करने की इच्छा प्रकट की। परन्तु कलियुग होने के कारण पूरोहितों ने उन्हें अश्वमेध यज्ञ के स्थान पर माता दूर्गा की पूजा करने की सलाह दी। इसके पश्चात बंगाल के बड़े जमींदारों द्वारा दूर्गा पूजा की शुरूआत हुई। आजकल विदेशों से लेकर भारत के बड़े नगरों, कस्बों तथा गांवों तक दूर्गा पूजा के मंडप सजाए जाते हैं। उनमें गरबा एवं डांडियां नृत्य की झंकार सुनाई देती है।

     पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महिषासुर नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था। उसने देवताओं (श्रेष्ठ लोगों) को बन्दी बनाया और उन पर अत्याचार करने लगा। मुसिबत में फंसे देवताओं ने उससे छुटकारा पाने के लिए दुर्गा माता से प्रार्थना दी। देवताओं की प्रार्थना पर माता दुर्गा ने ‘अष्टभुज’ रूप धारण कर शेर पर सवार होकर महिषासुर का अन्त कर दिया। उसी समय से लोग इन दिनों को दुर्गा दिवसों अर्थात नवरात्रों के रूप में मनाते हैं। इसलिए दूर्गा पूजा भी बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में ही मनाया जाता है।

        हरियाणा राज्य में माता दूर्गा पूजा की परंपरा अति प्राचीन है, जिसको सांझी माता कहा जाता रहा है। माना जाता है कि 15वीं शताब्दी में वैष्णव मंदिरों में सांझी की पूजा आरम्भ की गई थी। हरियाणा के गांवों में सांझी पूजा सदियों से चली आ रही है। अतः प्रदेश में सांझी माता की पूजा का इतिहास आज मनाए जाने वाले दूर्गा महोत्सव से प्राचीन नजर आ रहा है। सांझी की पूजा पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान सहित उत्तर भारत में धूमधाम से की जाती है।


       सांझी, शब्द सांझ से बना है। सांझ का अर्थ सांय अर्थात गोधूली का समय। माता दूर्गा की पूजा सांझ के समय की जाती है, इसलिए इसे सांझी कहा गया है। आज भी गांवों में लोग दिवार पर सांझी माई की मूर्ति उकेरते है। गाय के गोबर, मिट्टी की टिकड़ियों को रंगीन करके दिवारों पर चिपकाते हैं और इसे माता दूर्गा का रूप देते हैं। इसके अगल-बगल में चांद और सूरज बनाए जाते हैं। उसके मुहं पर कपड़ा लगाया जाता और सांझ के समय सांझी की आरती की जाती है। कुवांरी लड़कियां अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए नवरात्रों में सांझी की आरती इस प्रकार करती हैं।

आरता ऐ आरता, सांझी माई आरता,

क्यांहे का तेरा दीवा, क्यांहे की तेरी बाती,

चांदी का दीवा, सोने की बाती,

जाग सांझी जाग ऐ, तेरे माथा लाग्या भाग ऐ...

नवरात्रों के दौरान ही नौ दिनों तक सांझी माई की पूजा की जाती है। घर की लड़कियां तथा महिलाएं इस प्रकार के अनेक लोक गीतों से मां की आराधना करती हैं तथा उनसे मन चाहे आशीर्वाद मांगती हैं। माता का आरता के लिए घी का दीपक जलाया जाता है और माता को हलवा या अन्य मिष्ठ पदार्थों का भोग लगाया जाता है। उसके पश्चात नवरात्रों के व्रती अपना उपवास खोलने के लिए भोजन करते हैं।

नवरात्रों में भोजना का भी विशेष महत्व है। सांझी माई के नौ दिनों तक फलाहार किया जाता है। सुबह से शहद और नींबू पानी, दूध या छाछ का सेवन किया जाता है तथा दोपहर को केला, सेब या पपीता इत्यादि फलों को खाद्य रूप में लिया जाता हैं। सांझी का आरता करने के बाद रात्रि में शामक, आलु का हलवा या साबुदाने की खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। इस प्रकार के आहार लेने के पीछे शरीर शौधन का ही कारण माना जाता है।

हमारे शास्त्रों में कहा है कि

 ‘आहार शुद्धो, सत्व शुद्धि, सत्व शुद्धि, ध्रुवा स्मृति’ 

अर्थात हमारे आहार के शुद्ध होने से बुद्धि तथा बुद्धि के पवित्र होने से हमारी स्मरण शक्ति का विकास होता है। नवरात्रों के दौरान अल्पाहार करने से शरीर की बीमारियों का भी शमन होता है। अतः नवरात्रों का न केवल धार्मिक महत्व है बल्कि वैज्ञानिक महत्व भी है।

हरियाणा की सांझी माई को नौ दिनों तक पूजा जाता है तथा दशहरे के दिन माई को तालाब या जोहड़ में इस प्रार्थना के साथ विसर्जित किया जाता है कि ‘माई तूं अगले साल फेर आईये और हमारे घरों मंे खुशियां लाईये’।

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                                                                                       डॉ. के कृष्ण आर्य    

बुधवार, 17 सितंबर 2025

मित्रता की डोर

 मित्रता की डोर

 

दिल से दिल को बांधे रखती,

और परेशानी को करती आसान,

जो एक दूसरे पर जमाए जोर,

वह है केवल मित्रता की डोर।

बिना खून के संबंध बने,

भावना संग दूसरे से जुड़े,

जाति बंधन दे जो तोड़,

वह केवल मित्रता की डोर।

रहे साथ खड़ा मुश्किल में,

न फूला समाए खुशी में,

जो भावों का है मजबूत जोड़,

वह है केवल मित्रता की डोर।

वह वसंत ऋतु की खुशबु,

बहे रंग हरा, सरसों की सुगंध,

जब वह पहुँचाए उनकी डगर,

है जो केवल मित्रता की डोर।

एक जमाना श्रीराम का भाई,

निषाद संग मित्रता निभाई,

नहीं बड़ा छोटा था किसी ओर,

ऐसी होती है मित्रता की डोर।

श्याम के महल सुदामा आए,

खुशी के आंसु से वह नहलाए,

ऐसी दोस्ती न देखी कोई और,

दे सम्मान बढ़ाए मित्रता की डोर।

आज जमाना बस ‘केके’ ऐसा,

अपनी खुशी में जग खुश जैसा, 

स्वार्थ सिद्धि पर भागे कहीं ओर,

फिर कौन उड़ाए मित्रता की डोर।


                                                                                       डॉ. के कृष्ण आर्य ‘केके’


गुरुवार, 11 सितंबर 2025

कर्मयोगी कृष्णः

  पुस्तक                                                                     विवरण

कर्मयोगी कृष्णः  

      यह पुस्तक भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित एक अनुसंधानात्मक जीवन चरित्र है। इसमें उनकी 60 पीढ़ी पहले से लेकर दो पीढ़ी बाद की वंशावली दी है। पुस्तक में उनके प्रारम्भिक जीवन की घटनाएं, उनकी शिक्षा, दिनचर्या, द्वारका तथा मूल गीत का विशेष तौर पर वर्णन किया गया है। इसका विमोचन हरियाणा के माननीय मुख्यमंत्री द्वारा 4 नवम्बर 2024 को किया गया था।

युवा पीढ़ी के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शक बनेगी और उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के वास्तविक जीवन के दर्शन करवाएगी। यह पुस्तक Google Play Books पर प्रकाशित है। इसका लिंक फोटो सहित ब्लॉग पर https://play.google.com/store/books/details?id=2-5-EQAAQBAJ भी दिया है।

       धन्यवाद।


 जीवन गीतः             यह पुस्तक काव्य पर आधारित है, जिसका शीघ्र प्रकाशन होने जा रहा है।


डॉ. के कृष्ण आर्य

चंडीगढ़।




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